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Wednesday, July 31, 2019

नज़्म मासूम सवाल सवाल- nazm maasoom savaal savaal - आदिल रशीद- aadil rasheed

July 31, 2019 0 Comments

नज़्म मासूम सवाल सवाल

वो मेरी मासूम प्यारी बेटी

है उम्र जिसकी के छ बरस की

ये पूछ बैठी बताओ पापा

जो आप अम्मी से कह रहे थे

जो गुफ्तुगू आप कर रहे थे

के ज़िन्दगी में बहुत से ग़म हैं

बताओ कहते है "ग़म" किसे हम?

कहाँ मिलेंगे हमें भी ला दो?

सवाल पर सकपका गया मैं

जवाब सोचा तो काँप उठ्ठा

कहा ये मैं ने के प्यारी बेटी

ये लफ्ज़ मुहमल[1]है तुम न पढना

तुम्हे तो बस है ख़ुशी ही पढना

ये लफ्ज़ बच्चे नहीं हैं पढ़ते

ये लफ्ज़ पापा के वास्ते है 

वो मुतमईन[2]हो के सो गई जब

दुआ की मैं ने ए मेरे मौला

ए मेरे मालिक ए मेरे खालिक[3]

तू ऐसे लफ़्ज़ों को मौत दे दे

मआनी जिसके के रंजो गम हैं

न पढ़ सके ताके कोई बच्चा 

न जान पाए वो उनके मतलब

नहीं तो फिर इख्तियार दे दे

के इस जहाँ की सभी किताबों

हर इक लुगत[4] से मैं नोच डालूं

खुरच दूँ उनको मिटा दूँ उनको

जहाँ -जहाँ पर भी ग़म लिखा है

जहाँ -जहाँ पर भी ग़म लिखा है

- आदिल रशीद- aadil rasheed

आज का बीते कल से क्या रिश्ता - aaj ka beete kal se kya rishta - - आदिल रशीद- aadil rasheed

July 31, 2019 0 Comments

आज का बीते कल से क्या रिश्ता 
झोपड़ी का महल से क्या रिश्ता 

हाथ कटवा लिए महाजन से 
अब किसानों का हल से क्या रिश्ता 

सब ये कहते हैं भूल जाओ उसे 
मशवरों का अमल से क्या रिश्ता 

किस की ख़ातिर गँवा दिया किसको
अब मिरा गंगा-जल से क्या रिश्ता 

जिस में सदियों की शादमानी हो 
अब किसी ऐसे पल से क्या रिश्ता 

जो गुज़रती है बस वो कहता हूँ 
वरना मेरा ग़ज़ल से क्या रिश्ता 

ज़िंदा रहता है सिर्फ़ पानी में 
रेत का है कँवल से क्या रिश्ता 

मैं पुजारी हूँ अम्न का आदिल
मेरा जंग ओ जदल[1] से क्या रिश्ता

- आदिल रशीद- aadil rasheed

ख़मोश होता हे क्यूँ दरिया इश्तआल के बाद - khamosh hota he kyoon dariya ishtaal ke baad - आदिल रशीद- aadil rasheed

July 31, 2019 0 Comments

ख़मोश होता हे क्यूँ दरिया इश्तआल के बाद 
सवाल ख़त्म हुए उस के इस सवाल के बाद

वो लाश डाल गया कत्ल कर के साए में
उसे ख़याल मिरा आ गया जलाल[2] के बाद

नये ज़माने का दस्तूर बस मआज़ अल्लाह[3]
नवाज़ता[4] है खिताबों[5] से इन्तकाल[6] के बाद 

जहाँ [7] को मैं ने बस इतनी ही अहमियत दी है
के जितनी क़ीमत-ए-आईना [8] एक बाल [9] के बाद

ये फ़ूल, चाँद, सितारे ये कहकशाँ[10] ये घटा 
अज़ीज़[11] ये भी हैं लेकिन तिरे ख़याल के बाद

वो शख़्स[12] मुझको बस इतना सिखा गया आदिल
किसी को दोस्त बनाओ तो देखभाल के बाद

- आदिल रशीद- aadil rasheed

जो बन संवर के वो एक माहरू निकलता है - jo ban sanvar ke vo ek maaharoo nikalata hai - आदिल रशीद- aadil rasheed

