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Wednesday, April 28, 2021

ओ साथी रे, तेरे बिना भी क्या जीना | O Sathi re, Tere Bina Bhi Kya Jeena | Lyrics | Poemgazalshayari.in

April 28, 2021 0 Comments

 ओ साथी रे, तेरे बिना भी क्या जीना | O Sathi re, Tere Bina Bhi Kya Jeena | Lyrics | Poemgazalshayari.in


ला.. ला ..ला..ला..

ला.. ला ..ला ..ला..

ला.. ला ..ला.. ला.. ला ..ला.. ला.. ला..ला ..ला..


हम्म.....


ओ साथी रे, तेरे बिना भी क्या जीना

ओ साथी रे, तेरे बिना भी क्या जीना

ओ साथी रे, तेरे बिना भी क्या जीना

तेरे बिना भी क्या जीना


फूलों में, कलियों में, सपनों की गलियों में

फूलों में, कलियों में, सपनों की गलियों में

तेरे बिना कुछ कहीं ना

तेरे बिना भी क्या जीना,ओ साथी रे, 

तेरे बिना भी क्या जीना

तेरे बिना भी क्या जीना


हर धड़कन में प्यास है तेरी

साँसों में तेरी खुश्बू है

इस धरती से उस अम्बर तक

मेरी नज़र में तू ही तू है

प्यार ये टूटे ना तू मुझसे रूठे ना

साथ ये छूटे कभी ना

तेरे बिना भी क्या जीना

ओ साथी रे

तेरे बिना भी क्या जीना


तुझ बीन जोगन मेरी रातें

तुझ बिन मेरे दिन बंजारे

मेरा जीवन जलती धुनी

बुझे बुझे मेरे सपने सारे

तेरे बिना मेरी

तेरे बिना मेरी मेरे बिना तेरी

ये जिंदगी, जिंदगी ना

तेरे बिना भी क्या जीना

ओ साथी रे

तेरे बिना भी क्या जीना


तेरे बिना भी क्या जीना

तेरे बिना भी क्या जीना

तेरे बिना भी क्या जीना


Movie: Muqaddar ka Sikandar

Singer: Kishore Kumar

Music Director: Kalyanji Anandji

Lyricist: Anjaan

Film Star: Amitabh Bachchan, Rakhi,Vinod Khanna.

Director: Prakash Mehra

Label : Saregama India Ltd.

Tuesday, April 27, 2021

बरसों के बाद कभी हम तुम यदि मिलें कहीं | गिरिजाकुमार माथुर | Girija Kumar Mathur

April 27, 2021 0 Comments

 गिरिजाकुमार माथुर | Girija Kumar Mathur


बरसों के बाद कभी

हम तुम यदि मिलें कहीं,

देखें कुछ परिचित से,

लेकिन पहिचानें ना।


याद भी न आये नाम,

रूप, रंग, काम, धाम,

सोचें,यह सम्भव है -

पर, मन में मानें ना।


हो न याद, एक बार

आया तूफान, ज्वार

बंद, मिटे पृष्ठों को -

पढ़ने की ठाने ना।


बातें जो साथ हुई,

बातों के साथ गयीं,

आँखें जो मिली रहीं -

उनको भी जानें ना।

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Sunday, April 25, 2021

इतना मत दूर रहो गन्ध कहीं खो जाए | गिरिजाकुमार माथुर | Poemgazalshayari

April 25, 2021 0 Comments

 इतना मत दूर रहो गन्ध कहीं खो जाए | गिरिजाकुमार माथुर


 इतना मत दूर रहो

गन्ध कहीं खो जाए

आने दो आँच

रोशनी न मन्द हो जाए


देखा तुमको मैंने कितने जन्मों के बाद

चम्पे की बदली सी धूप-छाँह आसपास

घूम-सी गई दुनिया यह भी न रहा याद

बह गया है वक़्त लिए मेरे सारे पलाश


ले लो ये शब्द

गीत भी कहीं न सो जाए

आने दो आँच

रोशनी न मन्द हो जाए


उत्सव से तन पर सजा ललचाती मेहराबें

खींच लीं मिठास पर क्यों शीशे की दीवारें

टकराकर डूब गईं इच्छाओं की नावें

लौट-लौट आई हैं मेरी सब झनकारें


नेह फूल नाजुक

न खिलना बन्द हो जाए

आने दो आँच

रोशनी न मन्द हो जाए.


क्या कुछ कमी थी मेरे भरपूर दान में

या कुछ तुम्हारी नज़र चूकी पहचान में

या सब कुछ लीला थी तुम्हारे अनुमान में

या मैंने भूल की तुम्हारी मुस्कान में


खोलो देह-बन्ध

मन समाधि-सिन्धु हो जाए

आने दो आँच

रोशनी न मन्द हो जाए


इतना मत दूर रहो

गन्ध कहीं खो जाए


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मेरे युवा आम में नया बौर आया है | गिरिजाकुमार माथुर | Poemgazalshayari

April 25, 2021 0 Comments

मेरे युवा आम में नया बौर आया है | गिरिजाकुमार माथुर


 मेरे युवा-आम में नया बौर आया है

ख़ुशबू बहुत है क्योंकि तुमने लगाया है


आएगी फूल-हवा अलबेली मानिनी

छाएगी कसी-कसी अँबियों की चाँदनी

चमकीले, मँजे अंग चेहरा हँसता मयंक

खनकदार स्वर में तेज गमक-ताल फागुनी


मेरा जिस्म फिर से नया रूप धर आया है

ताज़गी बहुत है क्योंकि तुमने सजाया है।


अन्धी थी दुनिया या मिट्टी-भर अन्धकार

उम्र हो गई थी एक लगातार इन्तज़ार

जीना आसान हुआ तुमने जब दिया प्यार

हो गया उजेला-सा रोओं के आर-पार


एक दीप ने दूसरे को चमकाया है

रौशनी के लिए दीप तुमने जलाया है


कम न हुई, मरती रही केसर हर साँस से

हार गया वक़्त मन की सतरंगी आँच से

कामनाएँ जीतीं जरा-मरण-विनाश से

मिल गया हरेक सत्य प्यार की तलाश से


थोड़े ही में मैंने सब कुछ भर पाया है

तुम पर वसन्त क्योंकि वैसा ही छाया है


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Thursday, April 22, 2021

शाम से आँख में नमी सी है | shaam se hee aankh mein namee hai | Gulzar | poemgazalshayari

April 22, 2021 0 Comments

 शाम से आँख में नमी सी है

आज फिर आप की कमी सी है


दफ़्न कर दो हमें कि साँस मिले

नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है


वक़्त रहता नहीं कहीं थमकर

इस की आदत भी आदमी सी है


कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी

एक तस्लीम लाज़मी सी है


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Sunday, April 18, 2021

चाँदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल | Chandi jaisa rang hai tera | poemgazalshayari

April 18, 2021 0 Comments

 चाँदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल

इक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल


जिस रस्ते से तू गुजरे वो फूलों से भर जाये (२)

तेरे पैर की कोमल आहट सोते भाग जगाये

जो पत्थर तो छू ले गोरी वो हीरा बन जाये

तू जिसको मिल जाये वो

तू जिसको मिल जाये वो हो जाये मालामाल

इक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल


जो बेरंग हैं उसपे क्या क्या रंग जमाते लोग (२)

तू नादान न जाने कैसे रूप चुराते लोग

नज़रें जी जी भर के देखें आते जाते लोग

छैल छबीली रानी थोड़ा

छैल छबीली रानी थोड़ा घूँघट और निकाल

इक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल


घनक घटा कलियाँ और तारे सब हैं तेरा रूप (२)

गज़लें हों या गीत हों मेरे सब में तेरा रूप

यूँ ही चमकती रहे हमेशा तेरे हुस्न की धूप

तुझे नज़र ना लगे किसी की

तुझे नज़र ना लगे किसी की जिये हज़ारों साल

इक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल


चाँदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल

इक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल

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गाना / Title: चाँदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल 

चित्रपट / Film: गैर फिल्म-(Non-Film)

संगीतकार / Music Director:

गीतकार / Lyricist: Mumtaz Rashid

गायक / Singer(s): पंकज उधास-(Pankaj Udhas)

तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है | Tera chehara kitana suhana lagata hai | Poemgazalshayari

April 18, 2021 0 Comments

 तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है

तेरे आगे चाँद पुराना लगता है


तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं

सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है


आग का क्या है पल दो पल में लगती है

बुझते बुझते एक ज़माना लगता है


सच तो ये है फूल का दिल भी छलनी है

हंसता चेहरा एक बहाना लगता है


माशूक का बुढ़ापा लज्ज़त दिला रहा है

अंगूर का मज़ा अब किशमिश में आ रहा है


Movie/Album: यूनिक (1996)

Music By: जगजीत सिंह

Lyrics By: कैफ भोपाली

Performed By: जगजीत सिंह

Saturday, April 17, 2021

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है | Dil-E-Nadan Tujhe Hua kya hai lyrics | Mirza Ghalib | Poemgazalshayari

April 17, 2021 0 Comments

 दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है

आखिर इस दर्द की दवा क्या है


हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार

या इलाही, ये माजरा क्या है


मैं भी मुह में ज़ुबान रखता हूँ

काश पूछो की मुद्द क्या है


जबकि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद

फिर ये हंगामा ऐ खुदा क्या है


ये परी-चेहरा लोग कैसे हैं

ग़मज़ा-ओ-उश्वा-ओ-अदा क्या है


शिकने-ज़ुलफ़े-अमबरी क्या है

निगाहे-चश्मे-सुरम सा क्या है


सब्ज़-ओ-गुल कहाँ से आये हैं

अब्र क्या चीज़ है, हवा क्या है


हमको उनसे वफ़ा कि है उम्मीद

जो नहीं जानते वफ़ा क्या है


हाँ भला कर, तेरा भला होगा

और दरवेश की सदा क्या है


जान तुम पर निसार करता हूँ

मैं नहीं जानता दुआ क्या है


मैने माना कि कुछ नहीं ``ग़ालिब''

मुफ़्त हाथ आये, तो बुरा क्या है

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गाना / Title: दिल-ए-नादां, तुझे हुआ क्या है - dil-e-naadaa.n, tujhe huaa kyaa hai

चित्रपट / Film: मिर्झा गालिब-(Mirza Ghalib)

संगीतकार / Music Director: Ghulam Mohammad

गीतकार / Lyricist: मिर्ज़ा गालिब-(Mirza Ghalib)

गायक / Singer(s): सुरैया-(Suraiyya),  तलत महमूद-(Talat Mahmood)

Friday, April 9, 2021

ध अक्षर से शुरू होने वाले हिंदी गाने | Hindi Song From Word ‘DH’ (‘ध’ शब्द से शुरू होने वाले हिंदी गाने)

April 09, 2021 0 Comments

 ध अक्षर से शुरू होने वाले हिंदी गाने | Hindi Song From Word ‘DH’ (‘ध’ शब्द से शुरू होने वाले हिंदी गाने)


  1.  Dhire Dhire Se Meri Zindagi Mein Aana , Tume Mil Kar Hamko Hai batana (धीरे धीरे से मेरी जिन्दगी में आना, तुमसे मिलकर हमको है बताना) (Movie – Aashiqui)

  2. Dhire Dhire Pyar Ko Badhana Hain , Had Se Gujar Jana Hai (धीरे धीरे प्यार को बढ़ाना है हद से गुजर जाना है) (Movie – Phool Aur Kante)
  3. Dheere Dheere Chal Chand Gagan Mein, Kahin Dhal Na jaye Raat, Tut Naa Jayen Sapne (धीरे धीरे चल चाँद गगन में, कहीं ढल ना जाये रात, टूट ना जायें सपने) (Movie – Love Marriage)
  4. Dhinak dhinak dhin tara, Dhinak dhinak re, Imli ka buta, Ber Ka ped, Imli Khatti, Mithe Ber (धिनक धिनक धिन तारा, धिनक धिनक रे, इमली का बूटा, बेर का पेड़, इमली खट्टी, मीठे बेर) (Movie – Saudagar)
  5. Dhup mein nikla na karo roop ki rani, Gora rang kala naa pad jaaye (धुप में निकला न करो रूप की रानी, गोरा रंग काला ना पड़ जाए) (Movie – Giraftaar)
  6. Dham Dham Dhadam Dhadiya Re, Sabse Bade Ladaiya Re, Omkara, He Omkara (धम धम धड़म धड़य्या रे,सबसे बड़े लड़य्या रे, ओमकारा, हे ओमकारा) (Movie – Omkara)
  7. Dhin Tara, Dhin Tara, Bole Man Ka Iktara, Saath Kabhi Naa Chhute Apna, Jeevan Hai Bahti Dhara (धिन तारा, धिन तारा, बोले मन का इकतारा, साथ कभी ना छूटे अपना, जीवन है बहती धारा) (Movie – Pratigyabadh)
  8. Dhak Dhak Karne Laga, Ho Mora Jiyara Darne Laga (धक धक करने लगा, हो मोरा जियरा डरने लगा) (Movie – Beta)
  9. Dhuaan Dhuaan Si Hai Zindagi, Dhundhla Sa Hai, Khwaab Kahin (धुंआ धुंआ सी है जिंदगी, धुंधला सा है ख्वाब कहीं) (Movie – Fugly)
  10. Dhoom Macha Le, Dhoom Macha Le, Dhoom Macha Le, Dhoom Macha Le (धूम मचा ले, धूम मचा ले,धूम मचा ले,धूम मचा ले) (Movie – Dhoom 2)
  11. Dheere Dheere Aap Mere Dil Ke Mehman Ho Gaye (धीरे धीरे आप मेरे दिल के मेहमान हो गए) (Movie – Baazi)
  12. Dhoop Nikalti Hai Jahaan Se, Chandni Rehti Hai Jahaan Pe, Khabar Yeh Ayee Hai Wahaan Se, Koi Tumsa Nahin (धुप निकलती है जहाँ से, चांदनी रहती है जहाँ पे, खबर ये आई है वहां से, कोई तुमसा नहीं) (Movie – Krissh )

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Thursday, April 8, 2021

द शब्द से शुरू होने वाले गाने | List of Bollywood Hindi Song From Word D (‘द’ शब्द से हिंदी फ़िल्मी गीत) | poemgazalshayari.in

April 08, 2021 0 Comments

 द शब्द से शुरू होने वाले गाने | List of Bollywood Hindi Song From Word D (‘द’ शब्द से हिंदी फ़िल्मी गीत)

  1. Dare-E-Dil, Dard-E-Jigar, Dil mein jagayaa aapne, Pahle toh main shayar tha, Aashiq banaya aapne (दर्द-ए-दिल, दर्द-ए-जिगर, दिल में जगाया, पहले तो मैं शायर था, आशिक बनाया आपने) (Movie – Karz)
  2. Dil cheer ke dekh tera hi naam hoga, Teri wafa.. teri sada.. tera payaam hoga.. (दिल चीर के देख तेरा ही नाम होगा, तेरी वफ़ा..तेरी सदा..तेरा पयाम होगा..) (Movie – Rang)
  3. Dil cheez kya hai aap meri jaan lijiye, Bas ek baar mera kaha maan lijiye.. (दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिये, बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये) (Movie – Umrao Jaan)
  4. Dil ne ye kaha hai dil se, Mohabbat ho gayi hai tumse (दिल ने ये कहा है दिल से, मोहब्बत हो गई है तुमसे) (Movie – Dhadkan)
  5. Dil aisa kisi ne mera toda, Barbaadi ki taraf aisa moda (दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा, बर्बादी की तरफ ऐसा मोड़ा) (Movie – Amanush)
  6. Dilbar mere , Kab tak mujhe, Aise hi tadpaoge, Woh aag dil me laga dunga wo, pal me pighal jaoge (दिलबर मेरे कब तक मुझे ऐसे ही तडपाओगे मैं आग दिल में लगा दूंगा वो, के पल में पिघल जाओगे) (Movie – Satte pe Satta)
  7. Dukki pe dukki ho, yaa satte pe satta (दुक्की पे दुक्की हो या सत्ते पे सत्ता) (Movie – Satte Pe Satta)
  8. Dil Deewaana Bin Sajna Ke Maane Naa, Ye Pagla Hai, Samjhane Se Samjhe Naa (दिल दीवाना बिन सजना के माने ना, ये पगला है, समझाने से समझे ना ) (Movie – Maine Pyar Kiya)
  9. Dil mera, har baar ye, sunne ko, bekaraar hai, Kaho naa pyaar hai (दिल मेरा हर बार ये सुनने को बेकरार है, कहो ना प्यार है) (Movie – Kaho Naa Pyar Hai)
  10. Dil Hai Ke Manta Nahin Dil Hai Ke Manta Nahin, Mushkil Badi Hai Rasme Mohabbat Ye Jaanta Hi Nahin (दिल है कि मानता नहीं, दिल है कि मानता नहीं , मुश्किल बड़ी है रस्मे मोहब्बत, ये जानता ही नहीं (Movie – Dil Hai Ki Manta Nahi)
  11. Didi tera devar diwana, O didi tera devar diwana, Haay raam kudiyon ko daale daana (दीदी तेरा देवर दिवाना, ओ दीदी तेरा देवर दिवाना, हाय राम कुड़ियों को डाले दाना) (Movie – Hum Aapke Hain Kaun)
  12. Din dhhal jaaye, Haay raat naa jaay, Tu to aaye, teri yaad sataaye (दिन ढल जाय हाय, रात ना जाय, तू तो ना आये, तेरी याद सताए..) (Movie – Guide)
  13. Dekha ek khwab toh ye silsile huye, Dur tak nigahon me hain gul khile huye (देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए दूर तक निगाहों में हैं गुल खिले हुए…) (Movie – Silsila)
  14. Dil ka dariya beh hi gaya. Ishq ibaadat bann hi gaya (दिल का दरिया, बह ही गया, इश्क इबादत बन ही गया) (Movie – Kabir Singh)
  15. Dil ke armaan, Aansuon me beh gaye, Hum wafa kar ke bhi tanha rah gaye (दिल के अरमां आँसुओं में बह गए हम वफ़ा करके भी तन्हा रह गए) (Movie – Nikaah)
  16. Dil ko zara sa aaram denge. Aaj nahi hum tera naam lenge (दिल को ज़रा सा आराम देंगे, आज नहीं हम तेरा नाम लेंगे) (Movie – Ekka Raja Rani)
  17. Deewanon se ye mat poochho, deewanon pe kya gujri hai, gujari hai..(दीवानों से ये मत पूछो, दीवानों पे क्या गुज़री है, गुजरी है) (Movie – Upkar)
  18. Dil ke jharokhon me tujhko bithaakar, yaadon ko teri main dulhan banakar (दिल के झरोकों में तुझको बिठा कर, यादों को तेरी मैं दुल्हन बना कर) (Movie – Brahmachari)
  19. Dil kya kare, Jab kisi Ko Kisi Se Pyar Ho Jaye (दिल क्या करे, जब किसी को, किसी से प्यार हो जाए) (Movie – Julie)
  20. Dekho Dekho Kya Woh Ped Hai, Chaadar Odhe Ya Khada Koi (देखो देखो क्या वो पेड़ है, चादर ओढ़े या खड़ा कोई) (Movie -Taare Zameen Par)
  21. Duniya Banane wale kya tere man mein samai… Kahe ko duniya banai..(दुनिया बनानेवाले क्या तेरे मन में समाई काहे को दुनिया बनाई ) (Movie- Teesri Kasam)
  22. Dil deke dekho, Dil deke dekho, Dil deke dekho ji (दिल दे के देखो दिल दे के देखो) (Movie – Dil De Ke Dekho)
  23. Dulhan Tu Dulha Main Ban Jaunga, Mera Intejaar karna, Baaraat le ke aaunga. (दुल्हन तू, दूल्हा मैं बन जाऊंगा, मेरा इन्तेजार करना, बारात ले के आऊंगा) (Movie – Dil Hai Ki Manta Nahin)
  24. Dushman naa kare, Dost ne wo kaam kiya hai, Umr bhar ka gham, Hamein inaam diya hai (दुश्मन ना करे, दोस्त ने वो काम किया है, उम्र भर का गम हमें इनाम दिया है) (Movie – Aakhir Kyon)


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Tuesday, April 6, 2021

Hindi Song From Word Th (‘थ’ शब्द से शुरू होने वाले गाने) | poemgazalshayari.in

April 06, 2021 0 Comments

 Hindi Song From Word Th (‘थ’ शब्द से शुरू होने वाले गाने)


Thodi Jagah De De Mujhe, Tere Paas Kahi Rah Jaaun Main (थोड़ी जगह दे दे मुझे, तेरे पास कहीं रह जाऊं मैं) (Movie – Marjaavan)

Thodi Si Jo Pii Lii Hai, Chori Toh Nahi Ki Hai, O Juli, O Sheela, O Rano, Sambhalo (थोड़ी सी जो पी ली है, चोरी तो नहीं की है, ओ जुली, ओ शीला, ओ रानो, संभालो) (Movie – Namak Halaal)

Thare Vaste Re Dhola, Thare Vaste Re Dhola, Nain Maare Jaage Re Jage, Nain Maare Jaage Re, Saari Rain Jage, Tu Mharo Kaun Lage (थारे वास्ते रे ढोला, थारे वास्ते रे ढोला, नैन म्हारे जागे रे जागे, नैन म्हारे जागे रे सारी रैन जागे, तू म्हारो कौन लागे (Movie – Batwara)

Thodi Thodi Si Katthai Uski Aankhen, Thodi Sur Me Bhari, Uske Hothon Pe Muskuraye, Haay Duniya Meri (थोड़ी थोड़ी कत्थई सी उसकी आँखे, थोड़ी सुर में भरी, उसके होठों पे मुसुकुराए, हाय दुनिया मेरी.) (Movie – Heropanti)

Tham ke baras, O jara Tham ke baras, Mujhe Mahbub Ke Paas Jana Hai (थम के बरस, ओ जरा थम के बरस, मुझे महबूब के पास जाना है) (Album – Mere Mehboob)

Tham ja zindagi, lambi Daud Hai, Thak jayegi tu, Ab manzil Door Hai (थम जा जिन्दगी, लम्बी दौड़ है, थक जाएगी तू, अब मंजिल दूर है) (Album – Girl In The City)

Thoda Sa Pyar Hua Hai, Thoda Hain Banki, Ham To Dil De Hi Chuke, Bas Teri Haan Hai Banki (थोड़ा सा प्यार हुआ है, थोड़ा हैं बांकी, हम तो दिल दे ही चुके, बस तेरी हाँ है बांकी) (Movie – Maine Dil Tujhko Diya)


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Sunday, April 4, 2021

Sadgi To Hamari Zara Dhekhiye Hindi Lyrics - Nusrat Fateh Ali Khan

April 04, 2021 0 Comments

 Sadgi To Hamari Zara Dhekhiye Hindi Lyrics - Nusrat Fateh Ali Khan


सादगी तो हमारी जरा देखिये, एतबार आपके वादे पे कर लिया |

बात तो शीर्फ एक रात की थी मगर, इंतज़ार आपका उम्रभर कर लिया ||


इश्क में उलझने पहले ही कम न थी, और पैगामे आ-दर्दे-सर कर लिया |

लोग डरते हे कातिल की परछाईं से, हमने कातिल के दिल में भी घर कर लिया ||


जिक्र इक बेवफ़ा और सितम ग़र का था, आपका ऐसी बातों से क्या वास्ता ||

आप तो बेवफा और सितमगर नहीं, आपने किस लिए मुह उधर कर लिया ||


जिंदगी भर के शिकवे-गिले थे बहुत , वक़्त इतना कहाँ था कि दोहराते हम  |

इक हिचकी में कह डाली सब दास्तान, हमने किस्से को यूँ मुख़्तसर कर लिया ||


बेकरारी मिलेगी मिटेगा सुकून, चैन छिन जायेगा नीद उड़ जायेगी |

अपना अंजाम सब हमको मालूम था, आपसे दिल का सौदा मगर कर लिया ||


जिंदगी के सफ़र में बहुत दूर तक, जब कोई दोस्त आया न हमको नज़र |

हमने घबरा के तन्हाइयो से ऐ “सबा”, इक दुश्मन को खुद हमसफ़र कर लिया ||


सादगी तो हमारी जरा देखिये, एतबार आपके वादे पे कर लिया …..


