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Saturday, March 14, 2020

हर क़दम कहता है तू आया है जाने के लिए- har qadam kahata hai too aaya hai jaane ke lie-अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments
हर क़दम कहता है तू आया है जाने के लिए
मंज़िल-ए-हस्ती नहीं है दिल लगाने के लिए

क्या मुझे ख़ुश आए ये हैरत-सरा-ए-बे-सबात
होश उड़ने के लिए है जान जाने के लिए

दिल ने देखा है बिसात-ए-क़ुव्वत-ए-इदराक को
क्या बढ़े इस बज़्म में आँखें उठाने के लिए

ख़ूब उम्मीदें बंधीं लेकिन हुईं हिरमाँ नसीब
बदलियाँ उट्ठीं मगर बिजली गिराने के लिए

साँस की तरकीब पर मिट्टी को प्यार आ ही गया
ख़ुद हुई क़ैद उस को सीने से लगाने के लिए

जब कहा मैं ने भुला दो ग़ैर को हँस कर कहा
याद फिर मुझ को दिलाना भूल जाने के लिए

दीदा-बाज़ी वो कहाँ आँखें रहा करती हैं बंद
जान ही बाक़ी नहीं अब दिल लगाने के लिए

मुझ को ख़ुश आई है मस्ती शेख़ जी को फ़रबही
मैं हूँ पीने के लिए और वो हैं खाने के लिए

अल्लाह अल्लाह के सिवा आख़िर रहा कुछ भी न याद
जो किया था याद सब था भूल जाने के लिए

सुर कहाँ के साज़ कैसा कैसी बज़्म-ए-सामईन
जोश-ए-दिल काफ़ी है अकबर तान उड़ाने के लिए

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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charkh se kuchh ummeed thee hee nahin - Charkh se kuchh ummeed thee hee nahin -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments


चर्ख़ से कुछ उम्मीद थी ही नहीं
आरज़ू मैं ने कोई की ही नहीं

मज़हबी बहस मैं ने की ही नहीं
फ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं

चाहता था बहुत सी बातों को
मगर अफ़सोस अब वो जी ही नहीं

जुरअत-ए-अर्ज़-ए-हाल क्या होती
नज़र-ए-लुत्फ़ उस ने की ही नहीं

इस मुसीबत में दिल से क्या कहता
कोई ऐसी मिसाल थी ही नहीं

आप क्या जानें क़द्र-ए-'या-अल्लाह'
जब मुसीबत कोई पड़ी ही नहीं

शिर्क छोड़ा तो सब ने छोड़ दिया
मेरी कोई सोसाइटी ही नहीं

पूछा ‘अकबर’ है आदमी कैसा
हँस के बोले वो आदमी ही नहीं

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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ग़म्ज़ा नहीं होता के इशारा नहीं होता - gamza nahin hota ke ishaara nahin hota -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

ग़म्ज़ा नहीं होता के इशारा नहीं होता
आँख उन से जो मिलती है तो क्या क्या नहीं होता

जलवा न हो मानी का तो सूरत का असर क्या
बुलबुल गुल-ए-तस्वीर का शैदा नहीं होता

अल्लाह बचाए मरज़-ए-इश्क़ से दिल को
सुनते हैं कि ये आरिज़ा अच्छा नहीं होता

तश्बीह तेरे चेहरे को क्या दूँ गुल-ए-तर से
होता है शगुफ़्ता मगर इतना नहीं होता

मैं नज़ा में हूँ आएँ तो एहसान है उन का
लेकिन ये समझ लें के तमाशा नहीं होता

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बद-नाम
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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हूँ मैं परवाना मगर शम्मा तो हो रात तो हो - hoon main paravaana magar shamma to ho raat to ho -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

