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Tuesday, June 9, 2020

बहुरि नहिं आवना या देस - bahuri nahin aavana ya des -कबीर- Kabir #www.poemgazalshayari.in ||Poem|Gazal|Shayari|Hindi Kavita|Shayari|Love||

बहुरि नहिं आवना या देस ॥

जो जो गए बहुरि नहि आए, पठवत नाहिं सॅंस ॥ १॥

सुर नर मुनि अरु पीर औलिया, देवी देव गनेस ॥ २॥

धरि धरि जनम सबै भरमे हैं ब्रह्मा विष्णु महेस ॥ ३॥

जोगी जङ्गम औ संन्यासी, दीगंबर दरवेस ॥ ४॥

चुंडित, मुंडित पंडित लोई, सरग रसातल सेस ॥ ५॥

ज्ञानी, गुनी, चतुर अरु कविता, राजा रंक नरेस ॥ ६॥

कोइ राम कोइ रहिम बखानै, कोइ कहै आदेस ॥ ७॥

नाना भेष बनाय सबै मिलि ढूऊंढि फिरें चहुँ देस ॥ ८॥

कहै कबीर अंत ना पैहो, बिन सतगुरु उपदेश ॥ ९॥


 कबीर- Kabir

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