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मुंशी प्रेमचंद | ग़बन | उपन्यास | poemgazalshayari.in

April 04, 2021 0 Comments

 गबन

प्रेमचन्द

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गबन

बरसात के िदिन ह, सावन का महीना । आकाश में सुनहरी घटाएँ छाई हुई ह । रह-रहकर िरमिझिम वषा

होने लगती है । अभी तीसरा पहर है; पर ऐसा मालूम हों रहा है, शाम हो गयी । आमों के बाग़ में झिूला पड़ा

हुआ है । लड़िकयाँ भी झिूल रहीं ह और उनकी माताएँ भी । दिो-चार झिूल रहीं ह, दिो चार झिुला रही ह । कोई

कजली गाने लगती है, कोई बारहमासा । इस ऋतु में मिहलाआं की बाल-स्मृतितयाँ भी जाग उठती ह । ये फुहार

मानो िचताआं को ह्रदिय से धो डालती ह । मानो मुरझिाए हुए मन को भी हरा कर देती ह । सबके िदिल उमंगों से

भरे हुए ह । घानी सािडयों ने प्रकृतित की हिरयाली से नाता जोड़ा है ।

इसी समय एक िबसाती आकर झिूले के पास खडा हो गया। उसे देखते ही झिूला बंदि हो गया। छोटी -बडी

सबों ने आकर उसे घेर िलया। िबसाती ने अपना संदूक खोला और चमकती -दिमकती चीजें िनकालकर िदिखाने

लगा। कच्चे मोितयों के गहने थ, कच्चे लैस और गोट, रंगीन मोजे, खूबसूरत गुिडयां और गुिडयों के गहने, बच्चों

के लट्टू और झिुनझिुने। िकसी ने कोई चीज ली, िकसी ने कोई चीज। एक बडी-बडी आंखों वाली बािलका ने वह

चीज पसंदि की, जो उन चमकती हुई चीजों में सबसे सुंदिर थी। वह िगरोजी रंग का एक चन्द्रहार था। मां से

बोली--अम्मां, मैं यह हार लूंगी।

मां ने िबसाती से पूछा--बाबा, यह हार िकतने का है - िबसाती ने हार को रूमाल से पोंछते हुए कहा—

खरीदि तो बीस आने की है, मालिकन जो चाहें दे दें।

माता ने कहा—यह तो बडा महंगा है। चार िदिन में इसकी चमक-दिमक जाती रहेगी।

िबसाती ने मािमक भाव से िसर िहलाकर कहा--बहूजी, चार िदिन में तो िबिटया को असली चन्द्रहार िमल

जाएगा! माता के ह्रदिय पर इन सह्रदियता से भरे हुए शब्दिों ने चोट की। हार ले िलया गया।

बािलका के आनंदि की सीमा न थी। शायदि हीरों के हार से भी उसे इतना आनंदि न होता। उसे पहनकर वह

सारे गांव में नाचती िगरी। उसके पास जो बाल-संपित्ति थी, उसमें सबसे मूल्यवान, सबसे िप्रय यही िबल्लौर का

हार था। लडकी का नाम जालपा था, माता का मानकी।

महाशय दिीनदियाल प्रयाग के छोट - से गांव में रहते थ। वह िकसान न थ पर खेती करते थ। वह जमींदिार

न थ पर जमींदिारी करते थ। थानेदिार न थ पर थानेदिारी करते थ। वह थ जमींदिार के मुख्तार। गांव पर उन्हीं की

धाक थी। उनके पास चार चपरासी थ, एक घोडा, कई गाएं- - भैंसें। वेतन कुल पांच रूपये पाते थ, जो उनके

तंबाकू के खचर्च को भी काफी न होता था। उनकी आय के और कौन से मागर्च थ, यह कौन जानता है। जालपा उन्हीं

की लडकी थी। पहले उसके तीन भाई और थ, पर इस समय वह अकेली थी। उससे कोई पूछता--तेरे भाई क्या

हुए, तो वह बडी सरलता से कहती--बडी दूर खेलने गए ह। कहते ह, मुख्तार साहब ने एक गरीब आदिमी को

इतना िपटवाया था िक वह मर गया था। उसके तीन वषर्च के अंदिर तीनों लङके जाते रहे। तब से बेचारे बहुत

संभलकर चलते थ। फूंक - फूंककर पांव रखते, दूध के जले थ, छाछ भी फूंक - फूंककर पीते थ। माता और िपता

के जीवन में और क्या अवलंब? दिीनदियाल जब कभी प्रयाग जाते, तो जालपा के िलए कोई न कोई आभूषण जरूर

लाते। उनकी व्यावहािरक बुिद्धि में यह िवचार ही न आता था िक जालपा िकसी और चीज से अिधक प्रसन्न हो

सकती है। गुिडयां और िखलौने वह व्यथर्च समझिते थ, इसिलए जालपा आभूषणों से ही खेलती थी। यही उसके

िखलौने थ। वह िबल्लौर का हार, जो उसने िबसाती से िलया था, अब उसका सबसे प्यारा िखलौना था। असली

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हार की अिभलाषा अभी उसके मन में उदिय ही नहीं हुई थी। गांव में कोई उत्सव होता, या कोई त्योहार पडता,

तो वह उसी हार को पहनती। कोई दूसरा गहना उसकी आंखों में जंचता ही न था। एक िदिन दिीनदियाल लौट, तो

मानकी के िलए एक चन्द्रहार लाए। मानकी को यह साके बहुत िदिनों से थी। यह हार पाकर वह मुग्ध हो गई।

जालपा को अब अपना हार अच्छा न लगता, िपता से बोली--बाबूजी, मुझिे भी ऐसा ही हार ला दिीिजए।

दिीनदियाल ने मुस्कराकर कहा—ला दूंगा, बेटी!

कब ला दिीिजएगा

बहुत जल्दिी ।

बाप के शब्दिों से जालपा का मन न भरा।

उसने माता से जाकर कहा—अम्मांजी, मुझिे भी अपना सा हार बनवा दिो।

मां—वह तो बहुत रूपयों में बनेगा, बेटी!

जालपा—तुमने अपने िलए बनवाया है, मेरे िलए क्यों नहीं बनवातीं?

मां ने मुस्कराकर कहा—तेरे िलए तेरी ससुराल से आएगा।

यह हार छ सौ में बना था। इतने रूपये जमा कर लेना, दिीनदियाल के िलए आसान न था। ऐसे कौन बडे

ओहदेदिार थ। बरसों में कहीं यह हार बनने की नौबत आई जीवन में िफर कभी इतने रूपये आयेंग, इसमें उन्हें

संदेह था। जालपा लजाकर भाग गई, पर यह शब्दि उसके ह्रदिय में अंिकत हो गए। ससुराल उसके िलए अब उतनी

भंयकर न थी। ससुराल से चन्द्रहार आएगा, वहां के लोग उसे माता-िपता से अिधक प्यार करग, तभी तो जो

चीज ये लोग नहीं बनवा सकते, वह वहां से आएगी।

लेिकन ससुराल से न आए तो उसके सामने तीन लड़िकयों के िववाह चुके थ, िकसी की ससुराल से चन्द्रहार

न आया था। कहीं उसकी ससुराल से भी न आया तो- उसने सोचा--तो क्या माताजी अपना हार मुझिे दे देंगी?

अवश्य दे देंगी।

इस तरह हंसते-खेलते सात वषर्च कट गए। और वह िदिन भी आ गया, जब उसकी िचरसंिचत अिभलाषा पूरी

होगी।

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दिो

मुंशी दिीनदियाल की जान - पहचान के आदििमयों में एक महाशय दियानाथ थ, बडे ही सज्जन और सह्रदिय

कचहरी में नौकर थ और पचास रूपये वेतन पाते थ। दिीनदियाल अदिालत के कीड़े थ। दियानाथ को उनसे सैकड़ों

ही बार काम पड़ चुका था। चाहते, तो हजारों वसूल करते, पर कभी एक पैसे के भी रवादिार नहीं हुए थ।

दिीनदियाल के साथ ही उनका यह सलूक न था?-यह उनका स्वभाव था। यह बात भी न थी िक वह बहुत ऊँचे

आदिशर्च के आदिमी हों, पर िरश्वत को हराम समझिते थ। शायदि इसिलए िक वह अपनी आंखों से इस तरह के दिृतश्य

देख चुके थ। िकसी को जेल जाते देखा था, िकसी को संतान से हाथ धोते, िकसी को दुर्व्यर्चसनों के पंजे में फंसते।

ऐसी उन्हें कोई िमसाल न िमलती थी, िजसने िरश्वत लेकर चैन िकया हो उनकी यह दिृतढ़ धारणा हो गई थी िक

हराम की कमाई हराम ही में जाती है। यह बात वह कभी न भूलते इस जमाने में पचास रुपए की भुगुत ही क्या

पांच आदििमयों का पालन बडी मुिश्कल से होता था। लङके अच्छे कपड़ों को तरसते, स्त्री गहनों को तरसती, पर

दियानाथ िवचिलत न होते थ। बडा लड़का दिो ही महीने तक कालेज में रहने के बादि पढ़ना छोड़ बैठा। िपता ने

साफ कह िदिया--मैं तुम्हारी िडग्री के िलए सबको भूखा और नंगा नहीं रख सकता। पढ़ना चाहते हो, तो अपने

पुरूषाथर्च से पढ़ो। बहुतों ने िकया है, तुम भी कर सकते हो । लेिकन रमानाथ में इतनी लगन न थी। इधर दिो साल

से वह िबलकुल बेकार था। शतरंज खेलता, सैर - सपाट करता और मां और छोट भाइयों पर रोब जमाता। दिोस्तों

की बदिौलत शौक पूरा होता रहता था। िकसी का चेस्टर मांग िलया और शाम को हवा खाने िनकल गए। िकसी

का पंपःशू पहन िलया, िकसी की घड़ी कलाई पर बांधा ली। कभी बनारसी फैशन में िनकले, कभी लखनवी फैशन

मेंब दिस िमत्रों ने एक-एक कपडा बनवा िलया, तो दिस सूट बदिलने का उपाय हो गया। सहकािरता का यह

िबलकुल नया उपयोग था। इसी युवक को दिीनदियाल ने जालपा के िलए पसंदि िकया। दियानाथ शादिी नहीं करना

चाहते थ। उनके पास न रूपये थ और न एक नए पिरवार का भार उठाने की िहम्मत, पर जागश्वरी ने ित्रया-हठ

से काम िलया और इस शिक्त के सामने पुरूष को झिुकना पड़ा। जागश्वरी बरसों से पुत्रवधू के िलए तड़प रही थी।

जो उसके सामने बहुएं बनकर आइ, वे आज पोते िखला रही ह, िफर उस दुर्िखया को कैसे धैयर्च होता। वह कुछकुछ िनराश हो चली थी। ईश्वर से मनाती थी िक कहीं से बात आए। दिीनदियाल ने संदेश भेजा, तो उसको आंखें-

सी िमल गई। अगर कहीं यह िशकार हाथ से िनकल गया, तो िफर न जाने िकतने िदिनों और राह देखनी पड़े।

कोई यहां क्यों आने लगा। न धन ही है, न जायदिादि। लङके पर कौन रीझिता है। लोग तो धन देखते ह, इसिलए

उसने इस अवसर पर सारी शिक्त लगा दिी और उसकी िवजय हुई।

दियानाथ ने कहा, भाई, तुम जानो तुम्हारा काम जाने। मुझिमें समाई नहीं है। जो आदिमी अपने पेट की िफक

नहीं कर सकता, उसका िववाह करना मुझिे तो अधमर्च-सा मालूम होता है। िफर रूपये की भी तो िफक है। एक

हजार तो टीमटाम के िलए चािहए, जोड़े और गहनों के िलए अलग। (कानों पर हाथ रखकर) ना बाबा! यह बोझि

मेरे मान का नहीं।

जागश्वरी पर इन दिलीलों का कोई असर न हुआ, बोली—वह भी तो कुछ देगा-

मैं उससे मांगने तो जाऊंगा नहीं।

तुम्हारे मांगने की जरूरत ही न पड़ेगी। वह खुदि ही देंग। लडकी के ब्याह में पैसे का मुंह कोई नहीं देखता।

हां, मकदूर चािहए, सो दिीनदियाल पोढ़े आदिमी ह। और िफर यही एक संतान है; बचाकर रखेंग, तो िकसके िलए?

दियानाथ को अब कोई बात न सूझिी, केवल यही कहा--वह चाहे लाख दे दें, चाहे एक न दें, मैं न कहूंगा िक दिो, न

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कहूंगा िक मत दिो। कजर्च मैं लेना नहीं चाहता, और लूं, तो दूंगा िकसके घर से?

जागश्वरी ने इस बाधा को मानो हवा में उडाकर कहा--मुझिे तो िवश्वास है िक वह टीके में एक हजार से

कम न देंग। तुम्हारे टीमटाम के िलए इतना बहुत है। गहनों का प्रबंध िकसी सराफ से कर लेना। टीके में एक

हजार देंग, तो क्या द्वार पर एक हजार भी न देंग- वही रूपये सराफ को दे देना। दिो-चार सौ बाकी रहे, वह

धीरे-धीरे चुक जाएंग। बच्चा के िलए कोई न कोई द्वार खुलेगा ही।

दियानाथ ने उपेक्षा-भाव से कहा--'खुल चुका, िजसे शतरंज और सैर-सपाट से फुरसत न िमले, उसे सभी

द्वार बंदि िमलेंग।

जागश्वरी को अपने िववाह की बात यादि आई। दियानाथ भी तो गुलछरे उडाते थ लेिकन उसके आते ही

उन्हें चार पैसे कमाने की िफक कैसी िसर पर सवार हो गई थी। साल-भर भी न बीतने पाया था िक नौकर हो

गए। बोली--बहू आ जाएगी, तो उसकी आंखें भी खुलेंगी, देख लेना। अपनी बात यादि करो। जब तक गले में जुआ

नहीं पडा है, तभी तक यह कुलेलें ह। जुआ पडा और सारा नशा िहरन हुआ। िनकम्मों को राह पर लाने का इससे

बढ़कर और कोई उपाय ही नहीं।

जब दियानाथ परास्त हो जाते थ, तो अख़बार पढ़ने लगते थ। अपनी हार को िछपाने का उनके पास यही

संकेत था।

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तीन

मुंशी दिीनदियाल उन आदििमयों में से थ, जो सीधों के साथ सीधे होते ह, पर टढ़ों के साथ टढ़े ही नहीं,

शैतान हो जाते ह। दियानाथ बडा-सा मुंह खोलते, हजारों की बातचीत करते, तो दिीनदियाल उन्हें ऐसा चकमा देते

िक वह उम- भर यादि करते। दियानाथ की सज्जनता ने उन्हें वशीभूत कर िलया। उनका िवचार एक हजार देने का

था, पर एक हजार टीके ही में दे आए। मानकी ने कहा--जब टीके में एक हजार िदिया, तो इतना ही घर पर भी

देना पड़ेगा। आएगा कहां से- दिीनदियाल िचढ़कर बोले--भगवान मािलक है। जब उन लोगों ने उदिारता िदिखाई

और लड़का मुझिे सौंप िदिया, तो मैं भी िदिखा देना चाहता हूं िक हम भी शरीफ ह और शील का मूल्य पहचानते

ह। अगर उन्होंने हेकड़ी जताई होती, तो अभी उनकी खबर लेता।

दिीनदियाल एक हजार तो दे आए, पर दियानाथ का बोझि हल्का करने के बदिले और भारी कर िदिया। वह

कजर्च से कोसों भागते थ। इस शादिी में उन्होंने िमयां की जूती िमयां की चांदि वाली नीित िनभाने की ठानी थी पर

दिीनदियाल की सह्रदियता ने उनका संयम तोड़ िदिया। वे सारे टीमटाम, नाच-तमाश, िजनकी कल्पना का उन्होंने

गला घोंट िदिया था, वही रूप धारण करके उनके सामने आ गए। बंधा हुआ घोडाथान से खुल गया, उसे कौन रोक

सकता है। धूमधाम से िववाह करने की ठन गई। पहले जोडे--गहने को उन्होंने गौण समझि रखा था, अब वही

सबसे मुख्य हो गया। ऐसा चढ़ावा हो िक मड़वे वाले देखकर भङक उठं। सबकी आंखें खुल जाएं । कोई तीन हजार

का सामान बनवा डाला। सराफ को एक हजार नगदि िमल गए, एक हजार के िलए एक सप्ताह का वादिा हुआ, तो

उसने कोई आपित्ति न की। सोचा--दिो हजार सीधे हुए जाते ह, पांच-सात सौ रूपये रह जाएंग, वह कहां जाते ह।

व्यापारी की लागत िनकल आती है, तो नगदि को तत्काल पाने के िलए आग्रह नहीं करता। िफर भी चन्द्रहार की

कसर रह गई। जडाऊ चन्द्रहार एक हजार से नीचे अच्छा नहीं िमल सकता था। दियानाथ का जी तो लहराया िक

लग हाथ उसे भी ले लो, िकसी को नाक िसकोड़ने की जगह तो न रहेगी, पर जागश्वरी इस पर राजी न हुई।

बाजी पलट चुकी थी। दियानाथ ने गमर्च होकर कहा--तुम्हें क्या, तुम तो घर में बैठी रहोगी। मौत तो मेरी होगी,

जब उधार के लोग नाकभौं िसकोड़ने लगंग।

जागश्वरी--दिोग कहां से, कुछ सोचा है?

दियानाथ--कम-से-कम एक हजार तो वहां िमल ही जाएंग।

जागश्वरी--खून मुंह लग गया क्या?

दियानाथ ने शरमाकर कहा--नहीं-नहीं, मगर आिखर वहां भी तो कुछ िमलेगा?

जागश्वरी--वहां िमलेगा, तो वहां खचर्च भी होगा। नाम जोड़े गहने से नहीं होता, दिान-दििक्षणा से होता है।

इस तरह चन्द्रहार का प्रस्ताव रद्द हो गया।

मगर दियानाथ िदिखावे और नुमाइश को चाहे अनावश्यक समझिं, रमानाथ उसे परमावश्यक समझिता था।

बरात ऐसे धूम से जानी चािहए िक गांव-भर में शोर मच जाय। पहले दूल्हे के िलए पालकी का िवचार था।

रमानाथ ने मोटर पर जोर िदिया। उसके िमत्रों ने इसका अनुमोदिन िकया, प्रस्ताव स्वीकृतत हो गया। दियानाथ

एकांतिप्रय जीव थ, न िकसी से िमत्रता थी, न िकसी से मेल-जोल। रमानाथ िमलनसार युवक था, उसके िमत्र ही

इस समय हर एक काम में अग्रसर हो रहे थ। वे जो काम करते, िदिल खोल कर। आितशबािजयां बनवाई, तो

अव्वल दिजे की। नाच ठीक िकया, तो अव्वल दिजे का; बाजे-गाजे भी अव्वल दिजे के, दिोयम या सोयम का वहां

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िजक ही न था। दियानाथ उसकी उच्छृतंखलता देखकर िचितत तो हो जाते थ पर कुछ कह न सकते थ। क्या कहते!

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चार

नाटक उस वक्त पास होता है, जब रिसक समाज उसे पंसदि कर लेता है। बरात का नाटक उस वक्त पास

होता है, जब राह चलते आदिमी उसे पंसदि कर लेते ह। नाटक की परीक्षा चार-पांच घंट तक होती रहती है, बरात

की परीक्षा के िलए केवल इतने ही िमनटों का समय होता है। सारी सजावट, सारी दिौड़धूप और तैयारी का

िनबटारा पांच िमनटों में हो जाता है। अगर सबके मुंह से वाह-वाह िनकल गया, तो तमाशा पास नहीं तो !

रूपया, मेहनत, िफक, सब अकारथ। दियानाथ का तमाशा पास हो गया। शहर में वह तीसरे दिजे में आता, गांव में

अव्वल दिजे में आया। कोई बाजों की धोंधों-पों-पों सुनकर मस्त हो रहा था, कोई मोटर को आंखें गाड़-गाड़कर

देख रहा था। कुछ लोग फुलवािरयों के तख्त देखकर लोट-लोट जाते थ। आितशबाजी ही मनोरंजन का केंद्र थी।

हवाइयां जब सकै से ऊपर जातीं और आकाश में लाल, हरे, नीले, पीले, कुमकुमे-से िबखर जाते, जब चिखयां

छूटतीं और उनमें नाचते हुए मोर िनकल आते, तो लोग मंत्रमुग्ध-से हो जाते थ। वाह, क्या कारीगरी है! जालपा

के िलए इन चीजों में लेशमात्र भी आकषर्चण न था। हां, वह वर को एक आंख देखना चाहती थी, वह भी सबसे

िछपाकर; पर उस भीड़-भाड़ में ऐसा अवसर कहां। द्वारचार के समय उसकी सिखयां उसे छत पर खींच ले गई

और उसने रमानाथ को देखा। उसका सारा िवराग, सारी उदिासीनता, सारी मनोव्यथा मानो छू-मंतर हो गई थी।

मुंह पर हषर्च की लािलमा छा गई। अनुराग स्फूित का भंडार है।

द्वारचार के बादि बरात जनवासे चली गई। भोजन की तैयािरयां होने लगीं। िकसी ने पूिरयां खाई, िकसी ने

उपलों पर िखचड़ी पकाई। देहात के तमाशा देखने वालों के मनोरंजन के िलए नाच-गाना होने लगा। दिस बजे

सहसा िफर बाजे बजने लग। मालूम हुआ िक चढ़ावा आ रहा है। बरात में हर एक रस्म डंके की चोट पर अदिा

होती है। दूल्हा कलेवा करने आ रहा है, बाजे बजने लग। समधी िमलने आ रहा है, बाजे बजने लग। चढ़ावा

ज्योंही पहुंचा, घर में हलचल मच गई। स्त्री-पुरूष, बूढ़े-जवान, सब चढ़ावा देखने के िलए उत्सुक हो उठे। ज्योंही

िकिश्तयां मंडप में पहुंचीं, लोग सब काम छोड़कर देखने दिौड़े। आपस में धक्कम-धक्का होने लगा। मानकी प्यास

से बेहाल हो रही थी, कंठ सूखा जाता था, चढ़ावा आते ही प्यास भाग गई। दिीनदियाल मारे भूख-प्यास के

िनजीव-से पड़े थ, यह समाचार सुनते ही सचेत होकर दिौड़े। मानकी एक-एक चीज़ को िनकाल-िनकालकर देखने

और िदिखाने लगी। वहां सभी इस कला के िवशषज्ञ थ। मदिोऊ ने गहने बनवाए थ, औरतों ने पहने थ, सभी

आलोचना करने लग। चूहेदिन्ती िकतनी सुंदिर है, कोई दिस तोले की होगी वाह! साढे। ग्यारह तोले से रत्तिी-भर भी

कम िनकल जाए, तो कुछ हार जाऊं! यह शरदिहां तो देखो, क्या हाथ की सफाई है! जी चाहता है कारीगर के

हाथ चूम लें। यह भी बारह तोले से कम न होगा। वाह! कभी देखा भी है, सोलह तोले से कम िनकल जाए, तो

मुंह न िदिखाऊं। हां, माल उतना चोखा नहीं है। यह कंगन तो देखो, िबलकुल पक्की जडाई है, िकतना बारीक काम

है िक आंख नहीं ठहरती! कैसा दिमक रहा है। सच्चे नगीने ह। झिूठे नगीनों में यह आब कहां। चीज तो यह गुलूबंदि

है, िकतने खूबसूरत फूल ह! और उनके बीच के हीरे कैसे चमक रहे ह! िकसी बंगाली सुनार ने बनाया होगा। क्या

बंगािलयों ने कारीगरी का ठेका ले िलया है, हमारे देश में एक-से-एक कारीगर पड़े हुए ह। बंगाली सुनार बेचारे

उनकी क्या बराबरी करग। इसी तरह एक-एक चीज की आलोचना होती रही। सहसा िकसी ने कहा--चन्द्रहार

नहीं है क्या!

मानकी ने रोनी सूरत बनाकर कहा--नहीं, चन्द्रहार नहीं आया।

एक मिहला बोली--अरे, चन्द्रहार नहीं आया?

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दिीनदियाल ने गंभीर भाव से कहा--और सभी चीजें तो ह, एक चन्द्रहार ही तो नहीं है।

उसी मिहला ने मुंह बनाकर कहा--चन्द्रहार की बात ही और है!

मानकी ने चढ़ाव को सामने से हटाकर कहा--बेचारी के भाग में चन्द्रहार िलखा ही नहीं है।

इस गोलाकार जमघट के पीछे अंधेरे में आशा और आकांक्षा की मूित - सी जालपा भी खड़ी थी। और सब

गहनों के नाम कान में आते थ, चन्द्रहार का नाम न आता था। उसकी छाती धक-धक कर रही थी। चन्द्रहार नहीं

है क्या? शायदि सबके नीचे हो इस तरह वह मन को समझिाती रही। जब मालूम हो गया चन्द्रहार नहीं है तो

उसके कलेजे पर चोट-सी लग गई। मालूम हुआ, देह में रक्त की बूंदि भी नहीं है। मानो उसे मूच्छा आ जायगी।

वह उन्मादि की सी दिशा में अपने कमरे में आई और फूट-फूटकर रोने लगी। वह लालसा जो आज सात वषर्च हुए,

उसके ह्रदिय में अंकुिरत हुई थी, जो इस समय पुष्प और पल्लव से लदिी खड़ी थी, उस पर वज्रपात हो गया। वह

हरा-भरा लहलहाता हुआ पौधा जल गया?-केवल उसकी राख रह गई। आज ही के िदिन पर तो उसकी समस्त

आशाएं अवलंिबत थीं। दुर्दिैव ने आज वह अवलंब भी छीन िलया। उस िनराशा के आवेश में उसका ऐसा जी चाहने

लगा िक अपना मुंह नोच डाले। उसका वश चलता, तो वह चढ़ावे को उठाकर आग में गंक देती। कमरे में एक

आले पर िशव की मूित रक्खी हुई थी। उसने उसे उठाकर ऐसा पटका िक उसकी आशाआं की भांित वह भी चूरचूर हो गई। उसने िनश्चय िकया, मैं कोई आभूषण न पहनूंगी। आभूषण पहनने से होता ही क्या है। जो रूप-

िवहीन हों, वे अपने को गहने से सजाएं, मुझिे तो ईश्वर ने यों ही सुंदिरी बनाया है, मैं गहने न पहनकर भी बुरी न

लगूंगी। सस्ती चीजें उठा लाए, िजसमें रूपये खचर्च होते थ, उसका नाम ही न िलया। अगर िगनती ही िगनानी थी,

तो इतने ही दिामों में इसके दूने गहने आ जाते!