हूँ मैं परवाना मगर शम्मा तो हो रात तो हो
जान देने को हूँ मौजूद कोई बात तो हो

दिल भी हाज़िर सर-ए-तसलीम भी ख़म को मौजूद
कोई मरकज़ हो कोई क़िबला-ए-हाजात तो हो

दिल तो बे-चैन है इज़्हार-ए-इरादत के लिए
किसी जानिब से कुछ इज़्हार-ए-करामात तो हो

दिल-कुशा बादा-ए-साफ़ी का किसे ज़ौक़ नहीं
बातिन-अफ़रोज़ कोई पीर-ए-ख़राबात तो हो

गुफ़्तनी है दिल-ए-पुर-दर्द का क़िस्सा लेकिन
किस से कहिए कोई मुस्तफ़्सिर-ए-हालात तो हो

दास्तान-ए-ग़म-ए-दिल कौन कहे कौन सुने
बज़्म में मौक़ा-ए-इज़्हार-ए-ख़्यालात तो हो

वादे भी याद दिलाते हैं गिले भी हैं बहुत
वो दिखाई भी तो दें उन से मुलाक़ात तो हो

कोई वाइज़ नहीं फ़ितरत से बलाग़त में सिवा
मगर इंसान में कुछ फ़हम-ए-इशारात तो हो

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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जहाँ में हाल मेरा इस क़दर ज़बून हुआ - jahaan mein haal mera is qadar zaboon hua - अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments
जहाँ में हाल मेरा इस क़दर ज़बून हुआ
कि मुझ को देख के बिस्मिल को भी सुकून हुआ

ग़रीब दिल ने बहुत आरज़ूएँ पैदा कीं
मगर नसीब का लिक्खा कि सब का ख़ून हुआ

वो अपने हुस्न से वाक़िफ़ मैं अपनी अक़्ल से सैर
उन्हों ने होश सँभाला मुझे जुनून हुआ

उम्मीद-ए-चश्म-ए-मुरव्वत कहाँ रही बाक़ी
ज़रिया बातों का जब सिर्फ़ टेलीफ़ोन हुआ

निगाह-ए-गर्म क्रिसमस में भी रही हम पर
हमारे हक़ में दिसम्बर भी माह-ए-जून हुआ

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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जो तुम्हारे लब-ए-जाँ-बख़्श का शैदा होगा - jo tumhaare lab-e-jaan-bakhsh ka shaida hoga - अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

जो तुम्हारे लब-ए-जाँ-बख़्श का शैदा होगा
उठ भी जाएगा जहाँ से तो मसीहा होगा

वो तो मूसा हुआ जो तालिब-ए-दीदार हुआ
फिर वो क्या होगा कि जिस ने तुम्हें देखा होगा

क़ैस का ज़िक्र मेरे शान-ए-जुनूँ के आगे
अगले वक़्तों का कोई बादया-पैमा होगा

आरज़ू है मुझे इक शख़्स से मिलने की बहुत
नाम क्या लूँ कोई अल्लाह का बंदा होगा

लाल-ए-लब का तेरे बोसा तो मैं लेता हूँ मगर
डर ये है ख़ून-ए-जिगर बाद में पीना होगा

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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सदियों फ़िलासफ़ी की चुनाँ और चुनीं रही - sadiyon filaasafee kee chunaan aur chuneen rahee -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

सदियों फ़िलासफ़ी की चुनाँ और चुनीं रही
लेकिन ख़ुदा की बात जहाँ थी वहीं रही

ज़ोर-आज़माइयाँ हुईं साइंस की भी ख़ूब
ताक़त बढ़ी किसी की किसी में नहीं रही

दुनिया कभी न सुल्ह पे माइल हुई मगर
बाहम हमेशा बरसर-ए-पैकार-ओ-कीं रही

पाया अगर फ़रोग़ तो सिर्फ़ उन नुफ़ूस ने
जिन की कि ख़िज़्र-ए-राह फ़क़त शम्मा-ए-दीं रही

अल्लाह ही की याद बहर-हाल ख़ल्क़ में
वजह-ए-सुकून-ए-ख़ातिर-ए-अंदोह-गीं रही

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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वो हवा न रही वो चमन न रहा वो गली न रही वो हसीं न रहे -vo hava na rahee vo chaman na raha vo galee na rahee vo haseen na rahe - अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments


