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Friday, February 28, 2020

छंद बंध ध्रुव तोड़, फोड़ कर पर्वत कारा - chhand bandh dhruv tod, phod kar parvat kaara - Sumitra Nandan Pant - सुमित्रानंदन पंत #Poem_Gazal_Shayari

छंद बंध ध्रुव तोड़, फोड़ कर पर्वत कारा
अचल रूढ़ियों की, कवि! तेरी कविता धारा
मुक्त अबाध अमंद रजत निर्झर-सी नि:सृत--
गलित ललित आलोक राशि, चिर अकलुष अविजित!

स्फटिक शिलाओं से तूने वाणी का मंदिर
शिल्पि, बनाया,-- ज्योति कलश निज यश का घर चित्त।
शिलीभूत सौन्दर्य ज्ञान आनंद अनश्वर
शब्द-शब्द में तेरे उज्ज्वल जड़ित हिम शिखर।

शुभ्र कल्पना की उड़ान, भव भास्वर कलरव,
हंस, अंश वाणी के, तेरी प्रतिभा नित नव;
जीवन के कर्दम से अमलिन मानस सरसिज
शोभित तेरा, वरद शारदा का आसन निज।

अमृत पुत्र कवि, यश:काय तव जरा-मरणजित,
स्वयं भारती से तेरी हृतंत्री झंकृत।

Sumitra Nandan Pant - सुमित्रानंदन पंत 

#Poem_Gazal_Shayari

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