वह इसी कोध में भरी बैठी थी िक उसकी तीन सिखयां आकर खड़ी हो गई। उन्होंने समझिा था, जालपा को

अभी चढ़ाव की कुछ खबर नहीं है। जालपा ने उन्हें देखते ही आंखें पोंछ डालीं और मुस्कराने लगी।

राधा मुस्कराकर बोली--जालपा— मालूम होता है, तूने बडी तपस्या की थी, ऐसा चढ़ाव मैंने आज तक

नहीं देखा था। अब तो तेरी सब साध पूरी हो गई। जालपा ने अपनी लंबी-लंबी पलकें उठाकर उसकी ओर ऐसे

दिीन -नजर से देखा, मानो जीवन में अब उसके िलए कोई आशा नहीं है?

हां बहन, सब साध पूरी हो गई। इन शब्दिों में िकतनी अपार ममान्तक वेदिना भरी हुई थी, इसका अनुमान

तीनों युवितयों में कोई भी न कर सकी । तीनों कौतूहल से उसकी ओर ताकने लगीं, मानो उसका आशय उनकी

समझि में न आया हो बासन्ती ने कहा--जी चाहता है, कारीगर के हाथ चूम लूं।

शहजादिी बोली--चढ़ावा ऐसा ही होना चािहए, िक देखने वाले भड़क उठं।

बासन्ती--तुम्हारी सास बडी चतुर जान पड़ती ह, कोई चीज नहीं छोड़ी।

जालपा ने मुंह उधरकर कहा--ऐसा ही होगा।

राधा--और तो सब कुछ है, केवल चन्द्रहार नहीं है।

शहजादिी--एक चन्द्रहार के न होने से क्या होता है बहन, उसकी जगह गुलूबंदि तो है।

जालपा ने वकोिक्त के भाव से कहा--हां, देह में एक आंख के न होने से क्या होता है, और सब अंग होते

ही ह, आंखें हुई तो क्या, न हुई तो क्या!

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बालकों के मुंह से गंभीर बातें सुनकर जैसे हमें हंसी आ जाती है, उसी तरह जालपा के मुंह से यह लालसा

से भरी हुई बातें सुनकर राधा और बासन्ती अपनी हंसी न रोक सकीं। हां, शहजादिी को हंसी न आई। यह

आभूषण लालसा उसके िलए हंसने की बात नहीं, रोने की बात थी। कृतित्रम सहानुभूित िदिखाती हुई बोली--सब न

जाने कहां के जंगली ह िक और सब चीजें तो लाए, चन्द्रहार न लाए, जो सब गहनों का राजा है। लाला अभी

आते ह तो पूछती हूं िक तुमने यह कहां की रीित िनकाली है?-ऐसा अनथर्च भी कोई करता है।

राधा और बासन्ती िदिल में कांप रही थीं िक जालपा कहीं ताड़ न जाय। उनका बस चलता तो शहजादिी का

मुंह बंदि कर देतीं, बार-बार उसे चुप रहने का इशारा कर रही थीं, मगर जालपा को शहजादिी का यह व्यंग्य,

संवेदिना से पिरपूणर्च जान पड़ा। सजल नेत्र होकर बोली--क्या करोगी पूछकर बहन, जो होना था सो हो गया!

शहजादिी--तुम पूछने को कहती हो, मैं रूलाकर छोडूंगी। मेरे चढ़ाव पर कंगन नहीं आया था, उस वक्त

मन ऐसा खका हुआ िक सारे गहनों पर लात मार दूं। जब तक कंगन न बन गए, मैं नींदि भर सोई नहीं।

राधा--तो क्या तुम जानती हो, जालपा का चन्द्रहार न बनेगा।

शहजादिी--बनेगा तब बनेगा, इस अवसर पर तो नहीं बना। दिस-पांच की चीज़ तो है नहीं, िक जब चाहा

बनवा िलया, सैकड़ों का खचर्च है, िफर कारीगर तो हमेशा अच्छे नहीं िमलते।

जालपा का भग्न ह्रदिय शहजादिी की इन बातों से मानो जी उठा, वह रूंधे कंठ से बोली--यही तो मैं भी

सोचती हूं बहन, जब आज न िमला, तो िफर क्या िमलेगा!

राधा और बासन्ती मन-ही-मन शहजादिी को कोस रही थीं, और थप्पड़ िदिखा-िदिखाकर धमका रही थीं,

पर शहजादिी को इस वक्त तमाश का मजा आ रहा था। बोली--नहीं, यह बात नहीं है जल्ली; आग्रह करने से सब

कुछ हो सकता है, सास-ससुर को बार-बार यादि िदिलाती रहना। बहनोईजी से दिो-चार िदिन रूठे रहने से भी

बहुत कुछ काम िनकल सकता है। बस यही समझि लो िक घरवाले चैन न लेने पाएं, यह बात हरदिम उनके ध्यान

में रहे। उन्हें मालूम हो जाय िक िबना चन्द्रहार बनवाए कुशल नहीं। तुम ज़रा भी ढीली पड़ीं और काम िबगडा।

राधा ने हंसी को रोकते हुए कहा--इनसे न बने तो तुम्हें बुला लें, क्यों - अब उठोगी िक सारी रात उपदेश

ही करती रहोगी!

शहजादिी--चलती हूं, ऐसी क्या भागड़ पड़ी है। हां, खूब यादि आई, क्यों जल्ली, तेरी अम्मांजी के पास बडा

अच्छा चन्द्रहार है। तुझिे न देंगी।

जालपा ने एक लंबी सांस लेकर कहा--क्या कहूं बहन, मुझिे तो आशा नहीं है।

शहजादिी--एक बार कहकर देखो तो, अब उनके कौन पहनने-ओढ़ने के िदिन बैठे ह।

जालपा--मुझिसे तो न कहा जायगा।

शहजादिी--मैं कह दूंगी।

जालपा--नहीं-नहीं, तुम्हारे हाथ जोड़ती हूं। मैं ज़रा उनके मातृतस्नेह की परीक्षा लेना चाहती हूं।

बासन्ती ने शहजादिी का हाथ पकड़कर कहा--अब उठेगी भी िक यहां सारी रात उपदेश ही देती रहेगी।

शहजादिी उठी, पर जालपा रास्ता रोककर खड़ी हो गई और बोली--नहीं, अभी बैठो बहन, तुम्हारे पैरों

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पड़ती हूं।

शहजादिी--जब यह दिोनों चुड़ैलें बैठने भी दें। मैं तो तुम्हें गुर िसखाती हूं और यह दिोनों मुझि पर झिल्लाती

ह। सुन नहीं रही हो, मैं भी िवष की गांठ हूं।

बासन्ती--िवष की गांठ तो तू है ही।

शहजादिी--तुम भी तो ससुराल से सालभर बादि आई हो, कौन-कौन-सी नई चीजें बनवा लाई।

बासन्ती--और तुमने तीन साल में क्या बनवा िलया।

शहजादिी--मेरी बात छोड़ो, मेरा खसम तो मेरी बात ही नहीं पूछता।

राधा--प्रेम के सामने गहनों का कोई मूल्य नहीं।

शहजादिी--तो सूखा प्रेम तुम्हीं को गले।

इतने में मानकी ने आकर कहा--तुम तीनों यहां बैठी क्या कर रही हो , चलो वहां लोग खाना खाने आ रहे

ह।

तीनों युवितयां चली गई। जालपा माता के गले में चन्द्रहार की शोभा देखकर मन-ही-मन सोचने लगी?-

गहनों से इनका जी अब तक नहीं भरा।

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पांच

महाशय दियानाथ िजतनी उमंगों से ब्याह करने गए थ, उतना ही हतोत्साह होकर लौट। दिीनदियाल ने खूब

िदिया, लेिकन वहां से जो कुछ िमला, वह सब नाच-तमाश, नेगचार में खचर्च हो गया। बार-बार अपनी भूल पर

पछताते, क्यों िदिखावे और तमाश में इतने रूपये खचर्च िकए। इसकी जरूरत ही क्या थी, ज्यादिा-से- ज्यादिा लोग

यही तो कहते--महाशय बडे कृतपण ह। उतना सुन लेने में क्या हािन थी? मैंने गांव वालों को तमाशा िदिखाने का

ठेका तो नहीं िलया था। यह सब रमा का दुर्स्साहस है। उसी ने सारे खचर्च बढ़ा-बढ़ाकर मेरा िदिवाला िनकाल

िदिया। और सब तकाजे तो दिस-पांच िदिन टल भी सकते थ, पर सराफ िकसी तरह न मानता था। शादिी के सातव

िदिन उसे एक हजार रूपये देने का वादिा था। सातव िदिन सराफ आया, मगर यहां रूपये कहां थ? दियानाथ में

लल्लो-चप्पो की आदित न थी, मगर आज उन्होंने उसे चकमा देने की खूब कोिशश की। िकस्त बांधकर सब रूपये

छः महीने में अदिा कर देने का वादिा िकया। िफर तीन महीने पर आए, मगर सराफ भी एक ही घुटा हुआ आदिमी

था, उसी वक्त टला, जब दियानाथ ने तीसरे िदिन बाकी रकम की चीजें लौटा देने का वादिा िकया और यह भी

उसकी सज्जनता ही थी। वह तीसरा िदिन भी आ गया, और अब दियानाथ को अपनी लाज रखने का कोई उपाय न

सूझिता था। कोई चलता हुआ आदिमी शायदि इतना व्यग्र न होता, हीले-हवाले करके महाजन को महीनों टालता

रहता; लेिकन दियानाथ इस मामले में अनाड़ी थ।

जागश्वरी ने आकर कहा--भोजन कब से बना ठंडा हो रहा है। खाकर तब बैठो।

दियानाथ ने इस तरह गदिर्चन उठाई, मानो िसर पर सैकड़ों मन का बोझि लदिा हुआ है। बोले--तुम लोग जाकर

खा लो, मुझिे भूख नहीं है।

जागश्वरी--भूख क्यों नहीं है, रात भी तो कुछ नहीं खाया था! इस तरह दिाना-पानी छोड़ देने से महाजन

के रूपये थोड़े ही अदिा हो जाएंग।

दियानाथ--मैं सोचता हूं, उसे आज क्या जवाब दूंगा- मैं तो यह िववाह करके बुरा फंस गया। बहू कुछ गहने

लौटा तो देगी।

जागश्वरी--बहू का हाल तो सुन चुके, िफर भी उससे ऐसी आशा रखते हो उसकी टक है िक जब तक

चन्द्रहार न बन जायगा, कोई गहना ही न पहनूंगी। सारे गहने संदूक में बंदि कर रखे ह। बस, वही एक िबल्लौरी

हार गले में डाले हुए है। बहुएं बहुत देखीं, पर ऐसी बहू न देखी थी। िफर िकतना बुरा मालूम होता है िक कल की

आई बहू, उससे गहने छीन िलए जाएं।

दियानाथ ने िचढ़कर कहा--तुम तो जले पर नमक िछड़कती हो बुरा मालूम होता है तो लाओ एक हजार

िनकालकर दे दिो, महाजन को दे आऊं, देती हो? बुरा मुझिे खुदि मालूम होता है, लेिकन उपाय क्या है? गला कैसे

छूटगा?

जागश्वरी--बेट का ब्याह िकया है िक ठट्ठा है? शादिी-ब्याह में सभी कज़र्च लेते ह, तुमने कोई नई बात नहीं

की। खाने-पहनने के िलए कौन कजर्च लेता है। धमात्मा बनने का कुछ फल िमलना चािहए या नहीं- तुम्हारे ही दिजे

पर सत्यदेव ह, पक्का मकान खडाकर िदिया, जमींदिारी खरीदि ली, बेटी के ब्याह में कुछ नहीं तो पांच हज़ार तो

खचर्च िकए ही होंग।

दियानाथ--जभी दिोनों लङके भी तो चल िदिए!

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जागश्वरी--मरना-जीना तो संसार की गित है, लेते ह, वह भी मरते ह,नहीं लेते, वह भी मरते ह। अगर

तुम चाहो तो छः महीने में सब रूपये चुका सकते हो'

दियानाथ ने त्योरी चढ़ाकर कहा--जो बात िजदिगी?भर नहीं की, वह अब आिखरी वक्त नहीं कर सकता

बहू से साफ-साफ कह दिो, उससे पदिा रखने की जरूरत ही क्या है, और पदिा रह ही िकतने िदिन सकता है। आज

नहीं तो कल सारा हाल मालूम ही हो जाएगा। बस तीन-चार चीजें लौटा दे, तो काम बन जाय। तुम उससे एक

बार कहो तो।

जागश्वरी झिुंझिलाकर बोली--उससे तुम्हीं कहो, मुझिसे तो न कहा जायगा।

सहसा रमानाथ टिनस-रैकेट िलये बाहर से आया। सफेदि टिनस शटर्च था, सफेदि पतलून, कैनवस का जूता,

गोरे रंग और सुंदिर मुखाकृतित पर इस पहनावे ने रईसों की शान पैदिा कर दिी थी। रूमाल में बेले के गजरे िलये हुए

था। उससे सुगंध उड़ रही थी। माता-िपता की आंखें बचाकर वह जीने पर जाना चाहता था, िक जागश्वरी ने

टोका--इन्हीं के तो सब कांट बोए हुए ह, इनसे क्यों नहीं सलाह लेते?(रमा से) तुमने नाच-तमाश में बारह-तेरह

सौ रूपये उडा िदिए, बतलाओ सराफ को क्या जवाब िदिया जाय- बडी मुिश्कलों से कुछ गहने लौटाने पर राजी

हुआ, मगर बहू से गहने मांग कौन- यह सब तुम्हारी ही करतूत है।

रमानाथ ने इस आक्षेप को अपने ऊपर से हटाते हुए कहा--मैंने क्या खचर्च िकया- जो कुछ िकया बाबूजी ने िकया।

हां, जो कुछ मुझिसे कहा गया, वह मैंने िकया।

रमानाथ के कथन में बहुत कुछ सत्य था। यिदि दियानाथ की इच्छा न होती तो रमा क्या कर सकता था?

जो कुछ हुआ उन्हीं की अनुमित से हुआ। रमानाथ पर इल्जाम रखने से तो कोई समस्या हल न हो सकती थी

बोले--मैं तुम्हें इल्जाम नहीं देता भाई। िकया तो मैंने ही, मगर यह बला तो िकसी तरह िसर से टालनी

चािहए। सराफ का तकाजा है। कल उसका आदिमी आवेगा। उसे क्या जवाब िदिया जाएगा? मेरी समझि में तो यही

एक उपाय है िक उतने रूपये के गहने उसे लौटा िदिए जायें। गहने लौटा देने में भी वह झिंझिट करेगा, लेिकन दिसबीस रूपये के लोभ में लौटाने पर राजी हो जायगा। तुम्हारी क्या सलाह है?

रमानाथ ने शरमाते हुए कहा--मैं इस िवषय में क्या सलाह दे सकता हूं, मगर मैं इतना कह सकता हूं िक

इस प्रस्ताव को वह खुशी से मंजूर न करेगी। अम्मां तो जानती ह िक चढ़ावे में चन्द्रहार न जाने से उसे िकतना

बुरा लगा था। प्रण कर िलया है, जब तक चन्द्रहार न बन जाएगा, कोई गहना न पहनूंगी।

जागश्वरी ने अपने पक्ष का समथर्चन होते देख, खुश होकर कहा--यही तो मैं इनसे कह रही हूं।

रमानाथ--रोना-धोना मच जायगा और इसके साथ घर का पदिा भी खुल जायगा।

दियानाथ ने माथा िसकोड़कर कहा--उससे पदिा रखने की जरूरत ही क्या! अपनी यथाथर्च िस्थित को वह

िजतनी ही जल्दिी समझि ले, उतना ही अच्छा।

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छः

रमानाथ ने जवानों के स्वभाव के अनुसार जालपा से खूब जीभ उडाई थी। खूब बढ़-बढ़कर बातें की थीं।

जमींदिारी है, उससे कई हजार का नफा है। बैंक में रूपये ह, उनका सूदि आता है। जालपा से अब अगर गहने की

बात कही गई, तो रमानाथ को वह पूरा लबािडया समझिेगी। बोला--पदिा तो एक िदिन खुल ही जायगा, पर इतनी

जल्दिी खोल देने का नतीजा यही होगा िक वह हमें नीच समझिने लगगी। शायदि अपने घरवालों को भी िलख भेजे।

चारों तरफ बदिनामी होगी।

दियानाथ--हमने तो दिीनदियाल से यह कभी न कहा था िक हम लखपती ह।

रमानाथ--तो आपने यही कब कहा था िक हम उधार गहने लाए ह और दिो-चार िदिन में लौटा देंग! आिखर

यह सारा स्वांग अपनी धाक बैठाने के िलए ही िकया था या कुछ और?

दियानाथ--तो िफर िकसी दूसरे बहाने से मांगना पड़ेगा। िबना मांग काम नहीं चल सकता कल या तो

रूपये देने पड़ंग, या गहने लौटाने पड़ंग। और कोई राह नहीं।

रमानाथ ने कोई जवाब न िदिया। जागश्वरी बोली--और कौन-सा बहाना िकया जायगा- अगर कहा जाय,

िकसी को मंगनी देना है, तो शायदि वह देगी नहीं। देगी भी तो दिो-चार िदिन में लौटाएंग कैसे ?

दियानाथ को एक उपाय सूझिा।बोले--अगर उन गहनों के बदिले मुलम्मे के गहने दे िदिए जाएं? मगर तुरंत ही

उन्हें ज्ञात हो गया िक यह लचर बात है, खुदि ही उसका िवरोध करते हुए कहा--हां, बादि मुलम्मा उड़ जायगा तो

िफर लिज्जत होना पड़ेगा। अक्ल कुछ काम नहीं करती। मुझिे तो यही सूझिता है, यह सारी िस्थित उसे समझिा दिी

जाय। ज़रा देर के िलए उसे दुर्ख तो जरूर होगा,लेिकन आग के वास्ते रास्ता साफ हो जाएगा।

संभव था, जैसा दियानाथ का िवचार था, िक जालपा रो-धोकर शांत हो जायगी, पर रमा की इसमें

िकरिकरी होती थी। िफर वह मुंह न िदिखा सकेगा। जब वह उससे कहेगी, तुम्हारी जमींदिारी क्या हुई- बैंक के

रूपये क्या हुए, तो उसे क्या जवाब देगा- िवरक्त भाव से बोला--इसमें बेइज्जती के िसवा और कुछ न होगा।

आप क्या सराफ को दिो-चार-छः महीने नहीं टाल सकते?आप देना चाहें, तो इतने िदिनों में हजार-बारह सौ रूपये

बडी आसानी से दे सकते ह।

दियानाथ ने पूछा--कैसे ?

रमानाथ--उसी तरह जैसे आपके और भाई करते ह!

दियानाथ--वह मुझिसे नहीं हो सकता।

तीनों कुछ देर तक मौन बैठे रहे। दियानाथ ने अपना फैसला सुना िदिया। जागश्वरी और रमा को यह फैसला

मंजूर न था। इसिलए अब इस गुत्थी के सुलझिाने का भार उन्हीं दिोनों पर था। जागश्वरी ने भी एक तरह से िनश्चय

कर िलया था। दियानाथ को झिख मारकर अपना िनयम तोड़ना पड़ेगा। यह कहां की नीित है िक हमारे ऊपर संकट

पडा हुआ हो और हम अपने िनयमों का राग अलापे जायं। रमानाथ बुरी तरह फंसा था। वह खूब जानता था िक

िपताजी ने जो काम कभी नहीं िकया, वह आज न करग। उन्हें जालपा से गहने मांगने में कोई संकोच न होगा

और यही वह न चाहता था। वह पछता रहा था िक मैंने क्यों जालपा से डींगं मारीं। अब अपने मुंह की लाली

रखने का सारा भार उसी पर था। जालपा की अनुपम छिव ने पहले ही िदिन उस पर मोिहनी डाल दिी थी। वह

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अपने सौभाग्य पर फूला न समाता था। क्या यह घर ऐसी अनन्य सुंदिरी के योग्य था? जालपा के िपता पांच रूपये

के नौकर थ, पर जालपा ने कभी अपने घर में झिाडू न लगाई थी। कभी अपनी धोती न छांटी थी। अपना िबछावन

न िबछाया था। यहां तक िक अपनी के धोती की खींच तक न सी थी। दियानाथ पचास रूपये पाते थ, पर यहां

केवल चौका-बासन करने के िलए महरी थी। बाकी सारा काम अपने ही हाथों करना पड़ता था। जालपा शहर

और देहात का फकर्क क्या जाने! शहर में रहने का उसे कभी अवसर ही न पडा था। वह कई बार पित और सास से

साश्चयर्च पूछ चुकी थी, क्या यहां कोई नौकर नहीं है? जालपा के घर दूध-दिही-घी की कमी नहीं थी। यहां बच्चों

को भी दूध मयस्सर न था। इन सारे अभावों की पूित के िलए रमानाथ के पास मीठी-मीठी बडी- बडी बातों के

िसवा और क्या था। घर का िकराया पांच रूपया था, रमानाथ ने पंद्रह बतलाए थ। लड़कों की िशक्षा का खचर्च

मुिश्कल से दिस रूपये था, रमानाथ ने चालीस बतलाए थ। उस समय उसे इसकी ज़रा भी शंका न थी, िक एक

िदिन सारा भंडा फट जायगा। िमथ्या दूरदिशी नहीं होता, लेिकन वह िदिन इतनी जल्दिी आयगा, यह कौन जानता

था। अगर उसने ये डींगं न मारी होतीं, तो जागश्वरी की तरह वह भी सारा भार दियानाथ पर छोड़कर िनिश्चन्त

हो जाता, लेिकन इस वक्त वह अपने ही बनाए हुए जाल में फंस गया था। कैसे िनकले! उसने िकतने ही उपाय

सोचे, लेिकन कोई ऐसा न था, जो आग चलकर उसे उलझिनों में न डाल देता, दिलदिल में न फंसा देता। एकाएक

उसे एक चाल सूझिी। उसका िदिल उछल पडा, पर इस बात को वह मुंह तक न ला सका, ओह!

िकतनी नीचता है! िकतना कपट! िकतनी िनदिर्चयता! अपनी प्रेयसी के साथ ऐसी धूतर्चता! उसके मन ने उसे

िधक्काराब अगर इस वक्त उसे कोई एक हजार रूपया दे देता, तो वह उसका उमभर के िलए गुलाम हो जाता।

दियानाथ ने पूछा--कोई बात सूझिी?मुझिे तो कुछ नहीं सूझिता।

कोई उपाय सोचना ही पड़ेगा।आप ही सोिचए, मुझिे तो कुछ नहीं सूझिता।

क्यों नहीं उससे दिो-तीन गहने मांग लेते?तुम चाहो तो ले सकते हो,

हमारे िलए मुिश्कल है।

मुझिे शमर्च आती है।

तुम िविचत्र आदिमी हो, न खुदि मांगोग न मुझिे मांगने दिोग, तो आिखर यह नाव कैसे चलेगी? मैं एक बार

नहीं, हजार बार कह चुका िक मुझिसे कोई आशा मत रक्खो। मैं अपने आिखरी िदिन जेल में नहीं काट सकता इसमें

शमर्च की क्या बात है, मेरी समझि में नहीं आता। िकसके जीवन में ऐसे कुअवसर नहीं आते?तुम्हीं अपनी मां से

पूछो।

जागश्वरी ने अनुमोदिन िकया--मुझिसे तो नहीं देखा जाता था िक अपना आदिमी िचता में पडा रहे, मैं गहने

पहने बैठी रहूं। नहीं तो आज मेरे पास भी गहने न होते?एक-एक करके सब िनकल गए। िववाह में पांच हजार से

कम का चढ़ावा नहीं गया था, मगर पांच ही साल में सब स्वाहा हो गया। तब से एक छल्ला बनवाना भी नसीब

न हुआ।

दियानाथ ज़ोर देकर बोले--शमर्च करने का यह अवसर नहीं है। इन्हें मांगना पड़ेगा!

रमानाथ ने झिंपते हुए कहा--मैं मांग तो नहीं सकता, किहए उठा लाऊं।

यह कहते-कहते लज्जा, क्षोभ और अपनी नीचता के ज्ञान से उसकी आंखें सजल हो गई।

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दियानाथ ने भौंचक्ध होकर कहा--उठा लाओग, उससे िछपाकर?

रमानाथ ने तीव्र कंठ से कहा--और आप क्या समझि रहे ह?