July 31, 2019 0 Comments

जो बन संवर के वो एक माहरू निकलता है 
तो हर ज़बान से बस अल्लाह हू [2]निकलता है 

हलाल रिज्क का मतलब किसान से पूछो 
पसीना बन के बदन से लहू निकलता है

ज़मीन और मुक़द्दर की एक है फितरत 
के जो भी बोया वो ही हुबहू निकलता है 

ये चाँद रात ही दीदार का वसीला है
बरोजे ईद ही वो खूबरू निकलता है 

तेरे बग़ैर गुलिस्ताँ को क्या हुआ आदिल 
जो गुल निकलता है बे रंगों बू निकलता है 


- आदिल रशीद- aadil rasheed

तुम्हारे ताज में पत्थर जड़े हैं - tumhaare taaj mein patthar jade hain - - आदिल रशीद- aadil rasheed

July 31, 2019 0 Comments

तुम्हारे ताज में पत्थर जड़े हैं
जो गौहर[1] हैं वो ठोकर में पड़े हैं 

उड़ानें ख़त्म कर के लौट आओ 
अभी तक बाग़ में झूले पड़े हैं

मिरी मंज़िल नदी के उस तरफ़ है 
मुक़द्दर में मगर कच्चे घड़े हैं

ज़मीं रो-रो के सब से पूछती है
ये बादल किस लिए रूठे पड़े हैं

किसी ने यूँ ही वादा कर लिया था 
झुकाए सर अभी तक हम खड़े हैं

महल ख़्वाबों का टूटा है कोई क्या 
यहाँ कुछ काँच के टुकड़े पड़े हैं

उसे तो याद हैं सब अपने वादे 
हमीं हैं जो उसे भूले पड़े हैं

ये साँसें, नींद ,और ज़ालिम ज़माना
बिछड़ के तुम से किस-किस से लड़े हैं

मैं पागल हूँ जो उनको टोकता हूँ 
मिरे अहबाब[2] तो चिकने घड़े हैं 

तुम अपना हाल किस से कह रहे हो 
तुम्हारी अक्ल पर पत्थर पड़े हैं

- आदिल रशीद- aadil rasheed

चलो पैग़ाम दे अहले वतन को - chalo paigaam de ahale vatan ko - - आदिल रशीद- aadil rasheed

July 31, 2019 0 Comments

चलो पैग़ाम दे अहले वतन को
कि हम शादाब [2]रक्खें इस चमन को 
न हम रुसवा [3]करें गंगों -जमन [4]को 
करें माहौल पैदा दोस्ती का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का

कसम खायें चलो अम्नो अमाँ [5]की
बढ़ायें आबो-ताब[6] इस गुलसिताँ की
हम ही तक़दीर हैं हिन्दोस्ताँ की
हुनर हमने दिया है सरवरी [7]का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का

ज़रा सोचे कि अब गुजरात क्यूँ हो
कोई धोखा किसी के साथ क्यूँ हो
उजालों की कभी भी मात क्यूँ हो
तराशे जिस्म फिर से रौशनी का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का

न अक्षरधाम, दिल्ली, मालेगाँव
न दहशत गर्दी [8]अब फैलाए पाँव
वतन में प्यार की हो ठंडी छाँव
न हो दुश्मन यहाँ कोई किसी का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का

हवाएँ सर्द [9]हों कश्मीर की अब
न तलवारों की और शमशीर [10] की अब
ज़रूरत है ज़़बाने -मीर[11] की अब
तक़ाज़ा भी यही है शायरी का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का

मुहब्बत का जहाँ[12] आबाद रक्खें
न कड़वाहट को हरगिज़ याद रक्खें
नये रिश्तों की हम बुनियाद रक्खें
बढ़ायें हाथ हम सब दोस्ती का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का

- आदिल रशीद- aadil rasheed

समझ लिया था बस इक जंग जीत कर हमने - samajh liya tha bas ik jang jeet kar hamane - - आदिल रशीद- aadil rasheed

