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Saturday, February 15, 2020

सहमी सहमी रातों में - sahamee sahamee raaton mein - गुलजार - Gulzar - Poem Gazal Shayari

सहमी सहमी रातों में
सहमी सहमी चलती हूँ

सहमी सहमी रातों में
सहमी सहमी चलती हूँ
लौटूंगी मैं तेरे लिए
तेरे लिए जानिया वे

काली अमावस के
पीछे खड़ी हूँ मैं
सालों के जालों में
कब से पड़ी हूँ मैं
बेचैन हूँ तेरे लिए
हो जानिया
जब डूबेगा दिन
दिया जलाना तुम
आवाज़ दे के फिर
मुझको बुलाना तुम
लौटूंगी मैं तेरे लिए
जानिया वे

तेरे लिए साथी मेरी
जानिया वे

वीरान पेड़ों के
साए जब चलते हैं
मासूम रूहों को
अँधेरे डसते हैं
डरती हूँ मैं तेरे लिए
जानिया वे
जब रातें पिघलें
भोग लगाना तुम
आकाश का कोई
कोना उठाना तुम
लौटूंगी मैं तेरे लिए
जानिया वे

तेरे लिए साथी मेरी
जानिया वे


गुलजार - Gulzar

Poem Gazal Shayari

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