पर्वत पर, शायद, वृक्ष न कोई शेष बचा - parvat par, shaayad, vrksh na koee shesh bacha -- Ramdhari Singh "Dinkar"- रामधारी सिंह "दिनकर" #poemgazalshayari.in
पर्वत पर, शायद, वृक्ष न कोई शेष बचा,
धरती पर, शायद, शेष बची है नहीं घास;
उड़ गया भाप बनकर सरिताओं का पानी,
बाकी न सितारे बचे चाँद के आस-पास ।
क्या कहा कि मैं घनघोर निराशावादी हूँ?
तब तुम्हीं टटोलो हृदय देश का, और कहो,
लोगों के दिल में कहीं अश्रु क्या बाकी है?
बोलो, बोलो, विस्मय में यों मत मौन रहो ।
- Ramdhari Singh "Dinkar"- रामधारी सिंह "दिनकर"
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