July 31, 2019 0 Comments

समझ लिया था बस इक जंग जीत कर हमने 
के हमने मंज़िल-ऐ-मक़सूद[1] पर क़दम रक्खे 
जो ख़्वाब आँखों में पाले हुए थे मुद्दत से 
वो ख़्वाब पूरा हुआ आई है चमन में बहार
मिरे दिमाग में लेकिन सवाल उठते हैं 
क्यूँ हक बयानी[2] का सूली है आज भी ईनाम ? 
क्यूँ लोग अपने घरों से निकलते डरते हैं ?
क्यूँ तोड़ देती हें दम कलियाँ खिलने से पहले ?
क्यूँ पेट ख़ाली के ख़ाली हैं खूँ बहा कर भी ?
क्यूँ मोल मिटटी के अब इंतिकाम बिकता है? 
क्यूँ आज बर्फ़ के खेतों में आग उगती है ? 
अभी तो ऐसे सवालों से लड़नी है जंगें 
अभी है दूर बहुत ,बहुत दूर मंज़िल-ऐ-मक़सूद

- आदिल रशीद- aadil rasheed

गिर के उठ कर जो चल नहीं सकता - - aadil rasheed- aadil rashaiaid - - आदिल रशीद- aadil rasheed

July 31, 2019 0 Comments

गिर के उठ कर जो चल नहीं सकता 
वो कभी भी संभल नहीं सकता 

तेरे सांचे में ढल नहीं सकता 
इसलिए साथ चल नहीं सकता 

आप रिश्ता रखें, रखें न रखें 
मैं तो रिश्ता बदल नहीं सकता 

वो भी भागेगा गन्दगी की तरफ़
मैं भी फितरत बदल नहीं सकता 

आप भावुक हैं आप पाग़ल हैं 
वो है पत्थर पिघल नहीं सकता

इस पे मंज़िल मिले , मिले न मिले
अब मैं रस्ता बदल नहीं सकता 

तुम ने चालाक कर दिया मुझको 
अब कोई वार चल नहीं सकता

- आदिल रशीद- aadil rasheed

July 31, 2019 0 Comments

रात क्या आप का साया मेरी दहलीज़ पे था 
सुब्ह तक नूर का चश्मा[1] मेरी दहलीज़ पे था 
रात फिर एक तमाशा मेरी दहलीज़ पे था 
घर के झगडे में ज़माना मेरी दहलीज़ पे था 
मैं ने दस्तक के फ़राइज़ [2]को निभाया तब भी 
जब मेरे खून का प्यासा मेरी दहलीज़ पे था 
अब कहूँ इस को मुक़द्दर के कहूँ खुद्दारी 
प्यास बुझ सकती थी दरिया मेरी दहलीज़ पे था 
सांस ले भी नहीं पाया था अभी गर्द आलूद 
हुक्म फिर एक सफ़र का मेरी दहलीज़ पे था
रात अल्लाह ने थोडा सा नवाज़ा [3]मुझको 
सुब्ह को दुनिया का रिश्ता मेरी दहलीज़ पे था
होसला न हो न सका पाऊँ बढ़ने का कभी 
कामयाबी का तो रस्ता मेरी दहलीज़ पे था
उस के चेहरे पे झलक उस के खयालात की थी
वो तो बस रस्मे ज़माना मेरी दहलीज़ पे था 
तन्ज़(व्यंग) करने के लिए उसने तो दस्तक दी थी
मै समझता था के भैया मेरी दहलीज़ पे था
कौन आया था दबे पांव अयादत को मेरी
सुब्ह इक मेहदी का धब्बा मेरी दहलीज़ पे था
कैसे ले दे के अभी लौटा था निपटा के उसे 
और फिर इक नया फिरका मेरी दहलीज़ पे था
सोच ने जिस की कभी लफ़्ज़ों को मानी बख्शे 
आज खुद मानी ए कासा मेरी दहलीज़ पे था
खाब में बोली लगाई जो अना की आदिल 
क्या बताऊँ तुम्हे क्या -क्या मेरी दहलीज़ पे था 
 जंग ओ जदल[4]

- आदिल रशीद- aadil rasheed

खोखले नारों से दुनिया को बचाया जाए - khokhale naaron se duniya ko bachaaya jae - आदिल रशीद- aadil rasheed