दियानाथ ने माथ पर हाथ रख िलया, और एक क्षण के बादि आहत कंठ से बोले--नहीं, मैं ऐसा न करने

दूंगा। मैंने छल कभी नहीं िकया, और न कभी करूंगा। वह भी अपनी बहू के साथ! िछः-िछः, जो काम सीधे से

चल सकता है, उसके िलए यह फरेब- कहीं उसकी िनगाह पड़ गई, तो समझिते हो, वह तुम्हें िदिल में क्या

समझिेगी? मांग लेना इससे कहीं अच्छा है।

रमानाथ--आपको इससे क्या मतलब। मुझिसे चीज़ं ले लीिजएगा, मगर जब आप जानते थ, यह नौबत

आएगी, तो इतने जेवर ले जाने की जरूरत ही क्या थी ? व्यथर्च की िवपित्ति मोल ली। इससे कई लाख गुना अच्छा

था िक आसानी से िजतना ले जा सकते, उतना ही ले जाते। उस भोजन से क्या लाभ िक पेट में पीडा होने लग?मैं

तो समझि रहा था िक आपने कोई मागर्च िनकाल िलया होगा। मुझिे क्या मालूम था िक आप मेरे िसर यह मुसीबतों

की टोकरी पटक देंग। वरना मैं उन चीज़ों को कभी न ले जाने देता।

दियानाथ कुछ लिज्जत होकर बोले--इतने पर भी चन्द्रहार न होने से वहां हाय-तोबा मच गई।

रमानाथ--उस हाय-तोबा से हमारी क्या हािन हो सकती थी। जब इतना करने पर भी हाय-तोबा मच

गई, तो मतलब भी तो न पूरा हुआ। उधर बदिनामी हुई, इधर यह आफत िसर पर आई। मैं यह नहीं िदिखाना

चाहता िक हम इतने फटहाल ह। चोरी हो जाने पर तो सब्र करना ही पड़ेगा।

दियानाथ चुप हो गए। उस आवेश में रमा ने उन्हें खूब खरी-खरी सुनाई और वह चुपचाप सुनते रहे।

आिखर जब न सुना गया, तो उठकर पुस्तकालय चले गए। यह उनका िनत्य का िनयम था। जब तक दिो-चार पत्रपित्रकाएं न पढ़लें, उन्हें खाना न हजम होता था। उसी सुरिक्षत गढ़ी में पहुंचकर घर की िचताआं और बाधाआं से

उनकी जान बचती थी। रमा भी वहां से उठा, पर जालपा के पास न जाकर अपने कमरे में गया। उसका कोई

कमरा अलग तो था नहीं, एक ही मदिाना कमरा था, इसी में दियानाथ अपने दिोस्तों से गप-शप करते, दिोनों लङके

पढ़ते और रमा िमत्रों के साथ शतरंज खेलता। रमा कमरे में पहुंचा, तो दिोनों लङके ताश खेल रहे थ। गोपी का

तेरहवां साल था, िवश्वम्भर का नवां। दिोनों रमा से थरथर कांपते थ। रमा खुदि खूब ताश और शतरंज खेलता, पर

भाइयों को खेलते देखकर हाथ में खुजली होने लगती थी। खुदि चाहे िदिनभर सैर - सपाट िकया करे, मगर क्या

मजाल िक भाई कहीं घूमने िनकल जायं। दियानाथ खुदि लड़कों को कभी न मारते थ। अवसर िमलता, तो उनके

साथ खेलते थ। उन्हें कनकौवे उडाते देखकर उनकी बाल-प्रकृतित सजग हो जाती थी। दिो-चार पेंच लडादेते।

बच्चों के साथ कभी-कभी गुल्ली-डंडा भी खेलते थ। इसिलए लङके िजतना रमा से डरते, उतना ही िपता से प्रेम

करते थ।

रमा को देखते ही लड़कों ने ताश को टाट के नीचे िछपा िदिया और पढ़ने लग। िसर झिुकाए चपत की

प्रतीक्षा कर रहे थ, पर रमानाथ ने चपत नहीं लगाई, मोढ़े पर बैठकर गोपीनाथ से बोला--तुमने भंग की दुर्कान

देखी है न, नुक्कड़ पर?

गोपीनाथ प्रसन्न होकर बोला--हां, देखी क्यों नहीं। जाकर चार पैसे का माजून ले लो, दिौड़े हुए आना। हां,

हलवाई की दुर्कान से आधा सेर िमठाई भी लेते आना। यह रूपया लो।

कोई पंद्रह िमनट में रमा ये दिोनों चीज़ं ले, जालपा के कमरे की ओर चला। रात के दिस बज गए थ। जालपा

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खुली हुई छत पर लेटी हुई थी। जेठ की सुनहरी चांदिनी में सामने फैले हुए नगर के कलश, गुंबदि और वृतक्ष स्वप्न-

िचत्रों से लगते थ। जालपा की आंखें चंद्रमा की ओर लगी हुई थीं। उसे ऐसा मालूम हो रहा था, मैं चंद्रमा की ओर

उड़ी जा रही हूं। उसे अपनी नाक में खुश्की, आंखों में जलन और िसर में चक्कर मालूम हो रहा था। कोई बात

ध्यान में आते ही भूल जाती, और बहुत यादि करने पर भी यादि न आती थी। एक बार घर की यादि आ गई, रोने

लगी। एक ही क्षण में सहेिलयों की यादि आ गई, हंसने लगी। सहसा रमानाथ हाथ में एक पोटली िलये, मुस्कराता

हुआ आया और चारपाई पर बैठ गया।

जालपा ने उठकर पूछा--पोटली में क्या है?

रमानाथ--बूझि जाओ तो जानूं ।

जालपा--हंसी का गोलगप्पा है! (यह कहकर हंसने लगी।)

रमानाथ—मलतब?

जालपा--नींदि की गठरी होगी!

रमानाथ--मलतब?

जालपा--तो प्रेम की िपटारी होगी!

रमानाथ- ठीक, आज मैं तुम्हें फूलों की देवी बनाऊंगा।

जालपा िखल उठी। रमा ने बडे अनुराग से उसे फूलों के गहने पहनाने शुरू िकए, फूलों के शीतल कोमल

स्पशर्च से जालपा के कोमल शरीर में गुदिगुदिी-सी होने लगी। उन्हीं फूलों की भांित उसका एक-एक रोम प्रफुिल्लत

हो गया।

रमा ने मुस्कराकर कहा--कुछ उपहार?

जालपा ने कुछ उत्तिर न िदिया। इस वेश में पित की ओर ताकते हुए भी उसे संकोच हुआ। उसकी बडी इच्छा

हुई िक ज़रा आईने में अपनी छिव देखे। सामने कमरे में लैंप जल रहा था, वह उठकर कमरे में गई और आईने के

सामने खड़ी हो गई। नश की तरंग में उसे ऐसा मालूम हुआ िक मैं सचमुच फूलों की देवी हूं। उसने पानदिान उठा

िलया और बाहर आकर पान बनाने लगी। रमा को इस समय अपने कपट-व्यवहार पर बडी ग्लािन हो रही थी।

जालपा ने कमरे से लौटकर प्रेमोल्लिसत नजरों से उसकी ओर देखा, तो उसने मुंह उधर िलया। उस सरल िवश्वास

से भरी हुई आंखों के सामने वह ताक न सका। उसने सोचा--मैं िकतना बडा कायर हूं। क्या मैं बाबूजी को साफसाफ जवाब न दे सकता था?मैंने हामी ही क्यों भरी- क्या जालपा से घर की दिशा साफ-साफ कह देना मेरा

कतर्चव्य न था - उसकी आंखें भर आई। जाकर मुंडेर के पास खडा हो गया। प्रणय के उस िनमर्चल प्रकाश में उसका

मनोिवकार िकसी भंयकर जंतु की भांित घूरता हुआ जान पड़ता था। उसे अपने ऊपर इतनी घृतणा हुई िक एक

बार जी में आया, सारा कपट-व्यवहार खोल दूं, लेिकन संभल गया। िकतना भयंकर पिरणाम होगा। जालपा की

नज़रों से िफर जाने की कल्पना ही उसके िलए असह्य थी।

जालपा ने प्रेम-सरस नजरों से देखकर कहा - मेरे दिादिाजी तुम्हें देखकर गए और अम्मांजी से तुम्हारा

बखान करने लग, तो मैं सोचती थी िक तुम कैसे होग। मेरे मन में तरह-तरह के िचत्र आते थ। '

रमानाथ ने एक लंबी सांस खींची। कुछ जवाब न िदिया।

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जालपा ने िफर कहा - मेरी सिखयां तुम्हें देखकर मुग्ध हो गई। शहजादिी तो िखड़की के सामने से हटती ही

न थी। तुमसे बातें करने की उसकी बडी इच्छा थी। जब तुम अंदिर गए थ तो उसी ने तुम्हें पान के बीड़े िदिए थ,

यादि है?'

रमा ने कोई जवाब न िदिया ।

जालपा--अजी, वही जो रंग-रूप में सबसे अच्छी थी, िजसके गाल पर एक ितल था, तुमने उसकी ओर बडे

प्रेम से देखा था, बेचारी लाज के मारे गड़ गई थी। मुझिसे कहने लगी, जीजा तो बडे रिसक जान पड़ते ह। सिखयों

ने उसे खूब िचढ़ाया, बेचारी रूआंसी हो गई। यादि है? '

रमा ने मानो नदिी में डूबते हुए कहा--मुझिे तो यादि नहीं आता।'

जालपा--अच्छा, अबकी चलोग तो िदिखा दूंगी। आज तुम बाज़ार की तरफ गए थ िक नहीं?'

रमा ने िसर झिुकाकर कहा--आज तो फुरसत नहीं िमली।'

जालपा--जाओ, मैं तुमसे न बोलूंगी! रोज हीले-हवाले करते हो अच्छा, कल ला दिोग न?'

रमानाथ का कलेजा मसोस उठा। यह चन्द्रहार के िलए इतनी िवकल हो रही है। इसे क्या मालूम िक

दुर्भाग्य इसका सवर्चस्व लूटने का सामान कर रहा है। िजस सरल बािलका पर उसे अपने प्राणों को न्योछावर करना

चािहए था, उसी का सवर्चस्व अपहरण करने पर वह तुला हुआ है! वह इतना व्यग्र हुआ,िक जी में आया, कोठे से

कूदिकर प्राणों का अंत कर दे।

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सात

आधी रात बीत चुकी थी। चन्द्रमा चोर की भांित एक वृतक्ष की आड़ से झिांक रहा था। जालपा पित के गले

में हाथ डाले हुए िनद्रा में मग्न थी। रमा मन में िवकट संकल्प करके धीरे से उठा, पर िनद्रा की गोदि में सोए हुए

पुष्प प्रदिीप ने उसे अिस्थर कर िदिया। वह एक क्षण खडा मुग्ध नजरों से जालपा के िनद्रा-िवहिसत मुख की ओर

देखता रहा। कमरे में जाने का साहस न हुआ। िफर लेट गया।

जालपा ने चौंककर पूछा--कहां जाते हो, क्या सवेरा हो गया?

रमानाथ--अभी तो बडी रात है।

जालपा--तो तुम बैठे क्यों हो?

रमानाथ--कुछ नहीं, ज़रा पानी पीने उठा था।

जालपा ने प्रेमातुर होकर रमा के गले में बांहें डाल दिीं और उसे सुलाकर कहा--तुम इस तरह मुझि पर टोना

करोग, तो मैं भाग जाऊंगी। न जाने िकस तरह ताकते हो, क्या करते हो, क्या मंत्र पढ़ते हो िक मेरा मन चंचल

हो जाता है। बासन्ती सच कहती थी, पुरूषों की आंख में टोना होता है।

रमा ने फट हुए स्वर में कहा--टोना नहीं कर रहा हूं, आंखों की प्यास बुझिा रहा हूं।

दिोनों िफर सोए, एक उल्लास में डूबी हुई, दूसरा िचता में मग्न।

तीन घंट और गुजर गए। द्वादिशी के चांदि ने अपना िवश्व-दिीपक बुझिा िदिया। प्रभात की शीतल-समीर प्रकृतित

को मदि के प्याले िपलाती िफरती थी। आधी रात तक जागने वाला बाज़ार भी सो गया। केवल रमा अभी तक

जाग रहा था। मन में भांित-भांित के तकर्क-िवतकर्क उठने के कारण वह बार-बार उठता था और िफर लेट जाता था।

आिखर जब चार बजने की आवाज़ कान में आई, तो घबराकर उठ बैठा और कमरे में जा पहुंचा। गहनों का

संदूकचा आलमारी में रक्खा हुआ था, रमा ने उसे उठा िलया, और थरथर कांपता हुआ नीचे उतर गया। इस

घबराहट में उसे इतना अवकाश न िमला िक वह कुछ गहने छांटकर िनकाल लेता। दियानाथ नीचे बरामदे में सो

रहे थ। रमा ने उन्हें धीरे-से जगाया, उन्होंने हकबकाकर पूछा —कौन

रमा ने होंठ पर उंगली रखकर कहा--मैं हूं। यह संदूकची लाया हूं। रख लीिजए।

दियानाथ सावधन होकर बैठ गए। अभी तक केवल उनकी आंखें जागी थीं, अब चेतना भी जाग्रत हो गई।

रमा ने िजस वक्त उनसे गहने उठा लाने की बात कही थी, उन्होंने समझिा था िक यह आवेश में ऐसा कह रहा है।

उन्हें इसका िवश्वास न आया था िक रमा जो कुछ कह रहा है, उसे भी पूरा कर िदिखाएगा। इन कमीनी चालों से

वह अलग ही रहना चाहते थ। ऐसे कुित्सत कायर्च में पुत्र से साठ-गांठ करना उनकी अंतरात्मा को िकसी तरह

स्वीकार न था।

पूछा--इसे क्यों उठा लाए?

रमा ने धृष्टता से कहा--आप ही का तो हुक्म था।

दियानाथ--झिूठ कहते हो!

रमानाथ--तो क्या िफर रख आऊं?

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रमा के इस प्रश्न ने दियानाथ को घोर संकट में डाल िदिया। झिंपते हुए बोले--अब क्या रख आओग, कहीं

देख ले, तो गजब ही हो जाए। वही काम करोग, िजसमें जग-हंसाई हो खड़े क्या हो, संदूकची मेरे बडे संदूक में

रख आओ और जाकर लेट रहो कहीं जाग पड़े तो बस! बरामदे के पीछे दियानाथ का कमरा था। उसमें एक देवदिार

का पुराना संदूक रखा था। रमा ने संदूकची उसके अंदिर रख दिी और बडी फुती से ऊपर चला गया। छत पर

पहुंचकर उसने आहट ली, जालपा िपछले पहर की सुखदि िनद्रा में मग्न थी।

रमा ज्योंही चारपाई पर बैठा, जालपा चौंक पड़ी और उससे िचमट गई।

रमा ने पूछा--क्या है, तुम चौंक क्यों पड़ीं?

जालपा ने इधर-उधर प्रसन्न नजरों से ताककर कहा--कुछ नहीं, एक स्वप्न देख रही थी। तुम बैठे क्यों हो,

िकतनी रात है अभी?

रमा ने लेटते हुए कहा--सवेरा हो रहा है, क्या स्वप्न देखती थीं?

जालपा--जैसे कोई चोर मेरे गहनों की संदूकची उठाए िलये जाता हो।

रमा का ह्रदिय इतने जोर से धक-धक करने लगा, मानो उस पर हथौड़े पड़ रहे ह। खून सदिर्च हो गया। परंतु

संदेह हुआ, कहीं इसने मुझिे देख तो नहीं िलया। वह ज़ोर से िचल्ला पडा--चोर! चोर! नीचे बरामदे में दियानाथ

भी िचल्ला उठे--चोर! चोर! जालपा घबडाकर उठी। दिौड़ी हुई कमरे में गई, झिटके से आलमारी खोली। संदूकची

वहां न थी? मूिछत होकर िफर पड़ी।

सवेरा होते ही दियानाथ गहने लेकर सराफ के पास पहुंचे और िहसाब होने लगा। सराफ के पंद्रह सौ रू.

आते थ, मगर वह केवल पंद्रह सौ रू. के गहने लेकर संतुष्ट न हुआ। िबके हुए गहनों को वह बके पर ही ले सकता

था। िबकी हुई चीज़ कौन वापस लेता है। रोकड़ पर िदिए होते, तो दूसरी बात थी। इन चीज़ों का तो सौदिा हो

चुका था। उसने कुछ ऐसी व्यापािरक िसद्धिान्त की बातें कीं,दियानाथ को कुछ ऐसा िशकंजे में कसा िक बेचारे को

हां-हां करने के िसवा और कुछ न सूझिा। दिफ्तर का बाबू चतुर दुर्कानदिार से क्या पेश पाता - पंद्रह सौ रू. में

पच्चीस सौ रू. के गहने भी चले गए, ऊपर से पचास रू. और बाकी रह गए। इस बात पर िपता-पुत्र में कई िदिन

खूब वादि-िववादि हुआ। दिोनों एकदूसरे को दिोषी ठहराते रहे। कई िदिन आपस में बोलचाल बंदि रही, मगर इस

चोरी का हाल गुप्त रखा गया। पुिलस को खबर हो जाती, तो भंडा फट जाने का भय था। जालपा से यही कहा

गया िक माल तो िमलेगा नहीं, व्यथर्च का झिंझिट भले ही होगा। जालपा ने भी सोचा, जब माल ही न िमलेगा, तो

रपट व्यथर्च क्यों की जाय।

जालपा को गहनों से िजतना प्रेम था, उतना कदिािचत संसार की और िकसी वस्तु से न था, और उसमें

आश्चयर्च की कौन-सी बात थी। जब वह तीन वषर्च की अबोध बािलका थी, उस वक्त उसके िलए सोने के चूड़े

बनवाए गए थ। दिादिी जब उसे गोदि में िखलाने लगती, तो गहनों की ही चचा करती--तेरा दूल्हा तेरे िलए बडे

सुंदिर गहने लाएगा। ठुमक-ठुमककर चलेगी। जालपा पूछती--चांदिी के होंग िक सोने के, दिादिीजी?

दिादिी कहती--सोने के होंग बेटी, चांदिी के क्यों लाएगा- चांदिी के लाए तो तुम उठाकर उसके मुंह पर पटक

देना।

मानकी छेड़कर कहती--चांदिी के तो लाएगा ही। सोने के उसे कहां िमले जाते ह!

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जालपा रोने लगती, इस बूढ़ी दिादिी, मानकी, घर की महिरयां, पड़ोिसनें और दिीनदियाल--सब हंसते। उन

लोगों के िलए यह िवनोदि का अशष भंडार था। बािलका जब ज़रा और बडी हुई, तो गुिडयों के ब्याह करने लगी।

लडके की ओर से चढ़ावे जाते, दुर्लिहन को गहने पहनाती, डोली में बैठाकर िवदिा करती, कभी-कभी दुर्लिहन

गुिडया अपने गुये दूल्हे से गहनों के िलए मान करती, गुड्डा बेचारा कहीं-न-कहीं से गहने लाकर स्त्री को प्रसन्न

करता था। उन्हीं िदिनों िबसाती ने उसे वह चन्द्रहार िदिया, जो अब तक उसके पास सुरिक्षत था। ज़रा और बडी

हुई तो बडी-बूिढ.यों में बैठकर गहनों की बातें सुनने लगी। मिहलाआं के उस छोट-से संसार में इसके िसवा और

कोई चचा ही न थी। िकसने कौन-कौन गहने बनवाए, िकतने दिाम लग, ठोस ह या पोले, जडाऊ ह या सादे, िकस

लडकी के िववाह में िकतने गहने आए? इन्हीं महत्वपूणर्च िवषयों पर िनत्य आलोचना-प्रत्यालोचना, टीका-िटप्पणी

होती रहती थी। कोई दूसरा िवषय इतना रोचक, इतना ग्राह्य हो ही नहीं सकता था। इस आभूषण-मंिडत संसार

में पली हुई जालपा का यह आभूषण-प्रेम स्वाभािवक ही था।

महीने-भर से ऊपर हो गया। उसकी दिशा ज्यों-की-त्यों है। न कुछ खाती-पीती है, न िकसी से हंसती-

बोलती है। खाट पर पड़ी हुई शून्य नजरों से शून्याकाश की ओर ताकती रहती है। सारा घर समझिाकर हार गया,

पड़ोिसनें समझिाकर हार गई, दिीनदियाल आकर समझिा गए, पर जालपा ने रोग- शय्या न छोड़ी। उसे अब घर में

िकसी पर िवश्वास नहीं है, यहां तक िक रमा से भी उदिासीन रहती है। वह समझिती है, सारा घर मेरी उपेक्षा कर

रहा है। सबके- सब मेरे प्राण के ग्राहक हो रहे ह। जब इनके पास इतना धन है, तो िफर मेरे गहने क्यों नहीं

बनवाते? िजससे हम सबसे अिधक स्नेह रखते ह, उसी पर सबसे अिधक रोष भी करते ह। जालपा को सबसे

अिधक कोध रमानाथ पर था। अगर यह अपने माता-िपता से जोर देकर कहते, तो कोई इनकी बात न टाल

सकता, पर यह कुछ कहें भी- इनके मुंह में तो दिही जमा हुआ है। मुझिसे प्रेम होता, तो यों िनिश्चत न बैठे रहते।

जब तक सारी चीज़ं न बनवा लेते, रात को नींदि न आती। मुंह देखे की मुहब्बत है, मां-बाप से कैसे कहें, जाएंग

तोअपनी ही ओर, मैं कौन हूं! वह रमा से केवल िखची ही न रहती थी, वह कभी कुछ पूछता तो दिोचार जली-

कटी सुना देती। बेचारा अपना-सा मुंह लेकर रह जाता! गरीब अपनी ही लगाई हुई आग में जला जाता था। अगर

वह जानता िक उन डींगों का यह फल होगा, तो वह जबान पर मुहर लगा लेता। िचता और ग्लािन उसके ह्रदिय

को कुचले डालती थी। कहां सुबह से शाम तक हंसी-कहकहे, सैर - सपाट में कटते थ, कहां अब नौकरी की तलाश

में ठोकर खाता िफरता था। सारी मस्ती गायब हो गई। बार-बार अपने िपता पर कोध आता, यह चाहते तो दिो-

चार महीने में सब रूपये अदिा हो जाते, मगर इन्हें क्या िफक! मैं चाहे मर जाऊं पर यह अपनी टक न छोड़ंग।

उसके प्रेम से भरे हुए, िनष्कपट ह्रदिय में आग-सी सुलगती रहती थी। जालपा का मुरझिाया हुआ मुख देखकर

उसके मुंह से ठंडी सांस िनकल जाती थी। वह सुखदि प्रेम-स्वप्न इतनी जल्दि भंग हो गया, क्या वे िदिन िफर कभी

आएंग- तीन हज़ार के गहने कैसे बनेंग- अगर नौकर भी हुआ, तो ऐसा कौन-सा बडा ओहदिा िमल जाएगा- तीन

हज़ार तो शायदि तीन जन्म में भी न जमा हों। वह कोई ऐसा उपाय सोच िनकालना चाहता था, िजसमें वह

जल्दि-से- जल्दि अतुल संपित्ति का स्वामी हो जाय। कहीं उसके नाम कोई लाटरी िनकल आती! िफर तो वह जालपा

को आभूषणों से मढ़ देता। सबसे पहले चन्द्रहार बनवाता। उसमें हीरे जड़े होते। अगर इस वक्त उसे जाली नोट

बनाना आ जाता तो अवश्य बनाकर चला देता।एक िदिन वह शाम तक नौकरी की तलाश में मारा -मारा िफरता

रहा।

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आठ

शतरंज की बदिौलत उसका िकतने ही अच्छे-अच्छे आदििमयों से पिरचय था, लेिकन वह संकोच और डर के

कारण िकसी से अपनी िस्थित प्रकट न कर सकता था। यह भी जानता था िक यह मान-सम्मान उसी वक्त तक है,

जब तक िकसी के समाने मदिदि के िलए हाथ नहीं फैलाता। यह आन टूटी, िफर कोईबात भी न पूछेगा। कोई ऐसा

भलामानुस न दिीखता था, जो कुछ िबना कहे ही जान जाए, और उसे कोई अच्छी-सी जगह िदिला दे। आज उसका

िचत्ति बहुत िखकै था। िमत्रों पर ऐसा कोध आ रहा था िक एक-एक को फटकारे और आएं तो द्वार से दुर्त्कार दे।

अब िकसी ने शतरंज खेलने को बुलाया, तो ऐसी फटकार सुनाऊंगा िक बचा यादि कर, मगर वह ज़रा ग़ौर करता

तो उसे मालूम हो जाता िक इस िवषय में िमत्रों का उतना दिोष न था, िजतना खुदि उसका। कोई ऐसा िमत्र न था,

िजससे उसने बढ़-बढ़कर बातें न की हों। यह उसकी आदित थी। घर की असली दिशा को वह सदिैव बदिनामी की

तरह िछपाता रहा। और यह उसी का फल था िक इतने िमत्रों के होते हुए भी वह बेकार था। वह िकसी से अपनी

मनोव्यथा न कह सकता था और मनोव्यथा सांस की भांित अंदिर घुटकर असह्य हो जाती है। घर में आकर मुंह

लटकाए हुए बैठ गया।

जागश्वरी ने पानी लाकर रख िदिया और पूछा--आज तुम िदिनभर कहां रहे?लो हाथ- मुंह धो डालो। रमा ने

लोटा उठाया ही था िक जालपा ने आकर उग्र भाव से कहा--मुझिे मेरे घर पहुंचा दिो, इसी वक्त!

रमा ने लोटा रख िदिया और उसकी ओर इस तरह ताकने लगा, मानो उसकी बात समझि में न आई हो।

जागश्वरी बोली--भला इस तरह कहीं बहू-बेिटयां िवदिा होती ह, कैसी बात कहती हो, बहू?

जालपा--मैं उन बहू-बेिटयों में नहीं हूं। मेरा िजस वक्त जी चाहेगा, जाऊंगी, िजस वक्त जी चाहेगा,

आऊंगी। मुझिे िकसी का डर नहीं है। जब यहां कोई मेरी बात नहीं पूछता, तो मैं भी िकसी को अपना नहीं

समझिती। सारे िदिन अनाथों की तरह पड़ी रहती हूं। कोई झिांकता तक नहीं। मैं िचिडया नहीं हूं, िजसका

िपजडादिाना-पानी रखकर बंदि कर िदिया जाय। मैं भी आदिमी हूं। अब इस घर में मैं क्षण-भर न रूकूंगी। अगर कोई

मुझिे भेजने न जायगा, तो अकेली चली जाउंगी। राह में कोई भेिडया नहीं बैठा है, जो मुझिे उठा ले जाएगा और

उठा भी ले जाए, तो क्या ग़म। यहां कौन-सा सुख भोग रही हूं।

रमा ने सावधन होकर कहा--आिख़र कुछ मालूम भी तो हो, क्या बात हुई?

जालपा--बात कुछ नहीं हुई, अपना जी है। यहां नहीं रहना चाहती।

रमानाथ--भला इस तरह जाओगी तो तुम्हारे घरवाले क्या कहेंग, कुछ यह भी तो सोचो!

