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Friday, April 24, 2020

वो कभी धूप कभी छाँव लगे । - vo kabhee dhoop kabhee chhaanv lage . -- कैफ़ी आज़मी - Kaifi Azmi #poemgazalshayari.in

वो कभी धूप कभी छाँव लगे ।
मुझे क्या-क्या न मेरा गाँव लगे ।

किसी पीपल के तले जा बैठे
अब भी अपना जो कोई दाँव लगे ।

एक रोटी के त'अक्कुब में चला हूँ इतना
की मेरा पाँव किसी और ही का पाँव लगे ।

रोटि-रोज़ी की तलब जिसको कुचल देती है
उसकी ललकार भी एक सहमी हुई म्याँव लगे ।

जैसे देहात में लू लगती है चरवाहों को
बम्बई में यूँ ही तारों की हँसी छाँव लगे ।



- कैफ़ी आज़मी - Kaifi Azmi


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