July 31, 2019 0 Comments

खोखले नारों से दुनिया को बचाया जाए 
दिखावा जी हुजूरी और रियाकारी [1] नहीं आती
हमारे पास भूले से ये बीमारी नहीं आती
जो बस्ती पर ये गिद्ध मडला रहे हैं बात तो कुछ है
कभी बे मसलिहत [2] इमदाद[3] सरकारी नहीं आती 
पसीने कि कमाई में नमक रोटी ही आएगी
मियां अब इतने पैसों में तो तरकारी [4]नहीं आती

- आदिल रशीद- aadil rasheed

खोखले नारों से दुनिया को बचाया जाए - khokhale naaron se duniya ko bachaaya jae - आदिल रशीद- aadil rasheed

July 31, 2019 0 Comments

खोखले नारों से दुनिया को बचाया जाए 
आज के दिन ही हलफ इसका उठाया जाए 
जब के मजदूर को हक उसका दिलाया जाए 
योमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए 

ख़ुदकुशी के लिए कोई तो सबब होता है
कोई मर जाता है एहसास ये तब होता है
भूख और प्यास का रिश्ता भी अजब होता है
जब किसी भूखे को भर पेट खिलाया जाए 
यौमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए 

अस्ल ले लेते हैं और ब्याज भी ले लेते हैं 
कल भी ले लेते थे और आज भी ले लेते हैं
दो निवालों के लिए लाज भी ले लेते हैं 
जब के हैवानों को इंसान बनाया जाये 
यौमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए 

बे गुनाहों की सजाएँ न खरीदीं जाएँ 
चन्द सिक्कों में दुआएँ न खरीदी जाएँ 
दूध के बदले में माएँ ना खरीदी जाएँ
मोल ममता का यहाँ जब न लगाया जाये 
यौमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए 

अदलो आदिल[1] कोई मजदूरों की खातिर आये 
उनके हक के लिए कोई तो मुनाजिर [2] आये 
पल दो पल के लिए फिर से कोई साहिर[3] आये 
याद जब फ़र्ज़ अदीबों को दिलाया जाये 
यौमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए 
यौमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए

- आदिल रशीद- aadil rasheed

अपने हर कौल से, वादे से पलट जाएगा - apane har kaul se, vaade se palat jaega - आदिल रशीद- aadil rasheed

July 31, 2019 0 Comments

अपने हर कौल से, वादे से पलट जाएगा
जब वो पहुंचेगा बुलंदी पे तो घट जाएगा

अपने किरदार को तू इतना भी मशकूक [2]न कर
वर्ना कंकर की तरह से दाल से छट जाएगा

जिसकी पेशानी [3]तकद्दुस [4] का पता देती है
जाने कब उस के ख्यालों से कपट जाएगा

उसके बढ़ते हुए क़दमों पे कोई तन्ज़ न कर
सरफिरा है वो,उसी वक़्त पलट जाएगा

क्या ज़रूरी है के ताने रहो तलवार सदा
मसअला घर का है बातों से निपट जाएगा

आसमानों से परे यूँ तो है वुसअत उसकी
तुम बुलाओगे तो कूजे[5]में सिमट जाएगा

- आदिल रशीद- aadil rasheed

ये चन्द रोज़ का हुस्न ओ शबाब धोका है - ye chand roz ka husn o shabaab dhoka hai - - आदिल रशीद- aadil rasheed

July 31, 2019 0 Comments

ये चन्द रोज़ का हुस्न ओ शबाब धोका है 
सदाबहार हैं कांटे गुलाब धोका है 

मिटी न याद तेरी बल्कि और बढती गई
शराब पी के ये जाना शराब धोका है 

तुम अपने अश्क छुपाओ न यूँ दम ए रुखसत 
उसूल ए इश्क में तो ये जनाब धोका है 

ये बात कडवी है लेकिन यही तजुर्बा है 
हो जिस का नाम वफ़ा वो किताब धोका है 

तमाम उम्र का वादा मैं तुम से कैसे करूँ 
ये ज़िन्दगी भी तो मिस्ल ए हुबाब धोका है 

पड़े जो ग़म तो वही मयकदे में आये रशीद 
जो कहते फिरते थे सब से "शराब" धोका है  

- आदिल रशीद- aadil rasheed

यादो के रंगों को कभी देखा है तुमने - yaado ke rangon ko kabhee dekha hai tumane - - आदिल रशीद- aadil rasheed