जालपा--यह सब कुछ सोच चुकी हूं, और ज्यादिा नहीं सोचना चाहती। मैं जाकर अपने कपड़े बांधाती हूं

और इसी गाड़ी से जाऊंगी।

यह कहकर जालपा ऊपर चली गई। रमा भी पीछे-पीछे यह सोचता हुआ चला, इसे कैसे शांत करूं।

जालपा अपने कमरे में जाकर िबस्तर लपेटने लगी िक रमा ने उसका हाथ पकड़ िलया और बोला--तुम्हें मेरी

कसम जो इस वक्त जाने का नाम लो!

जालपा ने त्योरी चढ़ाकर कहा--तुम्हारी कसम की हमें कुछ परवा नहीं है।

उसने अपना हाथ छुडािलया और िफर िबछावन लपेटने लगी। रमा िखिसयाना-सा होकर एक िकनारे

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खडाहो गया। जालपा ने िबस्तरबंदि से िबस्तरे को बांधा और िफर अपने संदूक को साफ करने लगी। मगर अब

उसमें वह पहले-सी तत्परता न थी, बार-बार संदूक बंदि करती और खोलती।

वषा बंदि हो चुकी थी, केवल छत पर रूका हुआ पानी टपक रहा था। आिख़र वह उसी िबस्तर के बंडल पर

बैठ गई और बोली--तुमने मुझिे कसम क्यों िदिलाई? रमा के ह्रदिय में आशा की गुदिगुदिी हुई। बोला--इसके िसवा

मेरे पास तुम्हें रोकने का और क्या उपाय था?

जालपा--क्या तुम चाहते हो िक मैं यहीं घुट-घुटकर मर जाऊं?

रमानाथ--तुम ऐसे मनहूस शब्दि क्यों मुंह से िनकालती हो? मैं तो चलने को तैयार हूं, न मानोगी तो

पहुंचाना ही पड़ेगा। जाओ, मेरा ईश्वर मािलक है, मगर कम-से-कम बाबूजी और अम्मां से पूछ लो।

बुझिती हुई आग में तेल पड़ गया। जालपा तड़पकर बोली--वह मेरे कौन होते ह,जो उनसे पूछूँ?

रमानाथ--कोई नहीं होते?

जालपा--कोई नहीं! अगर कोई होते, तो मुझिे यों न छोड़ देते। रूपये रखते हुए कोई अपने िप्रयजनों का कष्ट

नहीं देख सकता ये लोग क्या मेरे आंसू न पोंछ सकते थ? मैं िदिन-के िदिन यहां पड़ी रहती हूं, कोई झिूठों भी पूछता

है? मुहल्ले की िस्त्रयां िमलने आती ह, कैसे िमलूं ? यह सूरत तो मुझिसे नहीं िदिखाई जाती। न कहीं आना न जाना,

न िकसी से बात न चीत, ऐसे कोई िकतने िदिन रह सकता है? मुझिे इन लोगों से अब कोई आशा नहीं रही। आिखर

दिो लङके और भी तो ह, उनके िलए भी कुछ जोड़ंग िक तुम्हीं को दे दें!

रमा को बडी-बडी बातें करने का िफर अवसर िमला। वह खुश था िक इतने िदिनों के बादि आज उसे प्रसन्न

करने का मौका तो िमलाब बोला--िप्रये, तुम्हारा ख्याल बहुत ठीक है। जरूर यही बात है। नहीं तो ढाई-तीन

हज़ार उनके िलए क्या बडी बात थी? पचासों हजार बैंक में जमा ह, दिफ्तर तो केवल िदिल बहलाने जाते ह।

जालपा--मगर ह मक्खीचूस पल्ले िसरे के!

रमानाथ--मक्खीचूस न होते, तो इतनी संपित्ति कहां से आती!

जालपा--मुझिे तो िकसी की परवा नहीं है जी, हमारे घर िकस बात की कमी है! दिाल-रोटी वहां भी िमल

जायगी। दिो-चार सखी-सहेिलयां ह, खेत- खिलहान ह, बाग-बगीचे ह, जी बहलता रहेगा।

रमानाथ--और मेरी क्या दिशा होगी, जानती हो? घुल-घुलकर मर जाऊंगा। जब से चोरी हुई, मेरे िदिल पर

जैसी गुजरती है, वह िदिल ही जानता है। अम्मां और बाबूजी से एक बार नहीं, लाखों बार कहा, ज़ोर देकर कहा

िक दिो-चार चीज़ं तो बनवा ही दिीिजए, पर िकसी के कान पर जूं तक न रगी। न जाने क्यों मुझिसे आंखें उधर कर

लीं।

जालपा--जब तुम्हारी नौकरी कहीं लग जाय, तो मुझिे बुला लेना।

रमानाथ--तलाश कर रहा हूं। बहुत जल्दि िमलने वाली है। हज़ारों बड़े-बडे आदििमयों से मुलाकात है,

नौकरी िमलते क्या देर लगती है, हां, ज़रा अच्छी जगह चाहता हूं।

जालपा--मैं इन लोगों का रूख समझिती हूं। मैं भी यहां अब दिावे के साथ रहूंगी। क्यों, िकसी से नौकरी के

िलए कहते नहीं हो?

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रमानाथ--शमर्च आती है िकसी से कहते हुए।

जालपा--इसमें शमर्च की कौन-सी बात है - कहते शमर्च आती हो, तो खत िलख दिो।

रमा उछल पडा, िकतना सरल उपाय था और अभी तक यह सीधी-सी बात उसे न सूझिी थी। बोला--हां,

यह तुमने बहुत अच्छी तरकीब बतलाई, कल जरूर िलखूंगा।

जालपा--मुझिे पहुंचाकर आना तो िलखना। कल ही थोड़े लौट आओग।

रमानाथ--तो क्या तुम सचमुच जाओगी? तब मुझिे नौकरी िमल चुकी और मैं खत िलख चुका! इस िवयोग

के दुर्ःख में बैठकर रोऊंगा िक नौकरी ढूंढूगा। नहीं, इस वक्त जाने का िवचार छोड़ो। नहीं, सच कहता हूं, मैं कहीं

भाग जाऊंगा। मकान का हाल देख चुका। तुम्हारे िसवा और कौन बैठा हुआ है, िजसके िलए यहां पडा-सडा करूं।

हटो तो ज़रा मैं िबस्तर खोल दूं।

जालपा ने िबस्तर पर से ज़रा िखसककर कहा--मैं बहुत जल्दि चली आऊंगी। तुम गए और मैं आई।

रमा ने िबस्तर खोलते हुए कहा--जी नहीं, माफ कीिजए, इस धोखे में नहीं आता। तुम्हें क्या, तुम तो

सहेिलयों के साथ िवहार करोगी, मेरी खबर तक न लोगी, और यहां मेरी जान पर बन आवेगी। इस घर में िफर

कैसे कदिम रक्खा जायगा।

जालपा ने एहसान जताते हुए कहा--आपने मेरा बंधा-बंधाया िबस्तर खोल िदिया, नहीं तो आज िकतने

आनंदि से घर पहुंच जाती। शहजादिी सच कहती थी, मदिर्च बडे टोनहे होते ह। मैंने आज पक्का इरादिा कर िलया था

िक चाहे ब्रह्मा भी उतर आएं, पर मैं न मानूंगी। पर तुमने दिो ही िमनट में मेरे सारे मनसूबे चौपट कर िदिए। कल

खत िलखना जरूर। िबना कुछ पैदिा िकए अब िनवाह नहीं है।

रमानाथ--कल नहीं, मैं इसी वक्त जाकर दिो-तीन िचिट्ठयां िलखता हूं।

जालपा--पान तो खाते जाओ।

रमानाथ ने पान खाया और मदिाने कमरे में आकर खत िलखने बैठे। मगर िफर कुछ सोचकर उठ खड़े हुए

और एक तरफ को चल िदिए। स्त्री का सप्रेम आग्रह पुरूष से क्या नहीं करा सकता।

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नौ

रमा के पिरिचतों में एक रमेश बाबू म्यूिनिसपल बोडर्च में हेड क्लकर्क थ। उम तो चालीस के ऊपर थी, पर थ

बडे रिसक। शतरंज खेलने बैठ जाते, तो सवेरा कर देते। दिफ्तर भी भूल जाते। न आग नाथ न पीछे पगहा। जवानी

में स्त्री मर गई थी, दूसरा िववाह नहीं िकया। उस एकांत जीवन में िसवा िवनोदि के और क्या अवलंब था। चाहते

तो हज़ारों के वारे-न्यारे करते, पर िरश्वत की कौड़ी भी हराम समझिते थ। रमा से बडा स्नेह रखते थ। और कौन

ऐसा िनठल्ला था, जो रात-रात भर उनसे शतरंज खेलता। आज कई िदिन से बेचारे बहुत व्याकुल हो रहे थ।

शतरंज की एक बाजी भी न हुई। अखबार कहां तक पढ़ते। रमा इधर दिो-एक बार आया अवश्य, पर िबसात पर

न बैठा रमेश बाबू ने मुहरे िबछा िदिए। उसको पकड़कर बैठाया, पर वह बैठा नहीं। वह क्यों शतरंज खेलने लगा।

बहू आई है, उसका मुंह देखेगा, उससे प्रेमालाप करेगा िक इस बूढ़े के साथ शतरंज खेलेगा! कई बार जी में आया,

उसे बुलवाएं, पर यह सोचकर िक वह क्यों आने लगा, रह गए। कहां जायं- िसनेमा ही देख आव- िकसी तरह

समय तो कट। िसनेमा से उन्हें बहुत प्रेम न था, पर इस वक्त उन्हें िसनेमा के िसवा और कुछ न सूझिा। कपड़े पहने

और जाना ही चाहते थ िक रमा ने कमरे में कदिम रखा। रमेश उसे देखते ही गंदि की तरह लुढ़ककर द्वार पर जा

पहुंचे और उसका हाथ पकड़कर बोले--आइए, आइए, बाबू रमानाथ साहब बहादुर्र! तुम तो इस बुड्ढे को िबलकुल

भूल ही गए। हां भाई, अब क्यों आओग? प्रेिमका की रसीली बातों का आनंदि यहां कहां? चोरी का कुछ पता

चला?

रमानाथ--कुछ भी नहीं।

रमेश--बहुत अच्छा हुआ, थाने में रपट नहीं िलखाई, नहीं सौ-दिो सौ के मत्थ और जाते। बहू को तो बडा

दुर्ःख हुआ होगा?

रमानाथ--कुछ पूिछए मत, तभी से दिाना-पानी छोड़ रक्खा है? मैं तो तंग आ गया। जी में आता है, कहीं

भाग जाऊं। बाबूजी सुनते नहीं।

रमेश--बाबूजी के पास क्या काई का खजाना रक्खा हुआ है? अभी चारपांच हज़ार खचर्च िकए ह, िफर कहां

से लाकर गहने बनवा दें? दिस-बीस हज़ार रूपये होंग, तो अभी तो बच्चे भी तो सामने ह और नौकरी का भरोसा

ही क्या पचास रू. होता ही क्या है?

रमानाथ--मैं तो मुसीबत में फंस गया। अब मालूम होता है, कहीं नौकरी करनी पड़ेगी। चैन से खाते और

मौज उडाते थ, नहीं तो बैठे-बैठाए इस मायाजाल में फंसे। अब बतलाइए, है कहीं नौकरी-चाकरी का सहारा?

रमेश ने ताक पर से मुहरे और िबसात उतारते हुए कहा--आओ एक बाजी हो जाए, िफर इस मामले को

सोच, इसे िजतना आसान समझि रहे हो, उतना आसान नहीं है। अच्छे-अच्छे धक्के खा रहे ह।

रमानाथ--मेरा तो इस वक्त खेलने को जी नहीं चाहता। जब तक यह प्रश्न हल न हो जाय, मेरे होश

िठकाने नहीं होंग।

रमेश बाबू ने शतरंज के मुहरे िबछाते हुए कहा--आओ बैठो। एक बार तो खेल लो, िफर सोच, क्या हो

सकता है।

रमानाथ--ज़रा भी जी नहीं चाहता, मैं जानता िक िसर मुडाते ही ओले पड़ंग, तो मैं िववाह के नज़दिीक ही

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न जाता!

रमेश--अजी, दिो-चार चालें चलो तो आप-ही-आप जी लग जायगा। ज़रा अक्ल की गांठ तो खुले।

बाज़ी शुरू हुई। कई मामूली चालों के बादि रमेश बाबू ने रमा का रूख पीट िलया।

रमानाथ--ओह, क्या गलती हुई!

रमेश बाबू की आंखों में नश की-सी लाली छाने लगी। शतरंज उनके िलए शराब से कम मादिक न था।

बोले--बोहनी तो अच्छी हुई! तुम्हारे िलए मैं एक जगह सोच रहा हूं। मगर वेतन बहुत कम है, केवल तीस रूपये।

वह रंगी दिाढ़ी वाले खां साहब नहीं ह, उनसे काम नहीं होता। कई बार बचा चुका हूं। सोचता था, जब तक िकसी

तरह काम चले, बने रहें। बाल-बच्चे वाले आदिमी

ह। वह तो कई बार कह चुके ह, मुझिे छुट्टी दिीिजए।तुम्हारे लायक तो वह जगह नहीं है, चाहो तो कर लो।

यह कहते-कहते रमा का फीला मार िलया। रमा ने फीले को िफर उठाने की चेष्टा करके कहा--आप मुझिे बातों में

लगाकर मेरे मुहरे उडाते जाते ह, इसकी सनदि नहीं, लाओ मेरा फीला।

रमेश--देखो भाई, बेईमानी मत करो। मैंने तुम्हारा फीला जबरदिस्ती तो नहीं उठाया। हां, तो तुम्हें वह

जगह मंजूर है?

रमानाथ--वेतन तो तीस है।

रमेश--हां, वेतन तो कम है, मगर शायदि आग चलकर बढ़जाय। मेरी तो राय है, कर लो।

रमानाथ--अच्छी बात है, आपकी सलाह है तो कर लूंगा।

रमेश--जगह आमदिनी की है। िमयां ने तो उसी जगह पर रहते हुए लड़कों को एम.ए., एल.एल. बी. करा

िलया। दिो कॉलेज में पढ़ते ह। लड़िकयों की शािदियां अच्छे घरों में कीं। हां, ज़रा समझि-बूझिकर काम करने की

जरूरत है।

रमानाथ--आमदिनी की मुझिे परवा नहीं, िरश्वत कोई अच्छी चीज़ तो है नहीं।ट

रमेश--बहुत खराब, मगर बाल-बच्चों वाले आदिमी क्या कर। तीस रूपयों में गुज़र नहीं हो सकती। मैं

अकेला आदिमी हूं। मेरे िलए डेढ़सौ काफी ह। कुछ बचा भी लेता हूं, लेिकन िजस घर में बहुत से आदिमी हों,

लड़कों की पढ़ाई हो, लड़िकयों की शािदियां हों, वह आदिमी क्या कर सकता है। जब तक छोट-छोट आदििमयों का

वेतन इतना न हो जाएगा िक वह भलमनसी के साथ िनवाह कर सकें, तब तक िरश्वत बंदि न होगी। यही रोटी-

दिाल, घी-दूध तो वह भी खाते ह। िफर एक को तीस रूपये और दूसरे को तीन सौ रूपये क्यों देते हो? रमा का

फजी िपट गया, रमेश बाबू ने बडे ज़ोर से कहकहा माराब

रमा ने रोष के साथ कहा--अगर आप चुपचाप खेलते ह तो खेिलए, नहीं मैं जाता हूं। मुझिे बातों में लगाकर

सारे मुहरे उडा िलए!

रमेश--अच्छा साहब, अब बोलूं तो ज़बान पकड़ लीिजए। यह लीिजए, शह! तो तुम कल अजी दे दिो।

उम्मीदि तो है, तुम्हें यह जगह िमल जाएगी, मगर िजस िदिन जगह िमले, मेरे साथ रात-भर खेलना होगा।

रमानाथ--आप तो दिो ही मातों में रोने लगते ह।

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रमेश--अजी वह िदिन गए, जब आप मुझिे मात िदिया करते थ। आजकल चन्द्रमा बलवान ह। इधर मैंने एक

मां िस' िकया है। क्या मजाल िक कोई मात दे सके। िफर शह!

रमानाथ--जी तो चाहता है, दूसरी बाज़ी मात देकर जाऊं, मगर देर होगी।

रमेश--देर क्या होगी। अभी तो नौ बजे ह। खेल लो, िदिल का अरमान िनकल जाय। यह शह और मात!

रमानाथ--अच्छा कल की रही। कल ललकार कर पांच मातें न दिी हों तो किहएगा।

रमेश--अजी जाओ भी, तुम मुझिे क्या मात दिोग! िहम्मत हो, तो अभी सही!

रमानाथ--अच्छा आइए, आप भी क्या कहेंग, मगर मैं पांच बािज़यों से कम न खेलूंगा!

रमेश--पांच नहीं, तुम दिस खेलो जी। रात तो अपनी है। तो चलो िफर खाना खा लें। तब िनिश्चन्त होकर

बैठं। तुम्हारे घर कहलाए देता हूं िक आज यहीं सोएंग, इंतज़ार न कर।

दिोनों ने भोजन िकया और िफर शतरंज पर बैठेब पहली बाज़ी में ग्यारह बज गए। रमेश बाबू की जीत

रही। दूसरी बाजी भी उन्हीं के हाथ रही। तीसरी बाज़ी खत्म हुई तो दिो बज गए।

रमानाथ--अब तो मुझिे नींदि आ रही है।

रमेश--तो मुंह धो डालो, बरग रक्खी हुई है। मैं पांच बािज़यां खेले बगैर सोने न दूंगा।

रमेश बाबू को यह िवश्वास हो रहा था िक आज मेरा िसतारा बुलंदि है। नहीं तो रमा को लगातार तीन

मात देना आसान न था। वह समझि गए थ, इस वक्त चाहे िजतनी बािज़यां खेलूं, जीत मेरी ही होगी मगर जब

चौथी बाज़ी हार गए, तो यह िवश्वास जाता रहा। उलट यह भय हुआ िक कहीं लगातार हारता न जाऊं। बोले--

अब तो सोना चािहए।

रमानाथ--क्यों, पांच बािजयां पूरी न कर लीिजए?

रमेश--कल दिफ्तर भी तो जाना है।

रमा ने अिधक आग्रह न िकया। दिोनों सोए।

रमा यों ही आठ बजे से पहले न उठता था, िफर आज तो तीन बजे सोया था। आज तो उसे दिस बजे तक

सोने का अिधकार था। रमेश िनयमानुसार पांच बजे उठ बैठे, स्नान िकया, संध्या की, घूमने गए और आठ बजे

लौट, मगर रमा तब तक सोता ही रहा। आिखर जब साढ़े नौ बज गए तो उन्होंने उसे जगाया।

रमा ने िबभड़कर कहा--नाहक जगा िदिया, कैसी मजे क़ी नींदि आ रही थी।

रमेश--अजी वह अजी देना है िक नहीं तुमको?

रमानाथ--आप दे दिीिजएगा।

रमेश--और जो कहीं साहब ने बुलाया, तो मैं ही चला जाऊंगा?

रमानाथ--ऊंह, जो चाहे कीिजएगा, मैं तो सोता हूं।

रमा िफर लेट गया और रमेश ने भोजन िकया, कपड़े पहने और दिफ्तर चलने को तैयार हुए। उसी वक्त

रमानाथ हड़बडाकर उठा और आंखें मलता हुआ बोला--मैं भी चलूंगा।

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रमेश--अरे मुंह-हाथ तो धो ले, भले आदिमी!

रमानाथ--आप तो चले जा रहे ह।

रमेश--नहीं, अभी पंद्रह-बीस िमनट तक रूक सकता हूं, तैयार हो जाओ।

रमानाथ--मैं तैयार हूं। वहां से लौटकर घर भोजन करूंगा।

रमेश--कहता तो हूं, अभी आधा घंट तक रूका हुआ हूं।

रमा ने एक िमनट में मुंह धोया, पांच िमनट में भोजन िकया और चटपट रमेश के साथ दिफ्तर चला।

रास्ते में रमेश ने मुस्कराकर कहा--घर क्या बहाना करोग, कुछ सोच रक्खा है?

रमानाथ--कह दूंगा, रमेश बाबू ने आने नहीं िदिया।

रमेश--मुझिे गािलयां िदिलाओग और क्या िफर कभी न आने पाओग।

रमानाथ--ऐसा स्त्री-भक्त नहीं हूं। हां, यह तो बताइए, मुझिे अज़ी लेकर तो साहब के पास न जाना पड़ेगा?

रमेश--और क्या तुम समझिते हो, घर बैठे जगह िमल जायगी? महीनों दिौड़ना पड़ेगा, महीनों! बीिसयों

िसफािरशं लानी पडंगी। सुबह-शाम हािज़री देनी पड़ेगी। क्या नौकरी िमलना आसान है?

रमानाथ--तो मैं ऐसी नौकरी से बाज़ आया। मुझिे तो अज़ी लेकर जाते ही शमर्च आती है।खुशामदें कौन

करेगा- पहले मुझिे क्लकों पर बडी हंसी आती थी, मगर वही बला मेरे िसर पड़ी। साहब डांट-वांट तो न बताएंग?

रमेश--बुरी तरह डांटता है, लोग उसके सामने जाते हुए कांपते ह।

रमानाथ--तो िफर मैं घर जाता हूं। यह सब मुझिसे न बरदिाश्त होगा।

रमेश--पहले सब ऐसे ही घबराते ह, मगर सहते-सहते आदित पड़ जाती है। तुम्हारा िदिल धड़क रहा होगा

िक न जाने कैसी बीतेगी। जब मैं नौकर हुआ, तो तुम्हारी ही उम मेरी भी थी, और शादिी हुए तीन ही महीने हुए

थ। िजस िदिन मेरी पेशी होने वाली थी, ऐसा घबराया हुआ था मानो फांसी पाने जा रहा हूं;मगर तुम्हें डरने का

कोई कारण नहीं है। मैं सब ठीक कर दूंगा।

रमानाथ--आपको तो बीस-बाईस साल नौकरी करते हो गए होंग!

रमेश--पूरे पच्चीस हो गए, साहब! बीस बरस तो स्त्री का देहांत हुए हो गए। दिस रूपये पर नौकर हुआ

था!

रमानाथ--आपने दूसरी शादिी क्यों नहीं की- तब तो आपकी उम पच्चीस से ज्यादिा न रही होगी।

रमेश ने हंसकर कहा--बरफी खाने के बादि गुड़ खाने को िकसका जी चाहता है? महल का सुख भोगने के

बादि झिोंपडा िकसे अच्छा लगता है? प्रेम आत्मा को तृतप्त कर देता है। तुम तो मुझिे जानते हो, अब तो बूढ़ा हो गया

हूं, लेिकन मैं तुमसे सच कहता हूं, इस िवधुर-जीवन में मैंने िकसी स्त्री की ओर आंख तक नहीं उठाई। िकतनी ही

सुंदििरयां देखीं, कई बार लोगों ने िववाह के िलए घेरा भी, लेिकन कभी इच्छा ही न हुई। उस प्रेम की मधुर

स्मृतितयों में मेरे िलए प्रेम का सजीव आनंदि भरा हुआ है। यों बातें करते हुए, दिोनों आदिमी दिफ्तर पहुंच गए।

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दिस

रमा दिफ्तर से घर पहुंचा, तो चार बज रहे थ। वह दिफ्तर ही में था िक आसमान पर बादिल िघर आए।

पानी आया ही चाहता था, पर रमा को घर पहुंचने की इतनी बेचैनी हो रही थी िक उससे रूका न गया। हाते के

बाहर भी न िनकलने पाया था िक जोर की वषा होने लगी। आषाढ़ का पहला पानी था, एक ही क्षण में वह

लथपथ हो गया। िफर भी वह कहीं रूका नहीं। नौकरी िमल जाने का शुभ समाचार सुनाने का आनंदि इस दिौंगड़े

की क्या परवाह कर सकता था? वेतन

तो केवल तीस ही रूपये थ, पर जगह आमदिनी की थी। उसने मन-ही-मन िहसाब लगा िलया था िक

िकतना मािसक बचत हो जाने से वह जालपा के िलए चन्द्रहार बनवा सकेगा। अगर पचास-साठ रूपये महीने

भी बच जायं, तो पांच साल में जालपा गहनों से लदि जाएगी। कौन-सा आभूषण िकतने का होगा, इसका भी

उसने अनुमान कर िलया था। घर पहुंचकर उसने कपड़े भी न उतारे, लथपथ जालपा के कमरे में पहुंच गया।

जालपा उसे देखते ही बोली--यह भीग कहां गए, रात कहां गायब थ?

रमानाथ--इसी नौकरी की िफक में पडा हुआ हूं। इस वक्त दिफ्तर से चला आता हूं। म्युिनिसपैिलटी के

दिफ्तरमें मुझिे एक जगह िमल गई।

जालपा ने उछलकर पूछा--सच! िकतने की जगह है?

रमा को ठीक-ठीक बतलाने में संकोच हुआ। तीस की नौकरी बताना अपमान की बात थी। स्त्री के नजरों में

तुच्छ बनना कौन चाहता है। बोला--अभी तो चालीस िमलेंग, पर जल्दि तरक्की होगी। जगह आमदिनी की है।

जालपा ने उसके िलए िकसी बडे पदि की कल्पना कर रक्खी थी। बोली--चालीस में क्या होगा? भला साठसभार तो होते!

