Posts

Showing posts with the label poem

मुझ मिटटी को घोलकर समंदर बनाया है | अम्बिका राही - Ambika Rahee

प्रिय देवी जी, हर जगह आपका होना, महसूस कर पा रहा हूँ, धीरे- धीरे मेरे रूह में घुलते जा रहे हो, जैसे धीरे-धीरे पानी में चीनी घुलती है | और देख पा रहा हूँ, आपका प्रतिविम्ब होता जा रहा हूँ | महसूस कर पा रहा हूँ, उन हवाओं को, जो आपकी तरफ से होकर आ रही है| उनमें आपके होने की खबर मौजूद है, मैं महसूस कर पा रहा हूँ आपकी दिव्यता, आपके स्वाभिमान, आपके समर्पण को, आपकी सादगी और आपके प्यार को| हम कृतज्ञ है, जो राही को अपना माना है, मुझ मिटटी को घोलकर समंदर बनाया है | कविता@अम्बिका राही

छाया मत छूना | गिरिजाकुमार माथुर | Poemgazalshayari.in

 छाया मत छूना | गिरिजाकुमार माथुर | Poemgazalshayari.in  छाया मत छूना मन होता है दुख दूना मन जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी; तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी, कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी। भूली-सी एक छुअन बनता हर जीवित क्षण छाया मत छूना मन होगा दुख दूना मन यश है न वैभव है, मान है न सरमाया; जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया। प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्‍णा है, हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्‍णा है। जो है यथार्थ कठिन उसका तू कर पूजन- छाया मत छूना मन होगा दुख दूना मन दुविधा-हत साहस है, दिखता है पंथ नहीं देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं। दुख है न चाँद खिला शरद-रात आने पर, क्‍या हुया जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर? जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्‍य वरण, छाया मत छूना मन होगा दुख दूना मन हमारे इस पोस्ट को पढ़ने के लिए हम आपका आभार व्यक्त करते है | इस जानकारी को ज्यादा से ज्यादा Facebook, Whatsapp जैसे सोशल मिडिया पर जरूर शेयर करें | धन्यवाद  !!! www.poemgazalshayari.in

बरसों के बाद कभी हम तुम यदि मिलें कहीं | गिरिजाकुमार माथुर | Girija Kumar Mathur

 गिरिजाकुमार माथुर | Girija Kumar Mathur बरसों के बाद कभी हम तुम यदि मिलें कहीं, देखें कुछ परिचित से, लेकिन पहिचानें ना। याद भी न आये नाम, रूप, रंग, काम, धाम, सोचें,यह सम्भव है - पर, मन में मानें ना। हो न याद, एक बार आया तूफान, ज्वार बंद, मिटे पृष्ठों को - पढ़ने की ठाने ना। बातें जो साथ हुई, बातों के साथ गयीं, आँखें जो मिली रहीं - उनको भी जानें ना। हमारे इस पोस्ट को पढ़ने के लिए हम आपका आभार व्यक्त करते है | इस जानकारी को ज्यादा से ज्यादा Facebook, Whatsapp जैसे सोशल मिडिया पर जरूर शेयर करें | धन्यवाद  !!! www.poemgazalshayari.in

