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Sunday, October 13, 2019

अपने माज़ी के तसव्वुर से हिरासां हूँ मैं - apane maazee ke tasavvur se hiraasaan hoon main - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

अपने माज़ी के तसव्वुर से हिरासां हूँ मैं
अपने गुज़रे हुए ऐयाम से[4] नफरत है मुझे
अपनी बेकार तमन्नाओं पे शर्मिंदा हूँ
अपनी बेसूद[5] उम्मीदों पे नदामत है मुझे

मेरे माज़ी को अँधेरे में दबा रहने दो
मेरा माज़ी मेरी ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं
मेरी उम्मीदों का हासिल, मिरी काविश[6] का सिला
एक बेनाम अज़ीयत के[7] सिवा कुछ भी नहीं
 
कितनी बेकार उम्मीदों का सहारा लेकर
मैंने ऐवान[8] सजाए थे किसी की खातिर
कितनी बेरब्त[9] तमन्नाओं के मुबहम ख़ाके[10]
अपने ख़्वाबों में बसाए थे किसी की ख़ातिर

मुझसे अब मेरी मोहब्बत के फ़साने[11] न कहो
मुझको कहने दो कि मैंने उन्हें चाहा ही नहीं
और वो मस्त निगाहें जो मुझे भूल गईं
मैंने उन मस्त निगाहों को सराहा ही नहीं

मुझको कहने दो कि मैं आज भी जी सकता हूँ
इश्क़ नाकाम सही – ज़िन्दगी नाकाम नहीं
उन्हें अपनाने की ख्वाहिश, उन्हें पाने की तलब
शौक़े-बेकार[12] सही, सअइ-ए-ग़म-अंजाम[13] नहीं

वही गेसू[14], वही नज़रें, वही आरिज़[15], वही जिस्म
मैं जो चाहूं तो मुझे और भी मिल सकते हैं
वो कंवल जिनको कभी उनके लिए खिलना था
उनकी नज़रों से बहुत दूर भी खिल सकते हैं

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee


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