दुर्दिनों में जब रूठ जाएँगी प्रेमिकाएँ - durdinon mein jab rooth jaengee premikaen -- उत्पल बैनर्जी - Utpal Banerjee #www.poemgazalshayari.in

दुर्दिनों में जब
रूठ जाएँगी प्रेमिकाएँ
शुभचिन्तक तलाश लेंगे
न मिल पाने के अचूक बहाने
हम तब भी नहीं आएँगे कहने कि
आजकल हम अकेले हैं
असंख्य नक्षत्रों के बीच
चाँद की तरह... बिलकुल अकेले!

हमें कहीं भीतर तक
पोर-पोर खण्डहर होते देख
अपनी-अपनी विवशताओं में बँधे
दिवंगत माता-पिता
अनन्त की किसी खिड़की से
बस हाथ हिलाकर सान्त्वना-भर दे सकेंगे
हम तब भी नहीं आएँगे कहने कि
अब हम
सहेजे नहीं जाते कहीं भी!

हमारे दुखों को
और घना कर जाएँगे देवता
मुरझा जाएँगे हमारे नन्हें पौधों के
फूल-से सपने
हम तब भी नहीं आएँगे कहने कि
हमारे बच्चों के आँसुओं में
कोई खिलौना टूटा है!

हम कभी नहीं आएँगे कहने कि
इन दिनों
अन्धेरा हमारे घर के भीतर तक घुस आया है !

 - उत्पल बैनर्जी - Utpal Banerjee
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