July 31, 2019 0 Comments

यादो के रंगों को कभी देखा है तुमने
कितने गहरे होते हैं
कभी न छूटने वाले
कपडे पर रक्त के निशान के जैसे
मुद्दतों बाद आज आया हूँ मैं
इन कालागढ़ की उजड़ी बर्बाद वादियों में
जो कभी स्वर्ग से कहीं अधिक थीं
जाति धर्म के झंझटों से दूर
सोहार्द सदभावना प्रेम की पावन रामगंगा
तीन बेटियों और एक बेटे का पिता हूँ मैं आज
परन्तु इस वादी मे आकर
ये क्या हो गया
कौन सा जादू है
वही पगडंडी जिस पर कभी
बस्ता डाले कमज़ोर कन्धों पर
जूते के फीते खुले खुले से
बाल सर के भीगे भीगे से
स्कूल की तरफ भागता ,
वापसी मे
सुकासोत की ठंडी रेट पर
जूते गले में डाले
नंगे पैरों पर वो ठंडी रेत का स्पर्श
सुरमई धुप मे
आवारा घोड़ों
और कभी कभी गधों को
हरी पत्तियों का लालच देकर पकड़ता
और उन पर सवारी करता
अपने गिरोह के साथ डाकू गब्बर सिंह
रातों को क्लब की
नंगी ज़मीन पर बैठ फिल्मे देखता
शरद ऋतू में रामलीला में
वानर सेना कभी कभी
मजबूरी में बे मन से बना
रावण सेना का एक नन्हा सिपाही
और ख़ुशी ख़ुशी रावण की हड्डीया लेकर
भागता बचपन मिल गया
आज मुद्दतों पहले
खोया हुआ
चाँद मिल गया

- आदिल रशीद- aadil rasheed

उसे तो कोई अकरब काटता है - use to koee akarab kaatata hai -- आदिल रशीद- aadil rasheed

July 31, 2019 0 Comments

उसे तो कोई अकरब काटता है 
कुल्हाड़ा पेड़ को कब काटता है 

जुदा जो गोश्त[2] को नाख़ुन से कर दे
वो मसलक[3] हो के मशरब[4] काटता है 

बहकने का नहीं इमकान[5] कोई 
अकीदा[6] सारे करतब काटता है 

कही जाती नहीं हैं जो ज़ुबाँ[7] से 
उन्ही बातों का मतलब काटता है 

वो काटेगा नहीं है खौफ़ इसका 
सितम ये है के बेढब काटता है 

तू होता साथ तो कुछ बात होती 
अकेला हूँ तो मनसब[8] काटता है 

जहाँ तरजीह[9] देते हैं वफ़ा को 
ज़माने को वो मकतब[10] काटता है 

उसे तुम ख़ून भी अपना पिला दो 
मिले मौक़ा तो अकरब[11] काटता है 

ये माना साँप है ज़हरीला बेहद 
मगर वो जब दबे तब काटता है 

अलिफ़,बे० ते० सिखाई जिस को आदिल 
मेरी बातों को वो अब काटता है

- आदिल रशीद- aadil rasheed

तपा कर इल्म की भट्टी में बालातर बनाता हूँ -tapa kar ilm kee bhattee mein baalaatar banaata hoon - आदिल रशीद- aadil rasheed

July 31, 2019 0 Comments

तपा कर इल्म की भट्टी में बालातर बनाता हूँ
जो सीना चीर दें ज़ुल्मत का वो खंजर बनाता हूँ

मैं दरया हूँ मिरा रुख मोड़ दे ये किस में हिम्मत है
मैं अपनी राह चट्टानों से टकराकर बनाता हूँ

जहाँ हर सम्त मकतल कि फज़ाएँ रक्स करती हैं
उसी बस्ती में बच्चों के लिए इक घर बनाता हूँ

किसी ने झाँक कर मुझ में मेरी अजमत न पहचानी
मैं हूँ वो सीप जो इक बूँद को गोहर बनाता हूँ

अलग है बात अब तक कामयाबी से मैं हूँ महरूम
भुलाने के तुझे मन्सूबे मैं अक्सर बनाता हूँ