इतना मत दूर रहो गन्ध कहीं खो जाए | गिरिजाकुमार माथुर | Poemgazalshayari

 इतना मत दूर रहो गन्ध कहीं खो जाए | गिरिजाकुमार माथुर  इतना मत दूर रहो गन्ध कहीं खो जाए आने दो आँच रोशनी न मन्द हो जाए देखा तुमको मैंने कितने जन्मों के बाद चम्पे की बदली सी धूप-छाँह आसपास घूम-सी गई दुनिया यह भी न रहा याद बह गया है वक़्त लिए मेरे सारे पलाश ले लो ये शब्द गीत भी कहीं न सो जाए आने दो आँच रोशनी न मन्द हो जाए उत्सव से तन पर सजा ललचाती मेहराबें खींच लीं मिठास पर क्यों शीशे की दीवारें टकराकर डूब गईं इच्छाओं की नावें लौट-लौट आई हैं मेरी सब झनकारें नेह फूल नाजुक न खिलना बन्द हो जाए आने दो आँच रोशनी न मन्द हो जाए. क्या कुछ कमी थी मेरे भरपूर दान में या कुछ तुम्हारी नज़र चूकी पहचान में या सब कुछ लीला थी तुम्हारे अनुमान में या मैंने भूल की तुम्हारी मुस्कान में खोलो देह-बन्ध मन समाधि-सिन्धु हो जाए आने दो आँच रोशनी न मन्द हो जाए इतना मत दूर रहो गन्ध कहीं खो जाए हमारे इस पोस्ट को पढ़ने के लिए हम आपका आभार व्यक्त करते है | इस जानकारी को ज्यादा से ज्यादा Facebook, Whatsapp जैसे सोशल मिडिया पर जरूर शेयर करें | धन्यवाद  !!! www.poemgazalshayari.in

मेरे युवा आम में नया बौर आया है | गिरिजाकुमार माथुर | Poemgazalshayari

मेरे युवा आम में नया बौर आया है | गिरिजाकुमार माथुर  मेरे युवा-आम में नया बौर आया है ख़ुशबू बहुत है क्योंकि तुमने लगाया है आएगी फूल-हवा अलबेली मानिनी छाएगी कसी-कसी अँबियों की चाँदनी चमकीले, मँजे अंग चेहरा हँसता मयंक खनकदार स्वर में तेज गमक-ताल फागुनी मेरा जिस्म फिर से नया रूप धर आया है ताज़गी बहुत है क्योंकि तुमने सजाया है। अन्धी थी दुनिया या मिट्टी-भर अन्धकार उम्र हो गई थी एक लगातार इन्तज़ार जीना आसान हुआ तुमने जब दिया प्यार हो गया उजेला-सा रोओं के आर-पार एक दीप ने दूसरे को चमकाया है रौशनी के लिए दीप तुमने जलाया है कम न हुई, मरती रही केसर हर साँस से हार गया वक़्त मन की सतरंगी आँच से कामनाएँ जीतीं जरा-मरण-विनाश से मिल गया हरेक सत्य प्यार की तलाश से थोड़े ही में मैंने सब कुछ भर पाया है तुम पर वसन्त क्योंकि वैसा ही छाया है हमारे इस पोस्ट को पढ़ने के लिए हम आपका आभार व्यक्त करते है | इस जानकारी को ज्यादा से ज्यादा Facebook, Whatsapp जैसे सोशल मिडिया पर जरूर शेयर करें | धन्यवाद  !!! www.poemgazalshayari.in

गत माह, दो बड़े घाव - gat maah, do bade ghaav -फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

 गत माह, दो बड़े घाव धरती पर हुए, हमने देखा नक्षत्र खचित आकाश से दो बड़े नक्षत्र झरे!! रस के, रंग के-- दो बड़े बूंद ढुलक-ढुलक गए। कानन कुंतला पृथ्वी के दो पुष्प गंधराज सूख गए!! (हमारे चिर नवीन कवि, हमारे नवीन विश्वकवि दोनों एक ही रोग से एक ही माह में- गए आश्चर्य?) तुमने देखा नहीं--सुना नहीं? (भारत में) कानपुर की माटी-माँ, उस दिन लोरी गा-गा कर अपने उस नटखट शिशु को प्यार से सुला रही थी! (रूस में)पिरिदेलकिना गाँव के उस गिरजाघर के पास- एक क्रास... एक मोमबत्ती एक माँ... एक पुत्र... अपूर्व छवि माँ-बेटे की! मिलन की!! ... तुमने देखी? यह जो जीवन-भर उपेक्षित, अवहेलित दमित द्मित्रि करमाज़व के (अर्थात बरीस पस्तेरनाक; अर्थात एक नवीन जयघोष मानव का!)के अन्दर का कवि क्रांतदर्शी-जनयिता, रचयिता (...परिभू: स्वयंभू:...) ले आया एक संवाद आदित्य वर्ण अमृत-पुत्र का : अमृत पर हमारा है जन्मगत अधिकार! तुमने सुना नहीं वह आनंद मंत्र? [आश्चर्य! लाखों टन बर्फ़ के तले भी धड़कता रहा मानव-शिशु का हृत-पिंड? निरंध्र आकाश को छू-छू कर एक गूंगी, गीत की कड़ी- मंडराती रही और अंत में- समस्त सुर-संसार के साथ गूँज उठी! धन्य ...