रमानाथ--िमल तो सकती थी सौ रूपये की भी, पर यहां रौब है, और आराम है। पचास-साठ रूपये ऊपर

से िमल जाएंग।

जालपा--तो तुम घूस लोग, गरीबों का गला काटोग?

रमा ने हंसकर कहा--नहीं िप्रये, वह जगह ऐसी नहीं िक गरीबों का गला काटना पड़े। बड़े-बडे महाजनों से

रकमें िमलेंगी और वह खुशी से गले लगायेंग।

मैं िजसे चाहूं िदिनभर दिफ्तर में खडा रक्खूं, महाजनों का एक-एक िमनट एक-एक अशरफी के बराबर है।

जल्दि-से-जल्दि अपना काम कराने के िलए वे खुशामदि भी करग, पैसे भी देंग।

जालपा संतुष्ट हो गई, बोली--हां, तब ठीक है। गरीबों का काम यों ही कर देना।

रमानाथ--वह तो करूंगा ही।

जालपा--अभी अम्मांजी से तो नहीं कहा?जाकर कह आओ। मुझिे तो सबसे बडी खुशी यही है िक अब

मालूम होगा िक यहां मेरा भी कोई अिधकार है।

रमानाथ--हां, जाता हूं, मगर उनसे तो मैं बीस ही बतलाऊंगा।

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जालपा ने उल्लिसत होकर कहा--हां जी, बिल्क पंद्रह ही कहना, ऊपर की आमदिनी की तो चचा ही करना

व्यथर्च है। भीतर का िहसाब वे ले सकते ह। मैं सबसे पहले चन्द्रहार बनवाऊंगी।

इतने में डािकए ने पुकारा। रमा ने दिरवाज़े पर जाकर देखा, तो उसके नाम एक पासर्चल आया था। महाशय

दिीनदियाल ने भेजा था। लेकर खुश-खुश घर में आए और जालपा के हाथों में रखकर बोले--तुम्हारे घर से आया

है, देखो इसमें क्या है?

रमा ने चटपट कैंची िनकाली और पासर्चल खोलाब उसमें देवदिार की एक िडिबया िनकली। उसमें एक

चन्द्रहार रक्खा हुआ था। रमा ने उसे िनकालकर देखा और हंसकर बोला--ईश्वर ने तुम्हारी सुन ली, चीज तो

बहुत अच्छी मालूम होती है।

जालपा ने कुंिठत स्वर में कहा--अम्मांजी को यह क्या सूझिी, यह तो उन्हीं का हार है। मैं तो इसे न लूंगी।

अभी डाक का वक्त हो तो लौटा दिो।

रमा ने िविस्मत होकर कहा--लौटाने की क्या जरूरत है, वह नाराज न होंगी?

जालपा ने नाक िसकोड़कर कहा--मेरी बला से, रानी रूठंगी अपना सुहाग लेंगी। मैं उनकी दिया के िबना भी

जीती रह सकती हूं। आज इतने िदिनों के बादि उन्हें मुझि पर दिया आई है। उस वक्त दिया न आई थी, जब मैं उनके

घर से िवदिा हुई थी। उनके गहने उन्हें मुबारक हों। मैं िकसी का एहसान नहीं लेना चाहती। अभी उनके ओढ़ने-

पहनने के िदिन ह। मैं क्यों बाधक बनूं। तुम कुशल से रहोग, तो मुझिे बहुत गहने िमल जाएंग। मैं अम्मांजी को यह

िदिखाना चाहती हूं िक जालपा तुम्हारे गहनों की भूखी नहीं है।

रमा ने संतोष देते हुए कहा--मेरी समझि में तो तुम्हें हार रख लेना चािहए। सोचो, उन्हें िकतना दुर्ःख

होगा। िवदिाई के समय यिदि न िदिया तो, तो अच्छा ही िकया। नहीं तो और गहनों के साथ यह भी चला जाता।

जालपा--मैं इसे लूंगी नहीं, यह िनश्चय है।

रमानाथ--आिखर क्यों?

जालपा--मेरी इच्छा!

रमानाथ--इस इच्छा का कोई कारण भी तो होगा?

जालपा रूंधे हुए स्वर में बोली--कारण यही है िक अम्मांजी इसे खुशी से नहीं दे रही ह, बहुत संभव है िक

इसे भेजते समय वह रोई भी हों और इसमें तो कोई संदेह ही नहीं िक इसे वापस पाकर उन्हें सच्चा आनंदि होगा।

देने वाले का ह्रदिय देखना चािहए। प्रेम से यिदि वह मुझिे एक छल्ला भी दे दें, तो मैं दिोनों हाथों से ले लूं। जब

िदिल पर जब्र करके दुर्िनया की लाज से या िकसी के िधक्कारने से िदिया, तो क्या िदिया। दिान िभखािरिनयों को

िदिया जाता है। मैं िकसी का दिान न लूंगी, चाहे वह माता ही क्यों न हों।

माता के प्रित जालपा का यह द्वेष देखकर रमा और कुछ न कह सका। द्वेष तकर्क और प्रमाण नहीं सुनता।

रमा ने हार ले िलया और चारपाई से उठता हुआ बोला--ज़रा अम्मां और बाबू जी को तो िदिखा दूं। कम-से-कम

उनसे पूछ तो लेना ही चािहए। जालपा ने हार उसके हाथ से छीन िलया और बोली--वे लोग मेरे कौन होते ह,

जो मैं उनसे पूछूं - केवल एक घर में रहने का नाता है। जब वह मुझिे कुछ नहीं समझिते, तो मैं भी उन्हें कुछ नहीं

समझिती।

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यह कहते हुए उसने हार को उसी िडब्बे में रख िदिया, और उस पर कपडा लपेटकर सीने लगी। रमा ने एक

बार डरते-डरते िफर कहा--ऐसी जल्दिी क्या है, दिस-पांच िदिन में लौटा देना। उन लोगों की भी खाितर हो

जाएगी। इस पर जालपा ने कठोर नजरों से देखकर कहा--जब तक मैं इसे लौटा न दूंगी, मेरे िदिल को चैन न

आएगा। मेरे ह्रदिय में कांटा-सा खटकता रहेगा। अभी पासर्चल तैयार हुआ जाता है, हाल ही लौटा दिो। एक क्षण में

पासर्चल तैयार हो गया और रमा उसे िलये हुए िचितत भाव से नीचे चला।

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ग्यारह

महाशय दियानाथ को जब रमा के नौकर हो जाने का हाल मालूम हुआ, तो बहुत खुश हुए। िववाह होते ही

वह इतनी जल्दि चेतेगा इसकी उन्हें आशा न थी। बोले--’जगह तो अच्छी है। ईमानदिारी से काम करोग, तो िकसी

अच्छे पदि पर पहुंच जाओग। मेरा यही उपदेश है िक पराए पैसे को हराम समझिना।’

रमा के जी में आया िक साफ कह दूं--’अपना उपदेश आप अपने ही िलए रिखए, यह मेरे अनुकूल नहीं है।’

मगर इतना बेहया न था।

दियानाथ ने िफर कहा--’यह जगह तो तीस रूपये की थी, तुम्हें बीस ही रूपए िमले?’

रमानाथ--’नए आदिमी को पूरा वेतन कैसे देते, शायदि साल-छः महीने में बढ़ जाय। काम बहुत है।’

दियानाथ--’तुम जवान आदिमी हो, काम से न घबडाना चािहए।’

रमा ने दूसरे िदिन नया सूट बनवाया और फैशन की िकतनी ही चीज़ं खरीदिीं। ससुराल से िमले हुए रूपये

कुछ बच रहे थ। कुछ िमत्रों से उधार ले िलए। वह साहबी ठाठ बनाकर सारे दिफ्तरपर रोब जमाना चाहता था।

कोई उससे वेतन तो पूछेगा नहीं, महाजन लोग उसका ठाठ-बाट देखकर सहम जाएंग। वह जानता था, अच्छी

आमदिनी तभी हो सकती है जब अच्छा ठाठ हो, सड़क के चौकीदिार को एक पैसा काफी समझिा जाता है, लेिकन

उसकी जगह साजर्जंट हो, तो िकसी की िहम्मत ही न पड़ेगी िक उसे एक पैसा िदिखाए। फटहाल िभखारी के िलए

चुटकी बहुत समझिी जाती है, लेिकन गरूए रेशम धारण करने वाले बाबाजी को लजाते-लजाते भी एक रूपया

देना ही पड़ता है। भेख और भीख में सनातन से िमत्रता है।

तीसरे िदिन रमा कोट-पैंट पहनकर और हैट लगाकर िनकला, तो उसकी शान ही कुछ और हो गई।

चपरािसयों ने झिुककर सलाम िकए। रमेश बाबू से िमलकर जब वह अपने काम का चाजर्च लेने आया, तो देखा एक

बरामदे में फटी हुई मैली दिरी पर एक िमयां साहब संदूक पर रिजस्टर फैलाए बैठे ह और व्यापारी लोग उन्हें

चारों तरफ से घेरे खड़े ह। सामने गािडयों, ठेलों और इक्कों का बाज़ार लगा हुआ है। सभी अपने-अपने काम की

जल्दिी मचा रहे ह। कहीं लोगों में

गाली-गलौज हो रही है, कहीं चपरािसयों में हंसी-िदिल्लगी। सारा काम बड़े ही अव्यविस्थत रूप से हो रहा

है। उस फटी हुई दिरी पर बैठना रमा को अपमानजनक जान पड़ा। वह सीधे रमेश बाबू से जाकर बोला--’क्या

मुझिे भी इसी मैली दिरी पर िबठाना चाहते ह?एक अच्छी-सी मेज़ और कई कुिसयां िभजवाइए और चपरािसयों

को हुक्म दिीिजए िक एक आदिमी से ज्यादिा मेरे सामने

न आने पावे। रमेश बाबू ने मुस्कराकर मेज़ और कुिसयां िभजवा दिीं। रमा शान से कुसी पर बैठा बूढ़े

मुंशीजी उसकी उच्छृतंखलता पर िदिल में हंस रहे थ। समझि गए, अभी नया जोश है, नई सनक है। चाजर्च दे िदिया।

चाजर्च में था ही क्या, केवल आज की आमदिनी का िहसाब समझिा देना था। िकस िजस पर िकस िहसाब से चुंगी ली

जाती है, इसकी छपी हुई तािलका मौजूदि थी, रमा आधा घंट में अपना काम समझि गया। बूढ़े मुंशीजी ने यद्यपिप

खुदि ही यह जगह छोड़ी थी, पर इस वक्त जाते हुए उन्हें दुर्ःख हो रहा था। इसी जगह वह तीस साल से बराबर

बैठते चले आते थ। इसी जगह की बदिलौत उन्होंने धन और यश दिोनों ही कमाया था। उसे छोड़ते हुए क्यों न

दुर्ःख होता। चाजर्च देकर जब वह िवदिा होने लग तो रमा उनके साथ जीने के नीचे तक गया। खां साहब उसकी इस

नमता से प्रसन्न हो गए। मुस्कराकर बोले--’हर एक िबल्टी पर एक आना बंधा हुआ है, खुली हुई बात है। लोग

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शौक से देते ह। आप अमीर आदिमी ह, मगर रस्म न िबगािडएगा। एक बार कोई रस्म टूट जाती है, तो उसका

बंधना मुिश्कल हो जाता है। इस एक आने में आधा चपरािसयों का हक है। जो बडे बाबू पहले थ, वह पचीस

रूपये महीना लेते थ, मगर यह कुछ नहीं लेते।’

रमा ने अरूिच प्रकट करते हुए कहा--’गंदिा काम है, मैं सगाई से काम करना चाहता हूं।’

बूढ़े िमयां ने हंसकर कहा--’अभी गंदिा मालूम होता है, लेिकन िफर इसी में मज़ा आएगा।’

खां साहब को िवदिा करके रमा अपनी कुसी पर आ बैठा और एक चपरासी से बोला--’इन लोगों से कहो,

बरामदे के नीचे चले जाएं । एक-एक करके नंबरवार आव, एक कागज पर सबके नाम नंबरवार िलख िलया

करो।’

एक बिनया, जो दिो घंट से खडा था, खुश होकर बोला--’हां सरकार, यह बहुत अच्छा होगा।’

रमानाथ--’जो पहले आवे, उसका काम पहले होना चािहए। बाकी लोग अपना नंबर आने तक बाहर रहें।

यह नहीं िक सबसे पीछे वाले शोर मचाकर पहले आ जाएं और पहले वाले खड़े मुंह ताकते रहें। ’

कई व्यापािरयों ने कहा--’हां बाबूजी, यह इंतजाम हो जाए, तो बहुत अच्छा हो भभ्भड़ में बडी देर हो जाती है।’

इतना िनयंत्रण रमा का रोब जमाने के िलए काफी था। विणक-समाज में आज ही उसके रंग-ढंग की

आलोचना और प्रशंसा होने लगी। िकसी बड़े कॉलेज के प्रोफसर को इतनी ख्याित उमभर में न िमलती। दिो-चार

िदिन के अनुभव से ही रमा को सारे दिांव-घात मालूम हो गए। ऐसी-ऐसी बातें सूझि गई जो खां साहब को ख्वाब

में भी न सूझिी थीं। माल की तौल, िगनती और परख में इतनी धांधली थी िजसकी कोई हदि नहीं। जब इस

धांधली से व्यापारी लोग सैकड़ों की रकम डकार जाते ह, तो रमा िबल्टी पर एक आना लेकर ही क्यों संतुष्ट हो

जाय, िजसमें आधा आना चपरािसयों का है। माल की तौल और परख में दिृतढ़ता से िनयमों का पालन करके वह

धन और कीित, दिोनों ही कमा सकता है। यह अवसर वह क्यों छोड़ने लगा – िवशषकर जब बडे बाबू उसके गहरे

दिोस्त थ। रमेश बाबू इस नए रंग ईट की कायर्च-पटुता पर मुग्ध हो गए। उसकी पीठ ठोंककर बोले--’कायदे के

अंदिर रहो और जो चाहो करो। तुम पर आंच तक न आने पायेगी।’

रमा की आमदिनी तेज़ी से बढ़ने लगी। आमदिनी के साथ प्रभाव भी बढ़ा। सूखी कलम िघसने वाले दिफ्तरके

बाबुआं को जब िसगरेट, पान, चाय या जलपान की इच्छा होती, तो रमा के पास चले आते, उस बहती गंगा में

सभी हाथ धो सकते थ। सारे दिफ्तर में रमा की सराहना होने लगी। पैसे को तो वह ठीकरा समझिता है! क्या

िदिल है िक वाह! और जैसा िदिल है, वैसी ही ज़बान भी। मालूम होता है, नस-नस में शराफत भरी हुई है। बाबुआं

का जब यह हाल था, तो चपरािसयों और मुहिररों का पूछना ही क्या? सब-के-सब रमा के िबना दिामों गुलाम थ।

उन गरीबों की आमदिनी ही नहीं, प्रितष्ठा भी खूब बढ़ गई थी। जहां गाड़ीवान तक फटकार िदिया करते थ, वहां

अब अच्छे-अच्छे की गदिर्चन पकड़कर नीचे ढकेल देते थ। रमानाथ की तूती बोलने लगी।

मगर जालपा की अिभलाषाएं अभी एक भी पूरी न हुई। नागपंचमी के िदिन मुहल्ले की कई युवितयां

जालपा के साथ कजली खेलने आइ, मगर जालपा अपने कमरे के बाहर नहीं िनकली। भादिों में जन्माष्टमी का

उत्सव आया। पड़ोस ही में एक सेठजी रहते थ, उनके यहां बडी धूमधाम से उत्सव मनाया जाता था। वहां से सास

और बहू को बुलावा आया। जागश्वरी गई, जालपा ने जाने से इंकार िकया। इन तीन महीनों में उसने रमा से एक

बार भी आभूषण की चचा न की,पर उसका यह एकांत-प्रेम, उसके आचरण से उत्तिेजक था। इससे ज्यादिा उत्तिेजक

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वह पुराना सूची-पत्र था, जो एक िदिन रमा कहीं से उठा लाया था। इसमें भांित- भांित के सुंदिर आभूषणों के

नमूने बने हुए थ। उनके मूल्य भी िलखे हुए थ। जालपा एकांत में इस सूची-पत्र को बडे ध्यान से देखा करती। रमा

को देखते ही वह सूची-पत्र िछपा लेती थी। इस हािदिक कामना को प्रकट करके वह अपनी हंसी न उड़वाना

चाहती थी।

रमा आधी रात के बादि लौटा, तो देखा, जालपा चारपाई पर पड़ी है। हंसकर बोला-बडा अच्छा गाना हो

रहा था। तुम नहीं गई; बड़ी गलती की।’

जालपा ने मुंह उधर िलया, कोई उत्तिर न िदिया।

रमा ने िफर कहा--’यहां अकेले पड़े-पड़े तुम्हारा जी घबराता रहा होगा! ’

जालपा ने तीव्र स्वर में कहा--’तुम कहते हो, मैंने गलती की, मैं समझिती हूं, मैंने अच्छा िकया। वहां

िकसके मुंह में कािलख लगती।’

जालपा ताना तो न देना चाहती थी, पर रमा की इन बातों ने उसे उत्तिेिजत कर िदिया। रोष का एक कारण

यह भी था िक उसे अकेली छोड़कर सारा घर उत्सव देखने चला गया। अगर उन लोगों के ह्रदिय होता, तो क्या

वहां जाने से इंकार न कर देते?

रमा ने लिज्जत होकर कहा--’कािलख लगने की तो कोई बात न थी, सभी जानते ह िक चोरी हो गई है,

और इस ज़माने में दिो-चार हज़ार के गहने बनवा लेना, मुंह का कौर नहीं है।’

चोरी का शब्दि ज़बान पर लाते हुए, रमा का ह्रदिय धड़क उठा। जालपा पित की ओर तीव्र दिृतिष्ट से देखकर

रह गई। और कुछ बोलने से बात बढ़ जाने का भय था, पर रमा को उसकी दिृतिष्ट से ऐसा भािसत हुआ, मानो उसे

चोरी का रहस्य मालूम है और वह केवल संकोच के कारण उसे खोलकर नहीं कह रही है। उसे उस स्वप्न की बात

भी यादि आई, जो जालपा ने चोरी की रात को देखा था। वह दिृतिष्ट बाण के समान उसके ह्रदिय को छेदिने लगी;

उसने सोचा, शायदि मुझिे भम हुआ। इस दिृतिष्ट में रोष के िसवा और कोई भाव नहीं है, मगर यह कुछ बोलती क्यों

नहीं- चुप क्यों हो गई?उसका चुप हो जाना ही गजब था। अपने मन का संशय िमटाने और जालपा के मन की

थाह लेने के िलए रमा ने मानो डुब्बी मारी--’यह कौन जानता था िक डोली से उतरते ही यह िवपित्ति तुम्हारा

स्वागत करेगी।’

जालपा आंखों में आंसू भरकर बोली--’तो मैं तुमसे गहनों के िलए रोती तो नहीं हूं। भाग्य में जो िलखा था,

वह हुआ। आग भी वही होगा, जो िलखा है। जो औरतें गहने नहीं पहनतीं, क्या उनके िदिन नहीं कटते?’

इस वाक्य ने रमा का संशय तो िमटा िदिया, पर इसमें जो तीव्र वेदिना िछपी हुई थी, वह उससे िछपी न

रही। इन तीन महीनों में बहुत प्रयत्न करने पर भी वह सौ रूपये से अिधक संग्रह न कर सका था। बाबू लोगों के

आदिर-सत्कार में उसे बहुत-कुछ फलना पड़ता था; मगर िबना िखलाए-िपलाए काम भी तो न चल सकता था।

सभी उसके दुर्श्मन हो जाते और उसे उखाड़ने की घातें सोचने लगते। मुफ्त का धन अकेले नहीं हजम होता, यह

वह अच्छी तरह जानता था। वह स्वयं एक पैसा भी व्यथर्च खचर्च न करता। चतुर व्यापारी की भांित वह जो कुछ

खचर्च करता था, वह केवल कमाने के िलए। आश्वासन देते हुए बोला--’ईश्वर ने चाहा तो दिो-एक महीने में कोई

चीज़ बन जाएगी।’

जालपा--’मैं उन िस्त्रयों में नहीं हूं, जो गहनों पर जान देती ह। हां, इस तरह िकसी के घर आते-जाते शमर्च

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आती ही है।’

रमा का िचत्ति ग्लािन से व्याकुल हो उठा। जालपा के एक-एक शब्दि से िनराशा टपक रही थी। इस अपार

वेदिना का कारण कौन था?क्या यह भी उसी का दिोष न था िक इन तीन महीनों में उसने कभी गहनों की चचा

नहीं की?जालपा यिदि संकोच के कारण इसकी चचा न करती थी, तो रमा को उसके आंसू पोंछने के िलए, उसका

मन रखने के िलए, क्या मौन के िसवा दूसरा उपाय न था?मुहल्ले में रोज़ ही एक-न-एक उत्सव होता रहता है,

रोज़ ही पासपड़ोस की औरतें िमलने आती ह, बुलावे भी रोज आते ही रहते ह, बेचारी जालपा कब तक इस

प्रकार आत्मा का दिमन करती रहेगी, अंदिर-ही-अंदिर कुढती रहेगी। हंसने-बोलने को िकसका जी नहीं चाहता,

कौन कैिदियों की तरह अकेला पडा रहना पसंदि करता है? मेरे ही कारण तो इसे यह भीषण यातना सहनी पड़

रही है। उसने सोचा, क्या िकसी सराफ से गहने उधार नहीं िलए जा सकते?कई बडे सराफों से उसका पिरचय

था, लेिकन उनसे वह यह बात कैसे कहता- कहीं वे इंकार कर दें तो- या संभव है, बहाना करके टाल दें। उसने

िनश्चय िकया िक अभी उधार लेना ठीक न होगा। कहीं वादे पर रूपये न दे सका, तो व्यथर्च में थुक्का-फजीहत

होगी। लिज्जत होना पड़ेगा। अभी कुछ िदिन और धैयर्च से काम लेना चािहए। सहसा उसके मन में आया, इस िवषय

में जालपा की राय लूं। देखूं वह क्या कहती है। अगर उसकी इच्छा हो तो िकसी सराफ से वादे पर चीज़ं ले ली

जायं, मैं इस अपमान और संकोच को सह लूंगा। जालपा को संतुष्ट करने के िलए िक उसके गहनों की उसे िकतनी

िफक है! बोला--’तुमसे एक सलाह करना चाहता हूं। पूछूं या न पूछूं। ’

जालपा को नींदि आ रही थी, आंखें बंदि िकए हुए बोली--’अब सोने दिो भई, सवेरे उठना है।’

रमानाथ--’अगर तुम्हारी राय हो, तो िकसी सराफ से वादे पर गहने बनवा लाऊं। इसमें कोई हजर्च तो है

नहीं।’

जालपा की आंखें खुल गई। िकतना कठोर प्रश्न था। िकसी मेहमान से पूछना--’किहए तो आपके िलए

भोजन लाऊं, िकतनी बडी अिशष्टता है। इसका तो यही आशय है िक हम मेहमान को िखलाना नहीं चाहते। रमा

को चािहए था िक चीजें लाकर जालपा के सामने रख देता। उसके बार-बार पूछने पर भी यही कहना चािहए था

िक दिाम देकर लाया हूं। तब वह अलबत्तिा खुश होती। इस िवषय में उसकी सलाह लेना, घाव पर नमक िछड़कना

था। रमा की ओर अिवश्वास की आंखों से देखकर बोली--’मैं तो गहनों के िलए इतनी उत्सुक नहीं हूं।’

रमानाथ--’नहीं, यह बात नहीं, इसमें क्या हजर्च है िक िकसी सराफ से चीजें ले लूं। धीरे-धीरे उसके रूपये

चुका दूंगा।’

जालपा ने दिृतढ़ता से कहा--’नहीं, मेरे िलए कजर्च लेने की जरूरत नहीं। मैं वेश्या नहीं हूं िक तुम्हें नोचखसोटकर अपना रास्ता लूं। मुझिे तुम्हारे साथ जीना और मरना है। अगर मुझिे सारी उम बे-गहनों के रहना पड़े,

तो भी मैं कुछ लेने को न कहूंगी। औरतें गहनों की इतनी भूखी नहीं होतीं। घर के प्रािणयों को संकट में डालकर

गहने पहनने वाली दूसरी होंगी। लेिकन तुमने तो पहले कहा था िक जगह बडी आमदिनी की है, मुझिे तो कोई

िवशष बचत िदिखाई नहीं देती।’

रमानाथ--’बचत तो जरूर होती और अच्छी होती, लेिकन जब अहलकारों के मारे बचने भी पाए। सब

शैतान िसर पर सवार रहते ह। मुझिे पहले न मालूम था िक यहां इतने प्रेतों की पूजा करनी होगी।’

जालपा--’तो अभी कौन-सी जल्दिी है, बनते रहेंग धीरे-धीरे।’

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रमानाथ--’खैर, तुम्हारी सलाह है, तो एक-आधा महीने और चुप रहता हूं। मैं सबसे पहले कंगन

बनवाऊंगा।’

जालपा ने गदिगदि होकर कहा--’तुम्हारे पास अभी इतने रूपये कहां होंग?’

रमानाथ--’इसका उपाय तो मेरे पास है। तुम्हें कैसा कंगन पसंदि है?’

