bahasen phijool theen yah khula haal der mein - बहसें फिजूल थीं यह खुला हाल देर में- अकबर इलाहाबादी - Akbar Allahabad Poem Gazal Shayari
बहसें फिजूल थीं यह खुला हाल देर में
अफ्सोस उम्र कट गई लफ़्ज़ों के फेर में
है मुल्क इधर तो कहत जहद, उस तरफ यह वाज़
कुश्ते वह खा के पेट भरे पांच सेर मे
हैं गश में शेख देख के हुस्ने-मिस-फिरंग
बच भी गये तो होश उन्हें आएगा देर में
छूटा अगर मैं गर्दिशे तस्बीह से तो क्या
अब पड़ गया हूँ आपकी बातों के फेर में
अकबर इलाहाबादी - Akbar Allahabad
Poem Gazal Shayari

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