कि अब तू हो गई मिट्टी सरहदी - फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

 कि अब तू हो गई मिट्टी सरहदी इसी से हर सुबह कुछ पूछता हूँ तुम्हारे पेड़ से, पत्तों से दरिया औ' दयारों से सुबह की ऊंघती-सी, मदभरी ठंडी हवा से कि बोलो! रात तो गुज़री ख़ुशी से? कि बोलो! डर नहीं तो है किसी का? तुम्हारी सर्द आहों पर सशंकित सदा एकांत में मैं सूंघता हूँ उठाकर चंद ढेले उठाकर धूल मुट्ठी-भर कि मिट्टी जी रही है तो! बला से जलजला आए बवंडर-बिजलियाँ-तूफ़ाँ हज़ारों ज़ुल्म ढाएँ अगर ज़िंदी रही तू फिर न परवाह है किसी की नहीं है सिर पे गोकि 'स्याह-टोपी' नहीं हूँ 'प्राण-हिन्दू' तो हुआ क्या? घुमाता हूँ नहीं मैं रोज़ डंडे-लाठियाँ तो! सुनाता हूँ नहीं-- गांधी-जवाहर, पूज्यजन को गालियाँ तो! सिर्फ़ 'हिंदी' रहा मैं सिर्फ़ ज़िंदी रही तू और हमने सब किया अब तक! सिर्फ़ दो-चार क़तरे 'ध्रुव' का ताज़ा लहू ही बड़ी फ़िरकापरस्ती फ़ौज को भी रोक लेगा कमीनी हरक़तों को रोक लेगा कि अब तो हो गई मिट्टी सरहदी (इसी से डर रहा हूँ!) कि मिट्टी मर गई पंजाब की थी शेरे-पंजाब के प्यारे वतन की 'भगत' फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

साजन! होली आई है - saajan! holee aaee hai | फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

 साजन! होली आई है! सुख से हँसना जी भर गाना मस्ती से मन को बहलाना पर्व हो गया आज- साजन! होली आई है! हँसाने हमको आई है! साजन! होली आई है! इसी बहाने क्षण भर गा लें दुखमय जीवन को बहला लें ले मस्ती की आग- साजन! होली आई है! जलाने जग को आई है! साजन! होली आई है! रंग उड़ाती मधु बरसाती कण-कण में यौवन बिखराती, ऋतु वसंत का राज- लेकर होली आई है! जिलाने हमको आई है! साजन! होली आई है! खूनी और बर्बर लड़कर-मरकर- मधकर नर-शोणित का सागर पा न सका है आज- सुधा वह हमने पाई है! साजन! होली आई है! साजन! होली आई है! यौवन की जय! जीवन की लय! गूँज रहा है मोहक मधुमय उड़ते रंग-गुलाल मस्ती जग में छाई है साजन! होली आई है! फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

दुनिया दूषती है - duniya dooshatee hai - फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

 दुनिया दूषती है हँसती है उँगलियाँ उठा कहती है ... कहकहे कसती है - राम रे राम! क्या पहरावा है क्या चाल-ढाल सबड़-झबड़ आल-जाल-बाल हाल में लिया है भेख? जटा या केश? जनाना-ना-मर्दाना या जन ....... अ... खा... हा... हा.. ही.. ही... मर्द रे मर्द दूषती है दुनिया मानो दुनिया मेरी बीवी हो-पहरावे-ओढ़ावे चाल-ढाल उसकी रुचि, पसंद के अनुसार या रुचि का सजाया-सँवारा पुतुल मात्र, मैं मेरा पुरुष बहुरूपिया। फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

कहाँ गायब थे मंगरू?'-किसी ने चुपके से पूछा | kahaan gaayab the mangaroo?-kisee ne chupake se poochha | फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