जालपा अब अपने कृतित्रम संयम को न िनभा सकी। आलमारी में से आभूषणों का सूची-पत्र िनकालकर रमा

को िदिखाने लगी। इस समय वह इतनी तत्पर थी, मानो सोना लाकर रक्खा हुआ है, सुनार बैठा हुआ है, केवल

िडज़ाइन ही पसंदि करना बाकी है। उसने सूची के दिो िडज़ाइन पसंदि िकए। दिोनों वास्तव में बहुत ही सुंदिर थ। पर

रमा उनका मूल्य देखकर सन्नाट में आ गया। एक- एक हज़ार का था, दूसरा आठ सौ का।

रमानाथ--’ऐसी चीज़ं तो शायदि यहां बन भी न सकें, मगर कल मैं ज़रा सराफ की सैर करूंगा।’

जालपा ने पुस्तक बंदि करते हुए करूण स्वर में कहा--’इतने रूपये न जाने तुम्हारे पास कब तक होंग? उंह,

बनेंग-बनेंग, नहीं कौन कोई गहनों के िबना मरा जाता है।’

रमा को आज इसी उधेड़बुन में बडी रात तक नींदि न आई। ये जडाऊ कंगन इन गोरी-गोरी कलाइयों पर

िकतने िखलेंग। यह मोह-स्वप्न देखते-देखते उसे न जाने कब नींदि आ गई।

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बारह

दूसरे िदिन सवेरे ही रमा ने रमेश बाबू के घर का रास्ता िलया। उनके यहां भी जन्माष्टमी में झिांकी होती

थी। उन्हें स्वयं तो इससे कोई अनुराग न था, पर उनकी स्त्री उत्सव मनाती थी, उसी की यादिगार में अब तक यह

उत्सव मनाते जाते थ। रमा को देखकर बोले--’आओ जी, रात क्यों नहीं आए? मगर यहां गरीबों के घर क्यों

आते। सेठजी की झिांकी कैसे छोड़ देते। खूब बहार रही होगी!

रमानाथ--’आपकी-सी सजावट तो न थी, हां और सालों से अच्छी थी। कई कत्थक और वेश्याएं भी आई

थीं। मैं तो चला आया था; मगर सुना रातभर गाना होता रहा।’

रमेश--’सेठजी ने तो वचन िदिया था िक वेश्याएं न आने पावगी, िफर यह क्या िकया। इन मूखो के हाथों

िहन्दू-धमर्च का सवर्चनाश हो जायगा। एक तो वेश्याआं का नाम यों भी बुरा, उस पर ठाकुरद्वारे में! िछः-िछः, न

जाने इन गधों को कब अक्ल आवेगी।’

रमानाथ--’वेश्याएं न हों, तो झिांकी देखने जाय ही कौन- सभी तो आपकी तरह योगी और तपस्वी नहीं

ह।’

रमेश--’मेरा वश चले, तो मैं कानून से यह दुर्राचार बंदि कर दूं। खैर, फुरसत हो तो आओ एक-आधा बाज़ी

हो जाय।’

रमानाथ--’और आया िकसिलए हूं; मगर आज आपको मेरे साथ ज़रा सराफ तक चलना पड़ेगा। यों कई

बडी-बडी कोिठयों से मेरा पिरचय है; मगर आपके रहने से कुछ और ही बात होगी।’

रमेश--’चलने को चला चलूंगा, मगर इस िवषय में मैं िबलकुल कोरा हूं।न कोई चीज बनवाई न खरीदिी।

तुम्हें क्या कुछ लेना है?’

रमानाथ--’लेना-देना क्या है, ज़रा भाव-ताव देखूंगा।’

रमेश--’मालूम होता है, घर में फटकार पड़ी है।’

रमानाथ--’जी, िबलकुल नहीं। वह तो जेवरों का नाम तक नहीं लेती। मैं कभी पूछता भी हूं, तो मना

करती ह, लेिकन अपना कतर्चव्य भी तो कुछ है। जब से गहने चोरी चले गए, एक चीज़ भी नहीं बनी।’

रमेश--’मालूम होता है, कमाने का ढंग आ गया। क्यों न हो, कायस्थ के बच्चे हो िकतने रूपये जोड़ िलए?’

रमानाथ--’रूपये िकसके पास ह, वादे पर लूंगा। ’

रमेश--’इस ख़ब्त में न पड़ो। जब तक रूपये हाथ में न हों, बाज़ार की तरफ जाओ ही मत। गहनों से तो

बुड्ढे नई बीिवयों का िदिल खुश िकया करते ह, उन बेचारों के पास गहनों के िसवा होता ही क्या है। जवानों के

िलए और बहुत से लटके ह। यों मैं चाहूं, तो दिो-चार हज़ार का माल िदिलवा सकता हूं,मगर भई, कज़र्च की लत बुरी

है।’

रमानाथ-- ’मैं दिो-तीन महीनों में सब रूपये चुका दूंगा। अगर मुझिे इसका िवश्वास न होता, तो मैं िजक ही

न करता।’

रमेश--’तो दिो-तीन महीने और सब्र क्यों नहीं कर जाते? कज़र्च से बडा पाप दूसरा नहीं। न इससे बडी

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िवपित्ति दूसरी है। जहां एक बार धड़का खुला िक तुम आए िदिन सराफ की दुर्कान पर खड़े नज़र आओग। बुरा न

मानना। मैं जानता हूं, तुम्हारी आमदिनी अच्छी है, पर भिवष्य के भरोसे पर और चाहे जो काम करो, लेिकन कजर्च

क़भी मत लो। गहनों का मज़र्च न जाने इस दििरद्र देश में कैसे फैल गया। िजन लोगों के भोजन का िठकाना नहीं, वे

भी गहनों के पीछे प्राण देते ह। हर साल अरबों रूपये केवल सोना-चांदिी खरीदिने में व्यय हो जाते ह। संसार के

और िकसी देश में इन धातुआं की इतनी खपत नहीं। तो बात क्या है? उन्नत देशों में धन व्यापार में लगता है,

िजससे लोगों की परविरश होती है, और धन बढ़ता है। यहां धन! ऋंगार में खचर्च होता है, उसमें उन्नित और

उपकार की जो दिो महान शिक्तयां ह, उन दिोनों ही का अंत हो जाता है। बस यही समझि लो िक िजस देश के

लोग िजतने ही मूखर्च होंग, वहां जेवरों का प्रचार भी उतना ही अिधक होगा। यहां तो खैर नाक-कान िछदिाकर ही

रह जाते ह, मगर कई ऐसे देश भी ह, जहां होंठ छेदिकर लोग गहने पहनते ह।

रमा ने कौतूहल से कहा-- यादि नहीं आता, पर शायदि अफ्रीका हो, हमें यह सुनकर अचंभा होता है, लेिकन

अन्य देश वालों के िलए नाक-कान का िछदिना कुछ कम अचंभे की बात न होगी। बुरा मरज है, बहुत ही बुरा। वह

धन, जो भोजन में खचर्च होना चािहए, बाल-बच्चों का पेट काटकर गहनों की भेंट कर िदिया जाता है। बच्चों को

दूध न िमले न सही। घी की गंध तक उनकी नाक में न पहुंचे, न सही। मेवों और फलों के दिशर्चन उन्हें न हों, कोई

परवा नहीं, पर देवीजी गहने जरूर पहनेंगी और स्वामीजी गहने जरूर बनवाएंग। दिस-दिस, बीस-बीस रूपये पाने

वाले क्लको को देखता हूं, जो सड़ी हुई कोठिरयों में पशुआं की भांित जीवन काटते ह, िजन्हें सवेरे का जलपान तक

मयस्सर नहीं होता, उन पर भी गहनों की सनक सवार रहती है। इस प्रथा से हमारा सवर्चनाश होता जा रहा है। मैं

तो कहता हूं, यह गुलामी पराधीनता से कहीं बढ़कर है। इसके कारण हमारा िकतना आित्मक, नैितक, दिैिहक,

आिथक और धािमक पतन हो रहा है, इसका अनुमान ब्रह्मा भी नहीं कर सकते।

रमानाथ-- ‘मैं तो समझिता हूं, ऐसा कोई भी देश नहीं, जहां िस्त्रयां गहने न पहनती हों। क्या युरोप में

गहनों का िरवाज नहीं है?’

रमेश-- ‘तो तुम्हारा देश युरोप तो नहीं है। वहां के लोग धानी ह। वह धन लुटाएं, उन्हें शोभा देता है। हम

दििरक ह, हमारी कमाई का एक पैसा भी फजूल न खचर्च होना चािहए।’

रमेश बाबू इस वादि-िववादि में शतरंज भूल गए। छुट्टी का िदिन था ही,दिो-चार िमलने वाले और आ गए,

रमानाथ चुपके से िखसक आया। इस बहस में एक बात ऐसी थी, जो उसके िदिल में बैठ गई। उधार गहने लेने का

िवचार उसके मन से िनकल गया। कहीं वह जल्दिी रूपया न चुका सका, तो िकतनी बडी बदिनामी होगी। सराट्ठ

तक गया अवश्य, पर िकसी दुर्कान में जाने का साहस न हुआ। उसने िनश्चय िकया, अभी तीन-चार महीने तक

गहनों का नाम न लूंगा।

वह घर पहुंचा, तो नौ बज गए थ। दियानाथ ने उसे देखा तो पूछा—‘आज सवेरे-सवेरे कहां चले गए थ?’

रमानाथ—‘ज़रा बडे बाबू से िमलने गया था।’

दियानाथ—‘घंट-आधा घंट के िलए पुस्तकालय क्यों नहीं चले जाया करते। गप-शप में िदिन गंवा देते हो

अभी तुम्हारी पढ़ने-िलखने की उम है। इम्तहान न सही, अपनी योग्यता तो बढ़ा सकते हो एक सीधा-सा खत

िलखना पड़ जाता है, तो बगलें झिांकने लगते हो असली िशक्षा स्कूल छोड़ने के बादि शुरू होती है, और वही हमारे

जीवन में काम भी आती है। मैंने तुम्हारे िवषय में कुछ ऐसी बातें सुनी ह, िजनसे मुझिे बहुत खेदि हुआ है और तुम्हें

समझिा देना मैं अपना धमर्च समझिता हूं। मैं यह हरिगज नहीं चाहता िक मेरे घर में हराम की एक कौड़ी भी आए।

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मुझिे नौकरी करते तीस साल हो गए। चाहता, तो अब तक हज़ारों रूपये जमा कर लेता, लेिकन मैं कसम खाता हूं

िक कभी एक पैसा भी हराम का नहीं िलया। तुममें यह आदित कहां से आ गई, यह मेरी समझि में नहीं आता। ’

रमा ने बनावटी कोध िदिखाकर कहा—‘िकसने आपसे कहा है? ज़रा उसका नाम तो बताइए? मूंछें उखाड़ लूं

उसकी! ’

दियानाथ—‘िकसी ने भी कहा हो, इससे तुम्हें कोई मतलब नहीं। तुम उसकी मूंछें उखाड़ लोग, इसिलए

बताऊंगा नहीं, लेिकन बात सच है या झिूठ, मैं इतना ही पूछना चाहता हूं।’

रमानाथ—‘िबलकुल झिूठ! ’

दियानाथ—‘िबलकुल झिूठ? ’

रमानाथ—‘जी हां, िबलकुल झिूठ? ’

दियानाथ—‘तुम दिस्तूरी नहीं लेते? ’

रमानाथ—‘दिस्तूरी िरश्वत नहीं है, सभी लेते ह और खुल्लम-खुल्ला लेते ह। लोग िबना मांग आप-ही-आप

देते ह, मैं िकसी से मांगने नहीं जाता। ’

दियानाथ—‘सभी खुल्लम-खुल्ला लेते ह और लोग िबना मांग देते ह, इससे तो िरश्वत की बुराई कम नहीं हो

जाती।’

रमानाथ—‘दिस्तूरी को बंदि कर देना मेरे वश की बात नहीं। मैं खुदि न लूं, लेिकन चपरासी और मुहिरर का

हाथ तो नहीं पकड़ सकता आठ-आठ, नौ नौ पाने वाले नौकर अगर न लें, तो उनका काम ही नहीं चल सकता मैं

खुदि न लूं, पर उन्हें नहीं रोक सकता ।’

दियानाथ ने उदिासीन भाव से कहा—‘मैंने समझिा िदिया, मानने का अिख्तयार तुम्हें है।’

यह कहते हुए दियानाथ दिफ्तर चले गए। रमा के मन में आया, साफ कह दे, आपने िनस्पृतह बनकर क्या कर

िलया, जो मुझिे दिोष दे रहे ह। हमेशा पैसे-पैसे को मुहताज रहे। लड़कों को पढ़ा तक न सके। जूते-कपड़े तक न

पहना सके। यह डींग मारना तब शोभा देता, जब िक नीयत भी साफ रहती और जीवन भी सुख से कटता।

रमा घर में गया तो माता ने पूछा—‘आज कहां चले गए बेटा, तुम्हारे बाबूजी इसी पर िबगड़ रहे थ।‘

रमानाथ—‘इस पर तो नहीं िबगड़ रहे थ, हां, उपदेश दे रहे थ िक दिस्तूरी मत िलया करो। इससे आत्मा

दुर्बर्चल होती है और बदिनामी होती है।’

जागश्वरी—‘तुमने कहा नहीं, आपने बडी ईमानदिारी की तो कौन-से झिंडे गाड़ िदिए! सारी िजदिगी पेट

पालते रहे।’

रमानाथ—‘कहना तो चाहता था, पर िचढ़जाते। जैसे आप कौड़ी-कौड़ी को मुहताज रहे, वैसे मुझिे भी

बनाना चाहते ह। आपको लेने का शऊर तो है नहीं। जब देखा िक यहां दिाल नहीं गलती , तो भगत बन गए। यहां

ऐसे घोंघा- बसंत नहीं ह। बिनयों से रूपये एंठने के िलए अक्ल चािहए, िदिल्लगी नहीं है! जहां िकसी ने भगतपन

िकया और मैं समझि गया, बुद्धिू है। लेने की तमीज नहीं, क्या करे बेचारा। िकसी तरह आंसू तो पोंछे।’

जागश्वरी—‘बस-बस यही बात है बेटा, िजसे लेना आवेगा, वह जरूर लेगा। इन्हें तो बस घर में कानून

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बघारना आता है और िकसी के सामने बात तो मुंह से िनकलती नहीं। रूपये िनकाल लेना तो मुिश्कल है।’

रमा दिफ्तर जाते समय ऊपर कपड़े पहनने गया, तो जालपा ने उसे तीन िलफाफे डाक में छोड़ने के िलए िदिए।

इस वक्त उसने तीनों िलफाफे जेब में डाल िलए, लेिकन रास्ते में उन्हें खोलकर िचिट्ठयां पढ़ने लगा। िचिट्ठयां क्या

थीं, िवपित्ति और वेदिना का करूण िवलाप था, जो उसने अपनी तीनों सहेिलयों को सुनाया था। तीनों का िवषय

एक ही था। केवल भावों का अंतर था,’िजदिगी पहाड़ हो गई है, न रात को नींदि आती है न िदिन को आराम,

पितदेव को प्रसन्न करने के िलए, कभी-कभी हंस-बोल लेती हूं पर िदिल हमेशा रोया करता है। न िकसी के घर

जाती हूं, न िकसी को मुंह िदिखाती हूं। ऐसा जान पड़ता है िक यह शोक मेरी जान ही लेकर छोड़ेगा। मुझिसे वादे

तो रोज िकए जाते ह, रूपये जमा हो रहे ह, सुनार ठीक िकया जा रहा है, िडजाइन तय िकया जा रहा है, पर यह

सब धोखा है और कुछ नहीं।’

रमा ने तीनों िचिट्ठयां जेब में रख लीं। डाकखाना सामने से िनकल गया, पर उसने उन्हें छोडा नहीं। यह

अभी तक यही समझिती है िक मैं इसे धोखा दे रहा हूं- क्या करूं, कैसे िवश्वास िदिलाऊं- अगर अपना वश होता तो

इसी वक्त आभूषणों के टोकरे भर-भर जालपा के सामने रख देता, उसे िकसी बड़े सराफ की दुर्कान पर ले जाकर

कहता, तुम्हें जो-जो चीजें लेनी हों, ले लो। िकतनी अपार वेदिना है, िजसने िवश्वास का भी अपहरण कर िलया है।

उसको आज उस चोट का सच्चा अनुभव हुआ, जो उसने झिूठी मयादिा की रक्षा में उसे पहुंचाई थी। अगर वह

जानता, उस अिभनय का यह फल होगा, तो कदिािचत् अपनी डींगों का परदिा खोल देता। क्या ऐसी दिशा में भी,

जब जालपा इस शोक-ताप से फुंकी जा रही थी, रमा को कज़र्च लेने में संकोच करने की जगह थी? उसका ह्रदिय

कातर हो उठा। उसने पहली बार सच्चे ह्रदिय से ईश्वर से याचना की,भगवन्, मुझिे चाहे दिंड देना, पर मेरी जालपा

को मुझिसे मत छीनना। इससे पहले मेरे प्राण हर लेना। उसके रोम-रोम से आत्मध्विन-सी िनकलने लगी--ईश्वर,

ईश्वर! मेरी दिीन दिशा पर दिया करो। लेिकन इसके साथ ही उसे जालपा पर कोध भी आ रहा था। जालपा ने क्यों

मुझिसे यह बात नहीं कही। मुझिसे क्यों परदिा रखा और मुझिसे परदिा रखकर अपनी सहेिलयों से यह दुर्खडा रोया ?

बरामदे में माल तौला जा रहा था। मेज़ पर रूपये-पैसे रखे जा रहे थ और रमा िचता में डूबा बैठा हुआ था।

िकससे सलाह ले, उसने िववाह ही क्यों िकया- सारा दिोष उसका अपना था। जब वह घर की दिशा जानता था,

तो क्यों उसने िववाह करने से इंकार नहीं कर िदिया? आज उसका मन काम में नहीं लगता था। समय से पहले ही

उठकर चला आया।

जालपा ने उसे देखते ही पूछा, ‘मेरी िचिट्ठयां छोड़ तो नहीं दिीं? ‘

रमा ने बहाना िकया, ‘अरे इनकी तो यादि ही नहीं रही। जेब में पड़ी रह गई।’

जालपा—‘यह बहुत अच्छा हुआ। लाओ, मुझिे दे दिो, अब न भेजूंगी।’

रमानाथ—‘क्यों, कल भेज दूंगा।’

जालपा—‘नहीं, अब मुझिे भेजना ही नहीं है, कुछ ऐसी बातें िलख गई थी,जो मुझिे न िलखना चािहए थीं।

अगर तुमने छोड़ दिी होती, तो मुझिे दुर्ःख होता। मैंने तुम्हारी िनदिा की थी। यह कहकर वह मुस्कराई।

रमानाथ—‘जो बुरा है, दिगाबाज है, धूतर्च है, उसकी िनदिा होनी ही चािहए।’

जालपा ने व्यग्र होकर पूछा—‘तुमने िचिट्ठयां पढ़लीं क्या?’

रमा ने िनद्यपसंकोच भाव से कहा,हां, यह कोई अक्षम्य अपराध है?’

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जालपा कातर स्वर में बोली,तब तो तुम मुझिसे बहुत नाराज होग?’

आंसुआं के आवेग से जालपा की आवाज़ रूक गई। उसका िसर झिुक गया और झिुकी हुई आंखों से आंसुआं की

बूंदें आंचल पर िफरने लगीं। एक क्षण में उसने स्वर को संभालकर कहा,’मुझिसे बडा भारी अपराध हुआ है। जो

चाहे सज़ा दिो; पर मुझिसे अप्रसन्न मत हो ईश्वर जानते ह, तुम्हारे जाने के बादि मुझिे िकतना दुर्ःख हुआ। मेरी

कलम से न जाने कैसे ऐसी बातें िनकल गई।’

जालपा जानती थी िक रमा को आभूषणों की िचता मुझिसे कम नहीं है, लेिकन िमत्रों से अपनी व्यथा कहते

समय हम बहुधा अपना दुर्ःख बढ़ाकर कहते ह। जो बातें परदे की समझिी जाती ह, उनकी चचा करने से एक तरह

का अपनापन जािहर होता है। हमारे िमत्र समझिते ह, हमसे ज़रा भी दुर्राव नहीं रखता और उन्हें हमसे

सहानुभूित हो जाती है। अपनापन िदिखाने की यह आदित औरतों में कुछ अिधक होती है।

रमा जालपा के आंसू पोंछते हुए बोला—‘मैं तुमसे अप्रसन्न नहीं हूं, िप्रये! अप्रसन्न होने की तो कोई बात

ही नहीं है। आशा का िवलंब ही दुर्राशा है, क्या मैं इतना नहीं जानता। अगर तुमने मुझिे मना न कर िदिया होता,

तो अब तक मैंने िकसी-न-िकसी तरह दिो-एक चीजें अवश्य ही बनवा दिी होतीं। मुझिसे भूल यही हुई िक तुमसे

सलाह ली। यह तो वैसा ही है जैसे मेहमान को पूछ-पूछकर भोजन िदिया जाय। उस वक्त मुझिे यह ध्यान न रहा

िक संकोच में आदिमी इच्छा होने पर भी ‘नहीं-नहीं’ करता है। ईश्वर ने चाहा तो तुम्हें बहुत िदिनों तक इंतजार न

करना पड़ेगा।’

जालपा ने सिचत नजरों से देखकर कहा,तो क्या उधार लाओग?’

रमानाथ—‘हां, उधार लाने में कोई हजर्च नहीं है। जब सूदि नहीं देना है, तो जैसे नगदि वैसे उधार। ऋण से

दुर्िनया का काम चलता है। कौन ऋण नहीं लेता!हाथ में रूपया आ जाने से अलल्ले-तलल्ले खचर्च हो जाते ह। कजर्च

िसर पर सवार रहेगा, तो उसकी िचता हाथ रोके रहेगी।‘

जालपा—‘मैं तुम्हें िचता में नहीं डालना चाहती। अब मैं भूलकर भी गहनों का नाम न लूंगी।’

रमानाथ—‘नाम तो तुमने कभी नहीं िलया, लेिकन तुम्हारे नाम न लेने से मेरे कतर्चव्य का अंत तो नहीं हो

जाता। तुम कजर्च से व्यथर्च इतना डरती हो रूपये जमा होने के इंतजार में बैठा रहूंगा, तो शायदि कभी न जमा होंग।

इसी तरह लेतेदेते साल में तीन-चार चीज़ं बन जाएंगी।’

जालपा—‘मगर पहले कोई छोटी-सी चीज़ लाना।’

रमानाथ—‘हां, ऐसा तो करूंगा ही।’

रमा बाज़ार चला, तो खूब अंधेरा हो गया था। िदिन रहते जाता तो संभव था, िमत्रों में से िकसी की िनगाह

उस पर पड़ जाती। मुंशी दियानाथ ही देख लेते। वह इस मामले को गुप्त ही रखना चाहता था।

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तेरह

सराफे में गंगू की दुर्कान मशहूर थी। गंगू था तो ब्राह्मण, पर बडा ही व्यापारकुशल! उसकी दुर्कान पर

िनत्य गाहकों का मेला लगा रहता था। उसकी कमर्चिनष्ठा गाहकों में िवश्वास पैदिा करती थी। और दुर्कानों पर ठग

जाने का भय था। यहां िकसी तरह का धोखा न था। गंगू ने रमा को देखते ही मुस्कराकर कहा, ‘आइए बाबूजी,

ऊपर आइए। बडी दिया की। मुनीमजी, आपके वास्ते पान मंगवाओ। क्या हुक्म है बाबूजी, आप तो जैसे मुझिसे

नाराज ह। कभी आते ही नहीं, गरीबों पर भी कभी-कभी दिया िकया कीिजए।‘

गंगू की िशष्टता ने रमा की िहम्मत खोल दिी। अगर उसने इतने आग्रह से न बुलाया होता तो शायदि रमा को

दुर्कान पर जाने का साहस न होता। अपनी साख का उसे अभी तक अनुभव न हुआ था। दुर्कान पर जाकर बोला,

‘यहां हम जैसे मजदूरों का कहां गुज़र है, महाराज! गांठ में कुछ हो भी तो!

गंगू—‘यह आप क्या कहते ह सरकार, आपकी दुर्कान है, जो चीज़ चािहए ले जाइए, दिाम आग-पीछे िमलते

रहेंग। हम लोग आदिमी पहचानते ह बाबू साहब, ऐसी बात नहीं है। धान्य भाग िक आप हमारी दुर्कान पर आए

तो। िदिखाऊं कोई जडाऊ चीज़? कोई कंगन, कोई हार- अभी हाल ही में िदिल्ली से माल आया है।’

रमानाथ—‘कोई हलके दिामों का हार िदिखाइए।’

गंगू—‘यही कोई सात-आठ सौ तक?’

रमानाथ—‘अजी नहीं, हदि चार सौ तक।’

गंगू—‘मैं आपको दिोनों िदिखाए देता हूं। जो पसंदि आव, ले लीिजएगा। हमारे यहां िकसी तरह का दिफलगसल नहीं बाबू साहब! इसकी आप ज़रा भी िचता न कर। पांच बरस का लड़का हो या सौ बरस का बूढ़ा, सबके

साथ एक बात रखते ह। मािलक को भी एक िदिन मुंह िदिखाना है, बाबू!’