वो हवा न रही वो चमन न रहा वो गली न रही वो हसीं न रहे
वो फ़लक न रहा वो समाँ न रहा वो मकाँ न रहे वो मकीं न रहे

वो गुलों में गुलों की सी बू न रही वो अज़ीज़ों में लुत्फ़ की ख़ू न रही
वो हसीनों में रंग-ए-वफ़ा न रहा कहें और की क्या वो हमीं न रहे

न वो आन रही न उमंग रही न वो रिंदी ओ ज़ोह्द की जंग रही
सू-ए-क़िबला निगाहों के रुख़ न रहे और दैर पे नक़्श-ए-जबीं न रहे

न वो जाम रहे न वो मस्त रहे न फ़िदाई-ए-अहद-ए-अलस्त रहे
वो तरीक़ा-ए-कार-ए-जहाँ न रहा वो मशाग़िल-ए-रौनक़-ए-दीं न रहे

हमें लाख ज़माना लुभाए तो क्या नए रंग जो चर्ख़ दिखाए तो क्या
ये मुहाल है अहल-ए-वफ़ा कि लिए ग़म-ए-मिल्लत ओ उल्फ़त-ए-दीं न रहे

तेरे कूचा-ए-ज़ुल्फ़ में दिल है मेरा अब उसे मैं समझता हूँ दाम-ए-बला
ये अजीब सितम है अजीब जफ़ा कि यहाँ न रहे तो कहीं न रहे

ये तुम्हारे ही दम से है बज़्म-ए-तरब अभी जाओ न तुम न करो ये ग़ज़ब
कोई बैठ के लुत्फ़ उठाएगा क्या कि जो रौनक़-ए-बज़्म तुम्हीं न रहे

जो थीं चश्म-ए-फ़लक की भी नूर-ए-नज़र वही जिन पे निसार थे शम्स ओ क़मर
सो अब ऐसी मिटी हैं वो अंजुमनें कि निशान भी उन के कहीं न रहे

वही सूरतें रह गईं पेश-ए-नज़र जो ज़माने को फेरें इधर से उधर
मगर ऐसे जमाल-ए-जहाँ-आरा जो थे रौनक़-ए-रू-ए-ज़मीं न रहे

ग़म ओ रंज में ‘अकबर’ अगर है घिरा तो समझ ले कि रंज को भी है फ़ना
किसी शय को नहीं है जहाँ में बक़ा वो ज़्यादा मलूल ओ हज़ीं न रहे

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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मायूस कर रहा है नई रोशनी का रंग - maayoos kar raha hai naee roshanee ka rang -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments
मायूस कर रहा है नई रोशनी का रंग
इसका न कुछ अदब है न एतबार है

तक़दीस मास्टर की न लीडर का फ़ातेहा
यानी न नूरे-दिल है, न शमये मज़ार है

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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जो हस्रते दिल है, वह निकलने की नहीं - jo hasrate dil hai, vah nikalane kee nahin -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

जो हस्रते दिल है, वह निकलने की नहीं
जो बात है काम की, वह चलने की नहीं

यह भी है बहुत कि दिल सँभाले रहिए
क़ौमी हालत यहाँ सँभलने की नहीं

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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ख़ैर उनको कुछ न आए फाँस लेने के सिवा - khair unako kuchh na aae phaans lene ke siva -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

ख़ैर उनको कुछ न आए फाँस लेने के सिवा
मुझको अब करना ही क्या है साँस लेने के सिवा

थी शबे-तारीक, चोर आए, जो कुछ था ले गए
कर ही क्या सकता था बन्दा खाँस लेने के सिवा

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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उससे तो इस सदी में नहीं हम को कुछ ग़रज़ - usase to is sadee mein nahin ham ko kuchh garaz -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments
उससे तो इस सदी में नहीं हम को कुछ ग़रज़
सुक़रात बोले क्या और अरस्तू ने क्या कहा