 कहाँ गायब थे मंगरू? - किसी ने चुपके से पूछा। वे बोले- यार, गुमनामियाँ जाहिल मिनिस्टर था। बताया काम अपने महकमे का तानकर सीना- कि मक्खी हाँकता था सबके छोए के कनस्टर का। सदा रखते हैं करके नोट सब प्रोग्राम मेरा भी, कि कब सोया रहूंगा औ' कहाँ जलपान खाऊंगा। कहाँ 'परमिट' बेचूंगा, कहाँ भाषण हमारा है, कहाँ पर दीन-दुखियों के लिए आँसू बहाऊंगा। 'सुना है जाँच होगी मामले की?' -पूछते हैं सब ज़रा गम्भीर होकर, मुँह बनाकर बुदबुदाता हूँ! मुझे मालूम हैं कुछ गुर निराले दाग धोने के, 'अंहिसा लाउंड्री' में रोज़ मैं कपड़े धुलाता हूँ। फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

मेरे मन के आसमान में पंख पसारे - mere man ke aasamaan mein pankh pasaare -फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

 मेरे मन के आसमान में पंख पसारे उड़ते रहते अथक पखेरू प्यारे-प्यारे! मन की मरु मैदान तान से गूँज उठा थकी पड़ी सोई-सूनी नदियाँ जागीं तृण-तरू फिर लह-लह पल्लव दल झूम रहा गुन-गुन स्वर में गाता आया अलि अनुरागी यह कौन मीत अगनित अनुनय से निस दिन किसका नाम उतारे! हौले, हौले दखिन-पवन-नित डोले-डोले द्वारे-द्वारे! बकुल-शिरिष-कचनार आज हैं आकुल माधुरी-मंजरी मंद-मधुर मुस्काई क्रिश्नझड़ा की फुनगी पर अब रही सुलग सेमन वन की ललकी-लहकी प्यासी आगी जागो मन के सजग पथिक ओ! अलस-थकन के हारे-मारे कब से तुम्हें पुकार रहे हैं गीत तुम्हारे इतने सारे! फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

सुंदरियो-यो-यो हो-हो | फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

 सुंदरियो-यो-यो हो-हो अपनी-अपनी छातियों पर दुद्धी फूल के झुके डाल लो ! नाच रोको नहीं। बाहर से आए हुए इस परदेशी का जी साफ नहीं। इसकी आँखों में कोई आँखें न डालना। यह ‘पचाई’ नहीं बोतल का दारू पीता है। सुंदरियो जी खोलकर हँसकर मत मोतियों की वर्षा करना काम-पीड़ित इस भले आदमी को विष-भरी हँसी से जलाओ। यों, आदमी यह अच्छा है नाच देखना सीखना चाहता है। फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

दुनिया दूषती है - फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

 दुनिया दूषती है हँसती है उँगलियाँ उठा कहती है ... कहकहे कसती है - राम रे राम! क्या पहरावा है क्या चाल-ढाल सबड़-झबड़ आल-जाल-बाल हाल में लिया है भेख? जटा या केश? जनाना-ना-मर्दाना या जन ....... अ... खा... हा... हा.. ही.. ही... मर्द रे मर्द दूषती है दुनिया मानो दुनिया मेरी बीवी हो-पहरावे-ओढ़ावे चाल-ढाल उसकी रुचि, पसंद के अनुसार या रुचि का सजाया-सँवारा पुतुल मात्र, मैं मेरा पुरुष बहुरूपिया। फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

इस ब्लाक के मुख्य प्रवेश-द्वार - फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

