टूटें सकल बन्ध - टूटें सकल बन्ध - - सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" - Suryakant Tripathi "Nirala" - Poem_Gazal_Shayari

टूटें सकल बन्ध
कलि के, दिशा-ज्ञान-गत हो बहे गन्ध।

          रुद्ध जो धार रे
          शिखर - निर्झर झरे
          मधुर कलरव भरे
          शून्य शत-शत रन्ध्र।
          
          रश्मि ऋजु खींच दे
           चित्र शत रंग के,
          वर्ण - जीवन फले,
          जागे तिमिर अन्ध।

- सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" - Suryakant Tripathi "Nirala"

- Poem_Gazal_Shayari

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