बहरे ख़ुदा ज़नाब यह दें हम को इत्तेला
साहब का क्या जवाब था, बाबू ने क्या कहा

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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ग़म क्या जो आसमान है मुझसे फिरा हुआ - gam kya jo aasamaan hai mujhase phira hua- अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

ग़म क्या जो आसमान है मुझसे फिरा हुआ
मेरी नज़र से ख़ुद है ज़माना घिरा हुआ

मग़रिब ने खुर्दबीं से कमर उनकी देख ली
मशरिक की शायरी का मज़ा किरकिरा हुआ

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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अफ़्सोस है गुल्शन ख़िज़ाँ लूट रही है - afsos hai gulshan khizaan loot rahee hai -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

अफ़्सोस है गुल्शन ख़िज़ाँ लूट रही है
शाख़े-गुले-तर सूख के अब टूट रही है

इस क़ौम से वह आदते-देरीनये-ताअत
बिलकुल नहीं छूटी है मगर छूट रही है

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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मुँह देखते हैं हज़रत, अहबाब पी रहे हैं - munh dekhate hain hazarat, ahabaab pee rahe hain -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments


मुँह देखते हैं हज़रत, अहबाब पी रहे हैं
क्या शेख़ इसलिए अब दुनिया में जी रहे हैं

मैंने कहा जो उससे, ठुकरा के चल न ज़ालिम
हैरत में आके बोला, क्या आप जी रहे हैं?

अहबाब उठ गए सब, अब कौन हमनशीं हो
वाक़िफ़ नहीं हैं जिनसे, बाकी वही रहे हैं

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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हम कब शरीक होते हैं दुनिया की ज़ंग में - ham kab shareek hote hain duniya kee zang mein -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

हम कब शरीक होते हैं दुनिया की ज़ंग में
वह अपने रंग में हैं, हम अपनी तरंग में

मफ़्तूह हो के भूल गए शेख़ अपनी बहस
मन्तिक़ शहीद हो गई मैदाने ज़ंग में

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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तहज़ीब के ख़िलाफ़ है जो लाये राह पर - tahazeeb ke khilaaf hai jo laaye raah par -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

तहज़ीब के ख़िलाफ़ है जो लाये राह पर
अब शायरी वह है जो उभारे गुनाह पर

क्या पूछते हो मुझसे कि मैं खुश हूँ या मलूल
यह बात मुन्हसिर है तुम्हारी निगाह पर

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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काम कोई मुझे बाकी नहीं मरने के सिवा - kaam koee mujhe baakee nahin marane ke siva - अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments
काम कोई मुझे बाकी नहीं मरने के सिवा
कुछ भी करना नहीं अब कुछ भी न करने के सिवा

हसरतों का भी मेरी तुम कभी करते हो ख़याल
तुमको कुछ और भी आता है सँवरने के सिवा

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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मौत आई इश्क़ में तो हमें नींद आ गई - maut aaee ishq mein to hamen neend aa gaee - अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments


मौत आई इश्क़ में तो हमें नींद आ गई
निकली बदन से जान तो काँटा निकल गया

बाज़ारे-मग़रिबी की हवा से ख़ुदा बचाए
मैं क्या, महाजनों का दिवाला निकल गया

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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हो न रंगीन तबीयत भी किसी की या रब - ho na rangeen tabeeyat bhee kisee kee ya rab -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments
हो न रंगीन तबीयत भी किसी की या रब
आदमी को यह मुसीबत में फँसा देती है

निगहे-लुत्फ़ तेरी बादे-बहारी है मगर
गुंचए-ख़ातिरे-आशिक़ को खिला देती है

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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हाले दिल सुना नहीं सकता - haale dil suna nahin sakata - अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments
हाले दिल सुना नहीं सकता
लफ़्ज़ मानी को पा नहीं सकता

इश्क़ नाज़ुक मिज़ाज है बेहद
अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता

