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Sunday, June 30, 2019

The Song of the Free - Swami Vivekanand

June 30, 2019 0 Comments
The wounded snake its hood unfurls,
The flame stirred up doth blaze,
The desert air resounds the calls
Of heart-struck lion's rage.

The cloud puts forth it deluge strength
When lightning cleaves its breast,
When the soul is stirred to its in most depth
Great ones unfold their best.

Let eyes grow dim and heart grow faint,
And friendship fail and love betray,
Let Fate its hundred horrors send,
And clotted darkness block the way.

All nature wear one angry frown,
To crush you out - still know, my soul,
You are Divine. March on and on,
Nor right nor left but to the goal.

Nor angel I, nor man, nor brute,
Nor body, mind, nor he nor she,
The books do stop in wonder mute
To tell my nature; I am He.

Before the sun, the moon, the earth,
Before the stars or comets free,
Before e'en time has had its birth,
I was, I am, and I will be.

The beauteous earth, the glorious sun,
The calm sweet moon, the spangled sky,
Causation's law do make them run;
They live in bonds, in bonds they die.

And mind its mantle dreamy net
Cast o'er them all and holds them fast.
In warp and woof of thought are set,
Earth, hells, and heavens, or worst or best.

Know these are but the outer crust -
All space and time, all effect, cause.
I am beyond all sense, all thoughts,
The witness of the universe.

Not two nor many, 'tis but one,
And thus in me all me's I have;
I cannot hate, I cannot shun
Myself from me, I can but love.



    From dreams awake, from bonds be free,
    Be not afraid. This mystery,
    My shadow, cannot frighten me,
    Know once for all that I am He.
    - Swami Vivekanand

    Kavi Sri Ramesh Sharma Poem कवि श्री रमेश शर्मा कविता

    June 30, 2019 0 Comments
    क्या लिखते रहते हो यूँ ही
    चांद की बातें करते हो, धरती पर अपना घर ही नहीं
    रोज बनाते ताजमहल, संगमरमर क्या कंकर ही नहीं
    सूखी नदिया, नाव लिए तुम बहते हो यूँ ही

    क्या लिखते रहते हो यूँ ही

    आपके दीपक शमा चिराग़ में आग नहीं, पर जलते हैं
    अंधियारे की बाती, सूरज से सुलगाने चलते हैं
    आँच नहीं है चूल्हे में, पर काँख में सूरज दाबे हो
    सीले, घुटन भरे कमरे में, वेग पवन का थामे हो
    ठंडी-मस्त हवा हो तो भी दहते हो यूँ ही

    क्या लिखते रहते हो यूँ ही

    चंचल-चंद्रमुखी चावल से कंकर चुनते नहीं लिखी
    परी को नल की लम्बी कतारों में स्वेटर बुनते नहीं लिखी
    पाँव धँसे दलदल में, पतंग सतरंगी उड़ाते फिरते हो
    दिन-दिन झड़ते बाल बिचारे, ज़ुल्फें गाते फिरते हो
    खड़ा हिमालय बातों का कर, ढहते हो यूँ ही

    क्या लिखते रहते हो यूँ ही

    ठोस कदम की बातें करते, कठिनाई से बचते हो
    बिना किए ही मेहनत के, तुम मेहनत के छंद रचते हो
    सारी दुनिया से रूठे हो, कारण क्या कुछ पता नहीं
    भीतर से बिखरे-टूटे हो, कारण क्या कुछ पता नहीं
    प्रश्न बड़े हैं उत्तर जिनके कहते हो यूँ ही

    क्या लिखते रहते हो यूँ ही

    कभी कल्पना-लोक से निकलो, सच से दो-दो हाथ करो
    कीचड़ भरी गली में घूमो, फिर सावन की बात करो
    झाँईं पड़े हुए गालों को, गाल गुलाबी लिख डाला
    पत्र कोई आया ही नहीं, पर पत्र जवाबी लिख डाला
    छोटे दुख भी भारी कर के सहते हो यूँ ही

    क्या लिखते रहते हो यूँ ही


    -कवि श्री रमेश शर्मा



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