समझ लिया था बस इक जंग जीत कर हमने - samajh liya tha bas ik jang jeet kar hamane - - आदिल रशीद- aadil rasheed


समझ लिया था बस इक जंग जीत कर हमने 
के हमने मंज़िल-ऐ-मक़सूद[1] पर क़दम रक्खे 
जो ख़्वाब आँखों में पाले हुए थे मुद्दत से 
वो ख़्वाब पूरा हुआ आई है चमन में बहार
मिरे दिमाग में लेकिन सवाल उठते हैं 
क्यूँ हक बयानी[2] का सूली है आज भी ईनाम ? 
क्यूँ लोग अपने घरों से निकलते डरते हैं ?
क्यूँ तोड़ देती हें दम कलियाँ खिलने से पहले ?
क्यूँ पेट ख़ाली के ख़ाली हैं खूँ बहा कर भी ?
क्यूँ मोल मिटटी के अब इंतिकाम बिकता है? 
क्यूँ आज बर्फ़ के खेतों में आग उगती है ? 
अभी तो ऐसे सवालों से लड़नी है जंगें 
अभी है दूर बहुत ,बहुत दूर मंज़िल-ऐ-मक़सूद

- आदिल रशीद- aadil rasheed

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