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Friday, August 23, 2019

कभी बादल, कभी कश्ती, कभी गर्दाब लगे - kabhee baadal, kabhee kashtee, kabhee gardaab lage -निदा फ़ाज़ली - Nida Fazli

कभी बादल, कभी कश्ती, कभी गर्दाब लगे
वो बदन जब भी सजे कोई नया ख्वाब लगे

एक चुप चाप सी लड़की, न कहानी न ग़ज़ल
याद जो आये कभी रेशम-ओ-किम्ख्वाब लगे

अभी बे-साया है दीवार कहीं लोच न ख़म
कोई खिड़की कहीं निकले कहीं मेहराब लगे

घर के आँगन मैं भटकती हुई दिन भर की थकन
रात ढलते ही पके खेत सी शादाब लगे

- निदा फ़ाज़ली - Nida Fazli

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