 इस ब्लाक के मुख्य प्रवेश-द्वार के समने हर मौसम आकर ठिठक जाता है सड़क के उस पार चुपचाप दोनों हाथ बगल में दबाए साँस रोके ख़ामोश इमली की शाखों पर हवा 'ब्लाक' के अन्दर एक ही ऋतु हर 'वार्ड' में बारहों मास हर रात रोती काली बिल्ली हर दिन प्रयोगशाला से बाहर फेंकी हुई रक्तरंजित सुफ़ेद खरगोश की लाश 'ईथर' की गंध में ऊंघती ज़िन्दगी रोज़ का यह सवाल, 'कहिए! अब कैसे हैं?' रोज़ का यह जवाब-- ठीक हूँ! सिर्फ़ कमज़ोरी थोड़ी खाँसी और तनिक-सा... यहाँ पर... मीठा-मीठा दर्द! इमर्जेंसी-वार्ड की ट्रालियाँ हड़हड़-भड़भड़ करती आपरेशन थियेटर से निकलती हैं- इमर्जेंसी! सैलाइन और रक्त की बोतलों में क़ैद ज़िन्दगी! -रोग-मुक्त, किन्तु बेहोश काया में बूंद-बूंद टपकती रहती है- इमर्जेंसी! सहसा मुख्य द्वार पर ठिठके हुए मौसम और तमाम चुपचाप हवाएँ एक साथ मुख और प्रसन्न शुभकामना के स्वर- इमर्जेंसी! फणीश्वर नाथ रेणु - Phanishwar Nath Renu

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती himaadri tung shrng se prabuddh shuddh bhaaratee जयशंकर प्रसाद Jay Shankar Prasad

Image
हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती 'अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!' असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी सपूत मातृभूमि के- रुको न शूर साहसी! अराति सैन्य सिंधु में, सुवाडवाग्नि से जलो, प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो, बढ़े चलो! जयशंकर_प्रसाद - Jay Shankar Prasad

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती himaadri tung shrng se prabuddh shuddh bhaaratee जयशंकर प्रसाद Jay Shankar Prasad

Image
हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ हैं - बढ़े चलो बढ़े चलो। असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी। सपूत मातृभूमि के रुको न शूर साहसी। अराति सैन्य सिंधु में - सुबाड़वाग्नि से जलो, प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो बढ़े चलो। जयशंकर प्रसाद  Jay Shankar Prasad

झर गये तुम्हारे पात jhar gaye tumhaare paat sachchidanand hiranand vatsyayan agay सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय

Image
झर गये तुम्हारे पात - सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" झर गये तुम्हारे पात मेरी आशा नहीं झरी। जर गये तुम्हारे दिये अंग मेरी ही पीड़ा नहीं जरी। मर गयी तुम्हारी सिरजी जीवन-रसना-शक्ति-जिजीविषा मेरी नहीं मरी। टर गये मेरे उद्यम, साहस-कर्म, तुम्हारी करुणा नहीं टरी! sachchidanand hiranand vatsyayan agay- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय

चक्रान्त शिला chakraant shila sachchidanand hiranand vatsyayan सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन

1. असीम, छा रहा ऊपर नीचे यह महामौन की सरिता दिग्विहीन बहती है। यह बीच-अधर, मन रहा टटोल प्रतीकों की परिभाषा आत्मा में जो अपने ही से खुलती रहती है। रूपों में एक अरूप सदा खिलता है, गोचर में एक अगोचर, अप्रमेय, अनुभव में एक अतीन्द्रिय, पुरुषों के हर वैभव में ओझल अपौरुषेय मिलता है। मैं एक, शिविर का प्रहरी, भोर जगा अपने को मौन नदी के खड़ा किनारे पाता हूँ मैं, मौन-मुखर, सब छन्दों में उस एक साथ अनिर्वच, छन्द-मुक्त को गाता हूँ। 2. वन में एक झरना बहता है एक नर-कोकिल गाता है वृक्षों में एक मर्मर कोंपलों को सिहराता है, एक अदृश्य क्रम नीचे ही नीचे झरे पत्तों को पचाता है। अंकुर उगाता है। मैं सोते के साथ बहता हूँ, पक्षी के साथ गाता हूँ, वृक्षों के कोंपलों के साथ थरथराता हूँ, और उसी अदृश्य क्रम में, भीतर ही भीतर झरे पत्तों के साथ गलता और जीर्ण होता रहता हूँ नये प्राण पाता हूँ। पर सब से अधिक मैं वन के सन्नाटे के साथ मौन हूँ- क्योंकि वही मुझे बतलाता है कि मैं कौन हूँ, जोड़ता है मुझ को विराट् से जो मौन, अपरिवर्त है...