प्रिय पाठकों! हमारा उद्देश्य आपके लिए किसी भी पाठ्य को सरलतम रूप देकर प्रस्तुत करना है, हम इसको बेहतर बनाने पर कार्य कर रहे है, हम आपके धैर्य की प्रशंसा करते है| मुक्त ज्ञानकोष, वेब स्रोतों और उन सभी पाठ्य पुस्तकों का मैं धन्यवाद देना चाहता हूँ, जहाँ से जानकारी प्राप्त कर इस लेख को लिखने में सहायता हुई है | धन्यवाद!

Saturday, July 13, 2019

मस्जिदों के सहन तक जाना बहुत दुश्वार था - masjidon ke sahan tak jaana bahut dushvaar tha- Dr. Rahat “ Indauri” - डॉ० राहत “इन्दौरी”

मस्जिदों के सहन तक जाना बहुत दुश्वार था|
देर से निकला तो मेरे रास्ते में दार था|

अपने ही फैलाओ के नशे में खोया था दरख़्त,
और हर मासूम टहनी पर फलों का भार था|

देखते ही देखते शहरों की रौनक़ बन गया,
कल यही चेहरा था जो हर आईने पे भार था|

सब के दुख सुख़ उस के चेहरे पे लिखे पाये गये,
आदमी क्या था हमारे शहर का अख़बार था|

अब मोहल्ले भर के दरवाज़ों पे दस्तक है नसीब,
एक ज़माना था कि जब मैं भी बहुत ख़ुद्दार था|

काग़ज़ों की सब सियाही बारिशों में धुल गई,
हम ने जो सोचा तेरे बारे में सब बेकार था|

Dr. Rahat “ Indauri” - डॉ०  राहत “इन्दौरी”   

No comments:

Post a Comment

इंटरनेट क्या है? इंटरनेट पर लॉगिन क्यों किया जाता है? वेबसाइट क्या है| थर्ड पार्टी एक्सेस क्या है? फेसबुक के थर्ड पार्टी ऐप को कैसे हटाए?

 इंटरनेट क्या है?  इंटरनेट पर लॉगिन क्यों किया जाता है?   वेबसाइट क्या है|  थर्ड पार्टी एक्सेस क्या है? फेसबुक के थर्ड पार्टी ऐप को कैसे हटा...