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Wednesday, March 11, 2020

तंद्रा में अनुभूति - tandra mein anubhooti -sachchidanand hiranand vatsyayan "agay"- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" #Poem Gazal Shayari



तंद्रा में अनुभूति
उस तम-घिरते नभ के तट पर स्वप्न-किरण रेखाओं से
बैठ झरोखे में बुनता था जाल मिलन के प्रिय! तेरे।
मैं ने जाना, मेरे पीछे सहसा तू आ हुई खड़ी
झनक उठी टूटे-से स्वर से स्मृति-शृंखल की कड़ी-कड़ी।

बोला हृदय, 'लौट कर देखो प्रतिमा खो मत जाय कहीं!'
किन्तु कहीं वह स्वप्न न निकले-इस से साहस हुआ नहीं!
हाय, अवस्था कैसी थी वह! वज्राहत-सा हृदय रहा
जाना जब तब अकथ व्यथा से अंग-अंग था कसक रहा।

यही रहेगा क्या प्रियतम! अब सदा के लिए अपना प्यार?
तन्द्रा में अनुभूति, किन्तु जागृति में केवल पीड़ा-भार?

sachchidanand hiranand vatsyayan "agay"- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"

#Poem Gazal Shayari

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