दूर सुनसान-से साहिल के क़रीब - door sunasaan-se saahil ke qareeb - गुलजार - Gulzar -Poem Gazal Shayari

दूर सुनसान-से साहिल के क़रीब

एक जवाँ पेड़ के पास

उम्र के दर्द लिए वक़्त मटियाला दोशाला ओढ़े

बूढ़ा-सा पाम का इक पेड़, खड़ा है कब से

सैकड़ों सालों की तन्हाई के बद

झुक के कहता है जवाँ पेड़ से... ’यार!

तन्हाई है ! कुछ बात करो !’

गुलजार - Gulzar

-Poem Gazal Shayari

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