होशे-आरिफ़ की है यही पहचान
कि ख़ुदी में समा नहीं सकता

पोंछ सकता है हमनशीं आँसू
दाग़े-दिल को मिटा नहीं सकता

मुझको हैरत है इस कदर उस पर
इल्म उसका घटा नहीं सकता

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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शेख़ जी अपनी सी बकते ही रहे - shekh jee apanee see bakate hee rahe -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

शेख़ जी अपनी सी बकते ही रहे
वह थियेटर में थिरकते ही रहे

दफ़ बजाया ही किए मज़्मूंनिगार
वह कमेटी में मटकते ही रहे

सरकशों ने ताअते-हक़ छोड़ दी
अहले-सजदा सर पटकते ही रहे

जो गुबारे थे वह आख़िर गिर गए
जो सितारे थे चमकते ही रहे

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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आबे ज़मज़म से कहा मैंने मिला गंगा से क्यों - aabe zamazam se kaha mainne mila ganga se kyon - अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments
आबे ज़मज़म से कहा मैंने मिला गंगा से क्यों
क्यों तेरी तीनत में इतनी नातवानी आ गई?

वह लगा कहने कि हज़रत! आप देखें तो ज़रा
बन्द था शीशी में, अब मुझमें रवानी आ गई

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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बहार आई, मये-गुल्गूँ के फ़व्वारे हुए जारी - bahaar aaee, maye-gulgoon ke favvaare hue jaaree -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

बहार आई, मये-गुल्गूँ के फ़व्वारे हुए जारी
यहाँ सावन से बढ़कर साक़िया फागुन बरसता है
फ़रावानी हुई दौलत की सन्नाआने योरप में
यह अब्रे-दौरे-इंजन है कि जिससे हुन बरसता है

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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शेर कहता है बज़्म से न टलो - sher kahata hai bazm se na talo -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments


शेर कहता है बज़्म से न टलो
दाद लो, वाह की हवा में पलो
वक़्त कहता है क़ाफ़िया है तंग
चुप रहो, भाग जाओ, साँस न लो

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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मुझे भी दीजिए अख़बार का वरक़ कोई - mujhe bhee deejie akhabaar ka varaq koee -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

मुझे भी दीजिए अख़बार का वरक़ कोई
मगर वह जिसमें दवाओं का इश्तेहार न हो

जो हैं शुमार में कौड़ी के तीन हैं इस वक़्त
यही है ख़ूब, किसी में मेरा शुमार न हो

गिला यह जब्र क्यों कर रहे हो ऐ ’अकबर’
सुकूत ही है मुनासिब जब अख़्तियार न हो

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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गाँधी तो हमारा भोला है, और शेख़ ने बदला चोला है - gaandhee to hamaara bhola hai, aur shekh ne badala chola hai -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments
गाँधी तो हमारा भोला है, और शेख़ ने बदला चोला है
देखो तो ख़ुदा क्या करता है, साहब ने भी दफ़्तर खोला है

आनर की पहेली बूझी है, हर इक को तअल्ली सूझी है
जो चोकर था वह सूजी है, जो माशा था वह तोला है

यारों में रक़म अब कटती है, इस वक़्त हुकूमत बटती है
कम्पू से तो ज़ुल्मत हटती है, बे-नूर मोहल्ला-टोला है

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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जिस बात को मुफ़ीद समझते हो ख़ुद करो - jis baat ko mufeed samajhate ho khud karo -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments


जिस बात को मुफ़ीद समझते हो ख़ुद करो
औरों पे उसका बार न इस्रार से धरो
हालात मुख़्तलिफ़ हैं, ज़रा सोच लो यह बात
दुश्मन तो चाहते हैं कि आपस में लड़ मरो


अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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मुस्लिम का मियाँपन सोख़्त करो, हिन्दू की भी ठकुराई न रहे! - muslim ka miyaanpan sokht karo, hindoo kee bhee thakuraee na rahe! -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

मुस्लिम का मियाँपन सोख़्त करो, हिन्दू की भी ठकुराई न रहे!
बन जावो हर इक के बाप यहाँ दावे को कोई भाई न रहे!
हम आपके फ़न के गाहक हों, ख़ुद्दाम हमारे हों ग़ायब
सब काम मशीनों ही से चले, धोबी न रहे नाई न रहे!


अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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ख़ुदा के बाब में क्या आप मुझसे बहस करते हैं - khuda ke baab mein kya aap mujhase bahas karate hain -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments


ख़ुदा के बाब में क्या आप मुझसे बहस करते हैं
ख़ुदा वह है कि जिसके हुक्म से साहब भी मरते हैं
मगर इस शेर को मैं ग़ालिबन क़ायम न रक्खूँगा
मचेगा गुल, ख़ुदा को आप क्यों बदनाम करते हैं


अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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हास्य-रस - haasy-ras-अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments
हास्य-रस 1

दिल लिया है हमसे जिसने दिल्लगी के वास्ते
क्या तआज्जुब है जो तफ़रीहन हमारी जान ले

शेख़ जी घर से न निकले और लिख कर दे दिया
आप बी०ए० पास हैं तो बन्दा बीवी पास है

तमाशा देखिये बिजली का मग़रिब और मशरिक़ में
कलों में है वहाँ दाख़िल, यहाँ मज़हब पे गिरती है.


तिफ़्ल में बू आए क्या माँ -बाप के अतवार की
दूध तो डिब्बे का है, तालीम है सरकार की


कर दिया कर्ज़न ने ज़न मर्दों की सूरत देखिये
आबरू चेहरों की सब, फ़ैशन बना कर पोंछ ली


मग़रबी ज़ौक़ है और वज़ह की पाबन्दी भी
ऊँट पे चढ़ के थियेटर को चले हैं हज़रत


जो जिसको मुनासिब था गर्दूं ने किया पैदा
यारों के लिए ओहदे, चिड़ियों के लिए फन्दे

हास्य-रस 2

पाकर ख़िताब नाच का भी ज़ौक़ हो गया
‘सर’ हो गये, तो ‘बाल’ का भी शौक़ हो गया
 *
बोला चपरासी जो मैं पहुँचा ब-उम्मीदे-सलाम-
"फाँकिये ख़ाक़ आप भी साहब हवा खाने गये"
 *
ख़ुदा की राह में अब रेल चल गई ‘अकबर’!
जो जान देना हो अंजन से कट मरो इक दिन.
 *
क्या ग़नीमत नहीं ये आज़ादी
साँस लेते हैं बात करते हैं!
 *
तंग इस दुनिया से दिल दौरे-फ़लक़ में आ गया
जिस जगह मैंने बनाया घर, सड़क में आ गया

हास्य-रस 3

पुरानी रोशनी में और नई में फ़र्क़ है इतना
उसे कश्ती नहीं मिलती इसे साहिल नहीं मिलता

दिल में अब नूरे-ख़ुदा के दिन गए
हड्डियों में फॉसफ़ोरस देखिए


मेरी नसीहतों को सुन कर वो शोख़ बोला-
"नेटिव की क्या सनद है साहब कहे तो मानूँ"


नूरे इस्लाम ने समझा था मुनासिब पर्दा
शमा -ए -ख़ामोश को फ़ानूस की हाजत क्या है



बेपर्दा नज़र आईं जो चन्द बीवियाँ
‘अकबर’ ज़मीं में ग़ैरते क़ौमी से गड़ गया
पूछा जो उनसे -‘आपका पर्दा कहाँ गया?’
कहने लगीं कि अक़्ल पे मर्दों की पड़ गया.

हास्य-रस 4

तालीम लड़कियों की ज़रूरी तो है मगर
ख़ातूने-ख़ाना हों, वे सभा की परी न हों
जो इल्मों-मुत्तकी हों, जो हों उनके मुन्तज़िम
उस्ताद अच्छे हों, मगर ‘उस्ताद जी’ न हों

तालीमे-दुख़तराँ से ये उम्मीद है ज़रूर
नाचे दुल्हन ख़ुशी से ख़ुद अपनी बारात में

हम ऐसी कुल किताबें क़ाबिले-ज़ब्ती समझते हैं
कि जिनको पढ़ के बच्चे बापको ख़ब्ती समझते हैं

क़द्रदानों की तबीयत का अजब रंग है आज
बुलबुलों को ये हसरत, कि वो उल्लू न हुए.

