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Saturday, February 6, 2021

राहुल सांकृत्यायन का जीवन परिचय | Rahul Sankrityayan Biography in Hindi

 राहुल सांकृत्यायन का जीवन परिचय | Rahul Sankrityayan Biography in Hindi

आप का जन्म आजमगढ़ जिले के पन्दहा गाँव में ९ अप्रेल १८९३ को हुआ था, आपको बचपन में केदारनाथ पाण्डेय कहकर पुकारते थे, आपके माता का नाम कुलवंती और पिता का नाम गोवर्धन पाण्डेय था, आपके साले का नाम दीपचन्द पाठक था जो अपनी बहन के साथ रहते थे | 

बाल्याकाल में ही आपकी माता जी स्वर्ग चली गयी, जिससे आपका किशोर अवस्था नानी और नाना राम शरण पाठक  के घर पर बीता |

१८९८ में आपको मदरसे से दाखिला दिलाया गया|

आपका विवाह बचपन में ही करा दिया गया था, जिससे नाराज होकर आपने घर छोड़ कर भाग गए और एक मठ में साधु बन गए , आप आत्मज्ञान प्राप्त करने को लेकर बहुत लालयित थे, जिसके बाद आपने पुरे भारत देश का का भ्रमण  किया ,


आप जहा भी जाते वहां की संकृति और भाषा को अपना बना लेते थे, कहा जाता है आपको ३६ भाषावो का ज्ञान था, फिर भी आपने अधिकतर रचनाये अपनी मातृभाषा हिंदी में ही लिखी |


आपने आत्मज्ञान की खोज में कई बार धर्म परिवर्तन किया, आपके ज्ञान भंडार और तर्कशक्ति से काशी के पंडित इतने प्रभावित हुए, जिससे उन्होंने आपको महापंडित की उपाधि दी | 


रूस में आपने संस्कृत अध्यापक की नौकरी की | और वहा एक एलेना नाम की महिला से प्यार हो जाता है और आपने वहां दूसरी शादी कर ली, एलेना से आपको एक पुत्र हुआ जिसका नाम  इगोर राहुल विच रखा,

आपने उपन्यास, निबंध, कहानी, आत्मकथा, संस्मरण व जीवनी आदि विधावों में साहित्यिक सृजन किया |

आपके सम्मान में पटना में राहुल संस्कृत्यायन साहित्य संस्थान और आपने से जुडी वस्तुवो के  की स्थापना की गयी है, 


आपको १९५८ में साहित्य अकादमी पुरस्कार और १९६३ में भारत सरकार ने आपको पद्मभूषण से सम्मानित किया| 

आपके रचित कहानिया: सतमी के बच्चे, कनैला की कथा, वोल्गा से गंगा, बहुरंगी मधुपुरी|

आपके उपन्यास: जीने के लिए, बईसबी सदी, सप्तसिंधु, सिंह सेनापति, भागो नहीं दुनिया को बदलो, जय योधेय, मधुर स्वप्न, राजस्थान निवास, दिवोदास, विस्मृत यात्री|

आपने बहुत से यात्रा साहित्य भी लिखा जो निम्न है: लंका, जापान,ईरान , किन्नर देश की ओर, रस में पच्चीस माह जैसे बहुत से पुस्तक और जीवनिया लिखी |


मधुमेह से हार कर आप १४ अप्रेल १९६३ को पश्चिम बंगाल (जिसको दार्जिलिंग भी कहा करते थे) आपने हमेशा के लिए विदा ले लिए| 

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