- आदिल रशीद- aadil rasheed

merī chāhat kī bahut lambī sazā do mujh ko --NIKHAT IFTIKHAR

July 31, 2019 0 Comments

merī chāhat kī bahut lambī sazā do mujh ko 

karb-e-tanhā.ī meñ jiine kī duā do mujh ko 

fan tumhārā to kisī aur se mansūb huā 

koī merī hī ġhazal aa kar sunā do mujh ko 

haal behāl hai tārīk hai mustaqbil bhī 

ban paḌe tum se to maazī mirā lā do mujh ko 

āḳhirī sham.a huuñ maiñ bazm-e-vafā kī logo 

chāhe jalne do mujhe chāhe bujhā do mujh ko 

ḳhud ko rakh ke maiñ kahīñ bhuul ga.ī huuñ shāyad 

tum mirī zaat se ek baar milā do mujh ko

-NIKHAT IFTIKHAR

shauq ko āzim-e-safar rakhiye -NIKHAT IFTIKHAR

July 31, 2019 0 Comments
shauq ko āzim-e-safar rakhiye 

be-ḳhabar ban ke sab ḳhabar rakhiye 

chāhe nazreñ ho āsmānoñ par 

paañv lekin zamīn par rakhiye 

baat hai kyā ye kaun parkhegā 

aap lahje ko pur-asar rakhiye 

jaane kis vaqt kuuch karnā ho 

apnā sāmān muḳhtasar rakhiye 

ek Tuk mujh ko dekhe jaatī haiñ 

apnī nazroñ pe kuchh nazar rakhiye 

-NIKHAT IFTIKHAR

Tuesday, July 30, 2019

Tasalsal Tha Bay Khudi Ka Ya Subah Ka Ghubar Tha

July 30, 2019 0 Comments

Tasalsal Tha Bay Khudi Ka Ya Subah Ka Ghubar Tha
Aankhon Mai Uski Raat Ka Baqi Khumar Tha

Muj Ko Pla Ke Wo Bara Masroor Tha Hoa
Mai Ne Bi Jam Le Lia Muje Aetbar Tha

Mil K Bi Doston Se Bhola Na Wo Muje
Chehre Pe Thi Chmak Wo Mgar Be Qarar Tha

Wo Chor Kar Bulandion Ko Pasti Mai Chal Para
Mai Us Ka Hath Chor Deta Muje Ikhtiyar Tha

Apni Wafa Ka Izhar Use Ne Muj Se Yun Kia
Ruksat Hoa Tu Tab Bi Wo Mera Talabgar Tha

-Shabeeb Hashmi

Sunday, July 28, 2019

अजीब लोग थे वो तितलियाँ बनाते थे - ajeeb log the vo titaliyaan banaate the - - लियाक़त जाफ़री - liyaaqat jaafaree

July 28, 2019 0 Comments
अजीब लोग थे वो तितलियाँ बनाते थे 

समुंदरों के लिए सीपियाँ बनाते थे 

वही बनाते थे लोहे को तोड़ कर ताला 

फिर उस के बा'द वही चाबियाँ बनाते थे 

मेरे क़बीले में ता'लीम का रिवाज न था 

मिरे बुज़ुर्ग मगर तख़्तियाँ बनाते थे 

फ़ुज़ूल वक़्त में वो सारे शीशागर मिल कर 

सुहागनों के लिए चूड़ियाँ बनाते थे 

- लियाक़त जाफ़री - liyaaqat jaafaree

तुम्हें अब इस से ज़ियादा सज़ा नहीं दूँगा - tumhen ab is se ziyaada saza nahin doonga- लियाक़त जाफ़री - liyaaqat jaafaree