हास्य-रस 5

फ़िरगी से कहा, पेंशन भी ले कर बस यहाँ रहिये
कहा-जीने को आए हैं,यहाँ मरने नहीं आये


बर्क़ के लैम्प से आँखों को बचाए अल्लाह
रौशनी आती है, और नूर चला जाता है

काँउंसिल में सवाल होने लगे
क़ौमी ताक़त ने जब जवाब दिता

हरमसरा की हिफ़ाज़त को तेग़ ही न रही
तो काम देंगी ये चिलमन की तीलियाँ कब तक ?

ख़ुदा के फ़ज़्ल से बीवी-मियाँ दोनों मुहज़्ज़ब हैं
हिजाब उनको नहीं आता इन्हें ग़ुसा नहीं आता

माल गाड़ी पे भरोशा है जिन्हें ऐ अकबर
उनको क्या ग़म है गुनाहों की गिराँबारी का?

ख़ुदा की राह में बेशर्त करते थे सफ़र पहले
मगर अब पूछते हैं रेलवे इसमें कहाँ तक है?

हास्य-रस 6

मय भी होटल में पियो,चन्दा भी दो मस्जिद में
शेख़ भी ख़ुश रहे, शैतान भी बेज़ार न हो


ऐश का भी ज़ौक़ दींदारी की शुहरत का भी शौक़
आप म्यूज़िक हाल में क़ुरआन गाया कीजिये


गुले तस्वीर किस ख़ूबी से गुलशन में लगाया है
मेरे सैयाद ने बुलबुल को भी उल्लू बनाया है


मछली ने ढील पाई है लुक़में पे शाद है
सैयद मुतमइन है कि काँटा निगल गई


ज़वाले क़ौम की इन्तिदा वही थी कि जब
तिजारत आपने की तर्क नौकरी कर ली

हास्य-रस 7

क्योंकर ख़ुदा के अर्श के क़ायल हों ये अज़ीज़
जुगराफ़िये में अर्श का नक़्शा नहीं मिला


क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ


जान ही लेने की हिकमत में तरक़्क़ी देखी
मौत का रोकने वाला कोई पैदा न हुआ

तालीम का शोर ऐसा, तहज़ीब का ग़ुल इतना
बरकत जो नहीं होती नीयत की ख़राबी है

तुम बीवियों को मेम बनाते हो आजकल
क्या ग़म जो हम ने मेम को बीवी बना लिया?

नौकरों पर जो गुज़रती है, मुझे मालूम है
बस करम कीजे मुझे बेकार रहने दीजिये


अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

Poem Gazal Shayari

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चश्मे जहाँ से हालते असली नहीं छुपती - chashme jahaan se haalate asalee nahin chhupatee -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

चश्मे जहाँ से हालते असली नहीं छुपती
अख्बार में जो चाहिए वह छाप दीजिए

दावा बहुत बड़ा है रियाजी मे आपको
तूले शबे फिराक को तो नाप दीजिए

सुनते नहीं हैं शेख नई रोशनी की बात
इंजन कि उनके कान में अब भाप दीजिए

जिस बुत के दर पे गौर से अकबर ने कह दिया
जार ही मैं देने लाया हूँ जान आप दीजिए

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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सूप का शायक़ हूँ, यख़नी होगी क्या - soop ka shaayaq hoon, yakhanee hogee kya -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

सूप का शायक़ हूँ, यख़नी होगी क्या
चाहिए कटलेट, यह कीमा क्या करूँ

लैथरिज की चाहिए, रीडर मुझे
शेख़ सादी की करीमा, क्या करूँ

खींचते हैं हर तरफ़, तानें हरीफ़
फिर मैं अपने सुर को, धीमा क्यों करूँ

डाक्टर से दोस्ती, लड़ने से बैर
फिर मैं अपनी जान, बीमा क्या करूँ

चांद में आया नज़र, ग़ारे-मोहीब
हाये अब ऐ, माहे-सीमा क्या करूँ

अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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तअज्जुब से कहने लगे बाबू साहब - taajjub se kahane lage baaboo saahab -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments

तअज्जुब से कहने लगे बाबू साहब
गौरमेन्ट सैयद पे क्यों मेहरबाँ है

उसे क्यों हुई इस क़दर कामियाबी
कि हर बज़्म में बस यही दास्ताँ है

कभी लाट साहब हैं मेहमान उसके
कभी लाट साहब का वह मेहमाँ है

नहीं है हमारे बराबर वह हरगिज़
दिया हमने हर सीग़े का इम्तहाँ है

वह अंग्रेज़ी से कुछ भी वाक़िफ़ नहीं है
यहाँ जितनी इंगलिश है सब बरज़बाँ हैं

कहा हँस के 'अकबर' ने ऎ बाबू साहब
सुनो मुझसे जो रम्ज़ उसमें निहाँ हैं

नहीं है तुम्हें कुछ भी सैयद से निस्बत
तुम अंग्रेज़ीदाँ हो वह अंग्रेज़दाँ है


अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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हस्ती के शज़र में जो यह चाहो कि चमक जाओ - hastee ke shazar mein jo yah chaaho ki chamak jao -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments


हस्ती के शज़र में जो यह चाहो कि चमक जाओ
कच्चे न रहो बल्कि किसी रंग मे पक जाओ

मैंने कहा कायल मै तसव्वुफ का नहीं हूँ
कहने लगे इस बज़्म मे जाओ तो थिरक जाओ

मैंने कहा कुछ खौफ कलेक्टर का नहीं है
कहने लगे आ जाएँ अभी वह तो दुबक जाओ

मैंने कहा वर्जिश कि कोई हद भी है आखिर
कहने लगे बस इसकी यही हद कि थक जाओ

मैंने कहा अफ्कार से पीछा नहीं छूटता
कहने लगे तुम जानिबे मयखाना लपक जाओ

मैंने कहा अकबर मे कोई रंग नहीं है
कहने लगे शेर उसके जो सुन लो तो फडक जाओ


अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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बिठाई जाएंगी परदे में बीबियाँ कब तक - bithaee jaengee parade mein beebiyaan kab tak -अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi" Poem Gazal Shayari

March 14, 2020 0 Comments


बिठाई जाएंगी परदे में बीबियाँ कब तक
बने रहोगे तुम इस मुल्क में मियाँ कब तक

हरम-सरा की हिफ़ाज़त को तेग़ ही न रही
तो काम देंगी यह चिलमन की तितलियाँ कब तक

मियाँ से बीबी हैं, परदा है उनको फ़र्ज़ मगर
मियाँ का इल्म ही उट्ठा तो फिर मियाँ कब तक

तबीयतों का नमू है हवाए-मग़रिब में
यह ग़ैरतें, यह हरारत, यह गर्मियाँ कब तक

अवाम बांध ले दोहर को थर्ड-वो-इंटर में
सिकण्ड-ओ-फ़र्स्ट की हों बन्द खिड़कियाँ कब तक

जो मुँह दिखाई की रस्मों पे है मुसिर इब्लीस
छुपेंगी हज़रते हव्वा की बेटियाँ कब तक

जनाबे हज़रते 'अकबर' हैं हामिए-पर्दा
मगर वह कब तक और उनकी रुबाइयाँ कब तक

शब्दार्थ :
हरम-सरा= भवन का वह भाग जहाँ स्त्रियाँ रहती हैं;
तेग़= तलवार;
नमू=उठान;
मग़रिब=पश्चिम;
ग़ैरत= हयादारी;
हरारत= गर्मी;
अवाम= जनता;
मुसिर= ज़िद्द करना
हामिए-पर्दा= पर्दे का समर्थन करने वाला


अकबर "इलाहाबादी" - Akbar "Allahabadi"

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