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Sunday, August 25, 2019

दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही - din saleeqe se uga raat thikaane se rahee - - निदा फ़ाज़ली - Nida Fazli

दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही 
दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही 

चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें 
ज़िन्दगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही 

इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी 
रात जंगल में कोई शम्मा जलाने से रही 

फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को 
दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही 

शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की फ़ुरसत 
अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने-हँसाने से रही

- निदा फ़ाज़ली - Nida Fazli

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