July 28, 2019 0 Comments
तुम्हें अब इस से ज़ियादा सज़ा नहीं दूँगा 

दुआएँ दूँगा मगर बद-दुआ' नहीं दूँगा 

तिरी तरफ़ से लड़ूँगा मैं तेरी हर इक जंग 

रहूँगा साथ मगर हौसला नहीं दूँगा 

तिरी ज़बान पे मौक़ूफ़ मेरे हाथ का लम्स 

निवाला दूँगा मगर ज़ाइक़ा नहीं दूँगा 

मैं पहले बोसे से ना-आश्ना रखूँगा तुम्हें 

फिर इस के बा'द तुम्हें दूसरा नहीं दूँगा 

फिर एक बार गुज़र जाओ मेरे ऊपर से 

मैं इस के बा'द तुम्हें रास्ता नहीं दूँगा 

कि तू तलाश करे और मैं तुझ को मिल जाऊँ 

मैं तेरी आँख को इतनी सज़ा नहीं दूँगा 

भगाए रक्खूँगा अपनी अदालतों में तुम्हें 

तमाम उम्र तुम्हें फ़ैसला नहीं दूँगा 

मैं उस के साथ हूँ जो उठ के फिर खड़ा हो जाए 

मैं तेरे शहर को अब ज़लज़ला नहीं दूँगा 

तिरी अना के लिए सिर्फ़ ये सज़ा है बहुत 

तू जा रहा है तो तुझ को सदा नहीं दूँगा 

कि अब की बार 'लियाक़त' हुआ हुआ सो हुआ 

मैं उस के हाथ में अब आइना नहीं दूँगा 

- लियाक़त जाफ़री - liyaaqat jaafaree

कितना दुश्वार है जज़्बों की तिजारत करना - kitana dushvaar hai jazbon kee tijaarat karana --लियाक़त जाफ़री- liyaaqat jaafaree

July 28, 2019 0 Comments
कितना दुश्वार है जज़्बों की तिजारत करना
एक ही शख़्स से दो बार मोहब्बत करना
जिस को तुम चाहो कोई और चाहे उस को
इस को कहते हैं मोहब्बत में सियासत करना
सुरमई आँख हसीं जिस्म गुलाबी चेहरा
इस को कहते हैं किताबत पे किताबत करना
दिल की तख़्ती पे भी आयात लिखी रहती हैं
वक़्त मिल जाए तो उन की भी तिलावत करना
देख लेना बड़ी तस्कीन मिलेगी तुम को
ख़ुद से इक रोज़ कभी अपनी शिकायत करना
जिस में कुछ क़ब्रें हों कुछ चेहरे हों कुछ यादें हों
कितना दुश्वार है उस शहर से हिजरत करना
-लियाक़त जाफ़री

Ya toh miT jaaiye ya miTa dijiye- – Wajida Tabassum

July 28, 2019 0 Comments
Ya toh miT jaaiye ya miTa dijiye,
kijiye jab bhi sauda khara kijiye.
Ab jafa kijiye ya wafa kijiye,
aakhari waqt hai bas dua kijiye.

Apne chehre se zulfen hata dijiye,
aur phir chaand ka saamana kijiye.

Har taraf phool hi phool khil jayenge,
aap aise hi hanste raha kijiye.

Aap ki ye hansi jaise ghoongharu baje
aur qayaamat hai kya ye bata dijiye. !!

– Wajida Tabassum

Ki zindagi teri zulfon ki naram chhaaon mein

July 28, 2019 0 Comments
Ki zindagi teri zulfon ki naram chhaaon mein,
guzrne paati toh shaadaab ho bhi saktii thi.
Ye teeragi jo meri zeest ka muqaddar hai,
teri nazar ki shuaaon mein kho bhi sakti thi.

Ajab na tha ki main begaana-e-aalam ho kar,
teri jamaal ki raanaaiyon mein kho rehta.
Tera gudaaz badan, teri neembaaz aankhen
inhin haseen fasaanon mein mahv ho rehta.

Pukaarti mujhe jab talkhiyaan zamaane ki,
tere labon se halaavat ke ghoont pee leta.
Hayaat cheekhti phirti barhana- sar aur main,
ghaneri zulfon ke saaye mein chhup ke jee leta.

Magar ye ho na saka aur ab ye aalam hai..
ki tu nahin.. tera ghum, teri justajoo bhi nahin.
Guzar rahi hai kuchh is tarah zindagi jaise,
isey kisi ke sahaare ki aarzoo bhi nahin.

Zamaane bhar ke dukhon ko laga chuka hun gale,
guzar reha hun kuchh anjaani rah-guzaaron se.
Muheeb saaye meri simt badhte aate hain,
hayaat-o maut ke purhaul khaarzaaron se..

Na koi jaada, na manzil, na roshni ka suraagh
bhatak rahi hai khalaaon mein zindagi meri.
Inhi khalaaon mein reh jaaunga kabhi kho kar,
main jaanta hun meri hum-nafas magar yun hi..

Kabhi kabhi mere dil mein khyaal aata hai …….

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