संदूक सामने आया, गंगू ने हार िनकाल-िनकालकर िदिखाने शुरू िकए। रमा की आंखें खुल गई, जी लोटपोट हो गया। क्या सगाई थी! नगीनों की िकतनी सुंदिर सजावट! कैसी आब-ताब! उनकी चमक दिीपक को मात

करती थी। रमा ने सोच रखा था सौ रूपये से ज्यादिा उधार न लगाऊंगा, लेिकन चार सौ वाला हार आंखों में कुछ

जंचता न था। और जेब में द्दः तीन सौ रूपये थ। सोचा, अगर यह हार ले गया और जालपा ने पसंदि न िकया, तो

फायदिा ही क्या? ऐसी चीज़ ले जाऊं िक वह देखते ही भड़क उठे। यह जडाऊ हार उसकी गदिर्चन में िकतनी शोभा

देगा। वह हार एक सहस्र मिण-रंिजत नजरों से उसके मन को खींचने लगा। वह अिभभूत होकर उसकी ओर ताक

रहा था, पर मुंह से कुछ कहने का साहस न होता था। कहीं गंगू ने तीन सौ रूपये उधार लगाने से इंकार कर

िदिया, तो उसे िकतना लिज्जत होना पड़ेगा। गंगू ने उसके मन का संशय ताड़कर कहा, ‘आपके लायक तो बाबूजी

यही चीज़ है, अंधेरे घर में रख दिीिजए, तो उजाला हो जाय।‘

रमानाथ—‘पसंदि तो मुझिे भी यही है, लेिकन मेरे पास कुल तीन सौ रूपये ह, यह समझि लीिजए।

शमर्च से रमा के मुंह पर लाली छा गई। वह धड़कते हुए ह्रदिय से गंगू का मुंह देखने लगा।गंगू ने िनष्कपट

भाव से कहा, ‘बाबू साहब, रूपये का तो िज़क ही न कीिजए। किहए दिस हज़ार का माल साथ भेज दूं। दुर्कान

आपकी है, भला कोई बात है? हुक्म हो, तो एक-आधा चीज़ और िदिखाऊं? एक शीशफूल अभी बनकर आया है,

बस यही मालूम होता है, गुलाब का फल िखला हुआ है। देखकर जी खुश हो जाएगा। मुनीमजी, ज़रा वह

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शीशफूल िदिखाना तो। और दिाम का भी कुछ ऐसा भारी नहीं, आपको ढाई सौ में दे दूंगा।‘

रमा ने मुस्कराकर कहा, ‘महाराज, बहुत बातें बनाकर कहीं उल्ट छुरे से न मूंड़ लेना, गहनों के मामले में

िबलकुल अनाड़ी हूं। ‘

गंगू—‘ऐसा न कहो बाबूजी, आप चीज़ ले जाइए, बाज़ार में िदिखा लीिजए, अगर कोई। ढाई सौ से कौड़ी कम में

दे दे, तो मैं मुफ्त दे दूंगा। शीशफूल आया, सचमुच गुलाब का फूल था, िजस पर हीरे की किलयां ओस की बूंदिों के

समान चमक रही थीं। रमा की टकटकी बंध गई, मानो कोई अलौिकक वस्तु सामने आ गई हो ।

गंगू—‘बाबूजी, ढाई सौ रूपये तो कारीगर की सगाई के इनाम ह। यह एक चीज़ है।‘

रमानाथ—‘हां, है तो सुंदिर, मगर भाई ऐसा न हो, िक कल ही से दिाम का तकाजा करने लगो। मैं खुदि ही

जहां तक हो सकेगा, जल्दिी दे दूंगा।‘

गंगू ने दिोनों चीजें दिो सुंदिर मखमली केसों में रखकर रमा को दे दिीं। िफर मुनीमजी से नाम टंकवाया और

पान िखलाकर िवदिा िकया। रमा के मनोल्लास की इस समय सीमा न थी, िकतु यह िवशुद्धि उल्लास न था, इसमें

एक शंका का भी समावेश था। यह उस बालक का आनंदि न था िजसने माता से पैसे मांगकर िमठाई ली हो;

बिल्क उस बालक का, िजसने पैसे चुराकर ली हो, उसे िमठाइयां मीठी तो लगती ह, पर िदिल कांपता रहता है िक

कहीं घर चलने पर मार न पड़ने लग। साढ़े छः सौ रूपये चुका देने की तो उसे िवशष िचता न थी, घात लग जाय

तो वह छः महीने में चुका देगा। भय यही था िक बाबूजी सुनेंग तो जरूर नाराज़ होंग, लेिकन ज्यों-ज्यों आग

बढ़ता था, जालपा को इन आभूषणों से सुशोिभत देखने की उत्कंठा इस शंका पर िवजय पाती थी। घर पहुंचने की

जल्दिी में उसने सड़क छोड़ दिी, और एक गली में घुस गया। सघन अंधेरा छाया हुआ था। बादिल तो उसी वक्त

छाए हुए थ, जब वह घर से चला था। गली में घुसा ही था, िक पानी की बूंदि िसर पर छरे की तरह पड़ी। जब

तक छतरी खोले, वह लथपथ हो चुका था। उसे शंका हुई, इस अंधकारमें कोई आकर दिोनों चीज़ं छीन न ले, पानी

की झिरझिर में कोई आवाज़ भी न सुने। अंधेरी गिलयों में खून तक हो जाते ह। पछताने लगा, नाहक इधर से

आया। दिो-चार िमनट देर ही में पहुंचता, तो ऐसी कौन-सी आफत आ जाती। असामियक वृतिष्ट ने उसकी आनंदि-

कल्पनाआं में बाधा डाल दिी। िकसी तरह गली का अंत हुआ और सड़क िमली। लालटनें िदिखाई दिीं। प्रकाश िकतनी

िवश्वास उत्पन्न करने वाली शिक्त है, आज इसका उसे यथाथर्च अनुभव हुआ। वह घर पहुंचा तो दियानाथ बैठे

हुक्का पी रहे थ। वह उस कमरे में न गया। उनकी आंख बचाकर अंदिर जाना चाहता था िक उन्होंने टोका, ‘इस

वक्त कहां गए थ?‘

रमा ने उन्हें कुछ जवाब न िदिया। कहीं वह अख़बार सुनाने लग, तो घंटों की खबर लेंग। सीधा अंदिर जा

पहुंचा। जालपा द्वार पर खड़ी उसकी राह देख रही थी, तुरंत उसके हाथ से छतरी ले ली और बोली, ‘तुम तो

िबलकुल भीग गए। कहीं ठहर क्यों न गए।‘

रमानाथ—‘पानी का क्या िठकाना, रात-भर बरसता रहे।‘

यह कहता हुआ रमा ऊपर चला गया। उसने समझिा था, जालपा भी पीछेपीछे आती होगी, पर वह नीचे

बैठी अपने देवरों से बातें कर रही थी, मानो उसे गहनों की यादि ही नहीं है। जैसे वह िबलकुल भूल गई है िक रमा

सराफे से आया है। रमा ने कपड़े बदिले और मन में झिुंझिलाता हुआ नीचे चला आया। उसी समय दियानाथ भोजन

करने आ गए। सब लोग भोजन करने बैठ गए। जालपा ने ज़ब्त तो िकया था, पर इस उत्कंठा की दिशा में आज

उससे कुछ खाया न गया। जब वह ऊपर पहुंची, तो रमा चारपाई पर लेटा हुआ था। उसे देखते ही कौतुक से

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बोला, ‘आज सराफे का जाना तो व्यथर्च ही गया। हार कहीं तैयार ही न था। बनाने को कह आया हूं। जालपा की

उत्साह से चमकती हुई मुख-छिव मिलन पड़ गई, बोली, ‘वह तो पहले ही जानती थी। बनते-बनते पांच-छः

महीने तो लग ही जाएंग।‘

रमानाथ—‘नहीं जी, बहुत जल्दि बना देगा, कसम खा रहा था।‘

जालपा—‘ऊह, जब चाहे दे! ‘

उत्कंठा की चरम सीमा ही िनराशा है। जालपा मुंह उधरकर लेटने जा रही थी, िक रमा ने ज़ोर से कहकहा

मारा। जालपा चौंक पड़ी। समझि गई, रमा ने शरारत की थी। मुस्कराती हुई बोली, ‘तुम भी बडे नटखट हो क्या

लाए?

रमानाथ—‘ कैसा चकमा िदिया?’

जालपा—‘यह तो मरदिों की आदित ही है, तुमने नई बात क्या की?’

जालपा दिोनों आभूषणों को देखकर िनहाल हो गई। ह्रदिय में आनंदि की लहर-सी उठने लगीं। वह मनोभावों

को िछपाना चाहती थी िक रमा उसे ओछी न समझिे, लेिकन एक-एक अंग िखल जाता था। मुस्कराती हुई आंखें,

दिमकते हुए कपोल और िखले हुए अधर उसका भरम गंवाए देते थ। उसने हार गले में पहना, शीशफल जूड़े में

सजाया और हषर्च से उन्मत्ति होकर बोली, ‘तुम्हें आशीवादि देती हूं, ईश्वर तुम्हारी सारी मनोकामनाएं पूरी करे।‘

आज जालपा की वह अिभलाषा पूरी हुई, जो बचपन ही से उसकी कल्पनाआं का एक स्वप्न, उसकी आशाआं का

कीडास्थल बनी हुई थी। आज उसकी वह साध पूरी हो गई। यिदि मानकी यहां होती, तो वह सबसे पहले यह हार

उसे िदिखाती और कहती, ‘तुम्हारा हार तुम्हें मुबारक हो! ‘

रमा पर घड़ों नशा चढ़ा हुआ था। आज उसे अपना जीवन सफल जान पड़ा। अपने जीवन में आज पहली

बार उसे िवजय का आनंदि प्राप्त हुआ। जालपा ने पूछा, ‘जाकर अम्मांजी को िदिखा आऊं?

रमा ने नमता से कहा, ‘अम्मां को क्या िदिखाने जाओगी। ऐसी कौन-सी बडी चीज़ं ह।

जालपा—‘अब मैं तुमसे साल-भर तक और िकसी चीज़ के िलए न कहूंगी। इसके रूपये देकर ही मेरे िदिल

का बोझि हल्का होगा।‘

रमा गवर्च से बोला, ‘रूपये की क्या िचता! ह ही िकतने! ‘

जालपा—‘ज़रा अम्मांजी को िदिखा आऊं, देखें क्या कहती ह! ‘

रमानाथ—‘मगर यह न कहना, उधार लाए ह।‘

जालपा इस तरह दिौड़ी हुई नीचे गई, मानो उसे वहां कोई िनिध िमल जायगी।

आधी रात बीत चुकी थी। रमा आनंदि की नींदि सो रहा था। जालपा ने छत पर आकर एक बार आकाश की

ओर देखा। िनमर्चल चांदिनी िछटकी हुई थी,वह काितक की चांदिनी िजसमें संगीत की शांित ह, शांित का माधुयर्च

और माधुयर्च का उन्मादिब जालपा ने कमरे में आकर अपनी संदूकची खोली और उसमें से वह कांच का चन्द्रहार

िनकाला िजसे एक िदिन पहनकर उसने अपने को धन्य माना था। पर अब इस नए चन्द्रहार के सामने उसकी

चमक उसी भांित मंदि पड़ गई थी, जैसे इस िनमर्चल चन्द्रज्योित के सामने तारों का आलोकब उसने उस नकली हार

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को तोड़ डाला और उसके दिानों को नीचे गली में गंक िदिया, उसी भांित जैसे पूजन समाप्त हो जाने के बादि कोई

उपासक िमट्टी की मूितयों को जल में िवसिजत कर देता है।

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चौदह

उस िदिन से जालपा के पित-स्नेह में सेवा-भाव का उदिय हुआ। वह स्नान करने जाता, तो उसे अपनी धोती

चुनी हुई िमलती। आले पर तेल और साबुन भी रक्खा हुआ पाता। जब दिफ्तर जाने लगता, तो जालपा उसके

कपड़े लाकर सामने रख देती। पहले पान मांगने पर िमलते थ, अब ज़बरदिस्ती िखलाए जाते थ। जालपा उसका

रूख देखा करती। उसे कुछ कहने की जरूरत न थी। यहां तक िक जब वह भोजन करने बैठता, तो वह पंखा झिला

करती। पहले वह बडी अिनच्छा से भोजन बनाने जाती थी और उस पर भी बेगार-सी टालती थी। अब बडे प्रेम

से रसोई में जाती। चीजें अब भी वही बनती थीं, पर उनका स्वादि बढ़गया था। रमा को इस मधुर स्नेह के सामने

वह दिो गहने बहुत ही तुच्छ जंचते थ।

उधर िजस िदिन रमा ने गंगू की दुर्कान से गहने ख़रीदे, उसी िदिन दूसरे सराफों को भी उसके आभूषण-प्रेम

की सूचना िमल गई। रमा जब उधर से िनकलता, तो दिोनों तरफ से दुर्कानदिार उठ-उठकर उसे सलाम करते,

‘आइए बाबूजी, पान तो खाते जाइए। दिो-एक चीज़ं हमारी दुर्कान से तो देिखए।‘

रमा का आत्म-संयम उसकी साख को और भी बढ़ाता था। यहां तक िक एक िदिन एक दिलाल रमा के घर

पर आ पहुंचा, और उसके नहीं-नहीं करने पर भी अपनी संदूकची खोल ही दिी।

रमा ने उससे पीछा छुडाने के िलए कहा, ‘भाई, इस वक्त मुझिे कुछ नहीं लेना है। क्यों अपना और मेरा

समय नष्ट करोग। दिलाल ने बडे िवनीत भाव से कहा, ‘बाबूजी, देख तो लीिजए। पसंदि आए तो लीिजएगा, नहीं

तो न लीिजएगा। देख लेने में तो कोई हजर्च नहीं है। आिखर रईसों के पास न जायं, तो िकसके पास जायं। औरों ने

आपसे गहरी रकमें मारीं, हमारे भाग्य में भी बदिा होगा, तो आपसे चार पैसा पा जाएंग। बहूजी और माईजी को

िदिखा लीिजए! मेरा मन तो कहता है िक आज आप ही के हाथों बोहनी होगी।‘

रमानाथ—‘औरतों के पसंदि की न कहो, चीज़ं अच्छी होंगी ही। पसंदि आते क्या देर लगती है, लेिकन भाई,

इस वक्त हाथ ख़ाली है।‘

दिलाल हंसकर बोला, ‘बाबूजी, बस ऐसी बात कह देते ह िक वाह! आपका हुक्म हो जाय तो हज़ार-पांच

सौ आपके ऊपर िनछावर कर दें। हम लोग आदिमी का िमज़ाज देखते ह, बाबूजी! भगवान् ने चाहा तो आज मैं

सौदिा करके ही उठूंगा।‘

दिलाल ने संदूकची से दिो चीज़ं िनकालीं, एक तो नए फैशन का जडाऊ कंगन था और दूसरा कानों का िरग

दिोनों ही चीजें अपूवर्च थीं। ऐसी चमक थी मानो दिीपक जल रहा हो दिस बजे थ, दियानाथ दिफ्तर जा चुके थ, वह

भी भोजन करने जा रहा था। समय िबलकुल न था, लेिकन इन दिोनों चीज़ों को देखकर उसे िकसी बात की सुध

ही न रही। दिोनों केस िलये हुए घर में आया। उसके हाथ में केस देखते ही दिोनों िस्त्रयां टूट पड़ीं और उन चीज़ों को

िनकाल-िनकालकर देखने लगीं। उनकी चमक-दिमक ने उन्हें ऐसा मोिहत कर िलया िक गुण-दिोष की िववेचना

करने की उनमें शिक्त ही न रही।

जागश्वरी—‘आजकल की चीज़ों के सामने तो पुरानी चीज़ं कुछ जंचती ही नहीं।

जालपा—‘मुझिे तो उन पुरानी चीज़ों को देखकर कै आने लगती है। न जाने उन िदिनों औरतें कैसे पहनती

थीं।‘

रमा ने मुस्कराकर कहा,’तो दिोनों चीज़ं पसंदि ह न?’

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जालपा—‘पसंदि क्यों नहीं ह, अम्मांजी, तुम ले लो।’

जागश्वरी ने अपनी मनोव्यथा िछपाने के िलए िसर झिुका िलया। िजसका सारा जीवन ग!हस्थी की िचताआं

में कट गया, वह आज क्या स्वप्न में भी इन गहनों के पहनने की आशा कर सकती थी! आह! उस दुर्िखया के

जीवन की कोई साध ही न पूरी हुई। पित की आय ही कभी इतनी न हुई िक बाल-बच्चों के पालन-पोषण के

उपरांत कुछ बचता। जब से घर की स्वािमनी हुई, तभी से मानो उसकी तपश्चया का आरंभ हुआ और सारी

लालसाएं एक-एक करके धूल में िमल गई। उसने उन आभूषणों की ओर से आंखें हटा लीं। उनमें इतना आकषर्चण

था िक उनकी ओर ताकते हुए वह डरती थी। कहीं उसकी िवरिक्त का परदिा न खुल जाय। बोली,’मैं लेकर क्या

करूंगी बेटी, मेरे पहनने-ओढ़ने के िदिन तो िनकल गए। कौन लाया है बेटा? क्या दिाम ह इनके?’

रमानाथ—‘एक सराफ िदिखाने लाया है, अभी दिाम-आम नहीं पूछे, मगर ऊंचे दिाम होंग। लेना तो था ही

नहीं, दिाम पूछकर क्या करता ?’

जालपा—‘लेना ही नहीं था, तो यहां लाए क्यों?’

जालपा ने यह शब्दि इतने आवेश में आकर कहे िक रमा िखिसया गया। उनमें इतनी उत्तिेजना, इतना

ितरस्कार भरा हुआ था िक इन गहनों को लौटा ले जाने की उसकी िहम्मत न पड़ी। बोला,तो ले लूं?’

जालपा—‘अम्मां लेने ही नहीं कहतीं तो लेकर क्या करोग- क्या मुफ्त में दे रहा है?’

रमानाथ—‘समझि लो मुफ्त ही िमलते ह।‘

जालपा—‘सुनती हो अम्मांजी, इनकी बातें। आप जाकर लौटा आइए। जब हाथ में रूपये होंग, तो बहुत

गहने िमलेंग।‘

जागश्वरी ने मोहासक्त स्वर में कहा,’रूपये अभी तो नहीं मांगता?’

जालपा—‘उधार भी देगा, तो सूदि तो लगा ही लेगा?’

रमानाथ—‘तो लौटा दूं- एक बात चटपट तय कर डालो। लेना हो, ले लो, न लेना हो, तो लौटा दिो। मोह

और दुर्िवधा में न पड़ो…’

जालपा को यह स्पष्ट बातचीत इस समय बहुत कठोर लगी। रमा के मुंह से उसे ऐसी आशा न थी। इंकार

करना उसका काम था, रमा को लेने के िलए आग्रह करना चािहए था। जागश्वरी की ओर लालाियत नजरों से

देखकर बोली,’लौटा दिो। रात-िदिन के तकाज़े कौन सहेगा।‘

वह केसों को बंदि करने ही वाली थी िक जागश्वरी ने कंगन उठाकर पहन िलया, मानो एक क्षण-भर पहनने

से ही उसकी साध पूरी हो जायगी। िफर मन में इस ओछेपन पर लिज्जत होकर वह उसे उतारना ही चाहती थी

िक रमा ने कहा, ‘अब तुमने पहन िलया है अम्मां, तो पहने रहो मैं तुम्हें भेंट करता हूं।‘

जागश्वरी की आंखें सजल हो गई। जो लालसा आज तक न पूरी हो सकी, वह आज रमा की मातृत-भिक्त से

पूरी हो रही थी, लेिकन क्या वह अपने िप्रय पुत्र पर ऋण का इतना भारी बोझि रख देगी ?अभी वह बेचारा

बालक है, उसकी सामथ्यर्च ही क्या है? न जाने रूपये जल्दि हाथ आएं या देर में। दिाम भी तो नहीं मालूम। अगर

ऊंचे दिामों का हुआ, तो बेचारा देगा कहां से- उसे िकतने तकाज़े सहने पड़ंग और िकतना लिज्जत होना पड़ेगा।

कातर स्वर में बोली, ‘नहीं बेटा, मैंने यों ही पहन िलया था। ले जाओ, लौटा दिो।‘

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माता का उदिास मुख देखकर रमा का ह्रदिय मातृत-प्रेम से िहल उठा। क्या ऋण के भय से वह अपनी

त्यागमूित माता की इतनी सेवा भी न कर सकेगा?माता के प्रित उसका कुछ कतर्चव्य भी तो है? बोला,रूपये बहुत

िमल जाएंग अम्मां, तुम इसकी िचता मत करो। जागश्वरी ने बहू की ओर देखा। मानो कह रही थी िक रमा मुझि

पर िकतना अत्याचार कर रहा है। जालपा उदिासीन भाव से बैठी थी। कदिािचत उसे भय हो रहा था िक माताजी

यह कंगन ले न लें। मेरा कंगन पहन लेना बहू को अच्छा नहीं लगा, इसमें जागश्वरी को संदेह नहीं रहा। उसने

तुरंत कंगन उतार डाला, और जालपा की ओर बढ़ाकर बोली,’मैं अपनी ओर से तुम्हें भेंट करती हूं, मुझिे जो कुछ

पहनना-ओढ़ना था, ओढ़-पहन चुकी। अब ज़रा तुम पहनो, देखूं,’

जालपा को इसमें ज़रा भी संदेह न था िक माताजी के पास रूपये की कमी नहीं। वह समझिी, शायदि आज

वह पसीज गई ह और कंगन के रूपए दे देंगी। एक क्षण पहले उसने समझिा था िक रूपये रमा को देने पड़ंग,

इसीिलए इच्छा रहने पर भी वह उसे लौटा देना चाहती थी। जब माताजी उसका दिाम चुका रही थीं, तो वह क्यों

इंकार करती, मगर ऊपरी मन से बोली,’ रूपये न हों, तो रहने दिीिजए अम्मांजी, अभी कौन जल्दिी है?’

रमा ने कुछ िचढ़कर कहा,’तो तुम यह कंगन ले रही हो?’

जालपा—‘अम्मांजी नहीं मानतीं, तो मैं क्या करूं?

रमानाथ—‘और ये िरग, इन्हें भी क्यों नहीं रख लेतीं?’

जालपा—‘जाकर दिाम तो पूछ आओ।

रमा ने अधीर होकर कहा,’तुम इन चीज़ों को ले जाओ, तुम्हें दिाम से क्या मतलब!’

रमा ने बाहर आकर दिलाल से दिाम पूछा तो सन्नाट में आ गया। कंगन सात सौ के थ, और िरग डेढ़ सौ के,

उसका अनुमान था िक कंगन अिधकसे-अिधक तीन सौ के होंग और िरग चालीस-पचास रूपये के, पछताए िक

पहले ही दिाम क्यों न पूछ िलए, नहीं तो इन चीज़ों को घर में ले जाने की नौबत ही क्यों आती? उधारते हुए शमर्च

आती थी, मगर कुछ भी हो, उधारना तो पड़ेगा ही। इतना बडा बोझि वह िसर पर नहीं ले सकता दिलाल से

बोला, ‘बडे दिाम ह भाई, मैंने तो तीन-चार सौ के भीतर ही आंका था।‘

दिलाल का नाम चरनदिास था। बोला,दिाम में एक कौड़ी फरक पड़ जाय सरकार, तो मुंह न िदिखाऊं। धनीराम की

कोठी का तो माल है, आप चलकर पूछ लें। दिमड़ी रूपये की दिलाली अलबत्तिा मेरी है, आपकी मरज़ी हो दिीिजए

या न दिीिजए।‘

रमानाथ—‘तो भाई इन दिामों की चीजें तो इस वक्त हमें नहीं लेनी ह।‘

चरनदिास—‘ऐसी बात न किहए, बाबूजी! आपके िलए इतने रूपये कौन बडी बात है। दिो महीने भी माल

चल जाय तो उसके दूने हाथ आ जायंग। आपसे बढ़कर कौन शौकीन होगा। यह सब रईसों के ही पसंदि की चीज़ं

ह। गंवार लोग इनकी कद्र क्या जानें।‘

रमानाथ—‘साढ़े आठ सौ बहुत होते ह भई!‘

चरनदिास—‘रूपयों का मुंह न देिखए बाबूजी, जब बहूजी पहनकर बैठंगी, तो एक िनगाह में सारे रूपये तर

जायंग।‘

रमा को िवश्वास था िक जालपा गहनों का यह मूल्य सुनकर आप ही िबचक जायगी। दिलाल से और ज्यादिा

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बातचीत न की। अंदिर जाकर बडे ज़ोर से हंसा और बोला, ‘आपने इस कंगन का क्या दिाम समझिा था, मांजी?’

जागश्वरी कोई जवाब देकर बेवकूफ न बनना चाहती थी,इन जडाऊ चीज़ों में नाप-तौल का तो कुछ

िहसाब रहता नहीं िजतने में तै हो जाय, वही ठीक है।

रमानाथ—‘अच्छा, तुम बताओ जालपा, इस कंगन का िकतना दिाम आंकती हो? ’

जालपा—‘छः सौ से कम का नहीं।’

रमा का सारा खेल िबगड़ गया। दिाम का भय िदिखाकर रमा ने जालपा को डरा देना चाहा था, मगर छः

और सात में बहुत थोडा ही अंतर था। और संभव है चरनदिास इतने ही पर राज़ी हो जाय। कुछ झिंपकर

बोला,कच्चे नगीने नहीं ह।’

जालपा—‘कुछ भी हो, छः सौ से ज्यादिा का नहीं।’

रमानाथ—‘और िरग का? ’

जालपा—‘अिधक से अिधक सौ रूपये! ’

रमानाथ—‘यहां भी चूकीं, डेढ़सौ मांगता है।’

जालपा—‘जट्टू है कोई, हमें इन दिामों लेना ही नहीं।

रमा की चाल उल्टी पड़ी, जालपा को इन चीज़ों के मूल्य के िवषय में बहुत धोखा न हुआ था। आिख़र रमा

की आिथक दिशा तो उससे िछपी न थी, िफर वह सात सौ रूपये की चीजों के िलए मुंह खोले बैठी थी। रमा को

क्या मालूम था िक जालपा कुछ और ही समझिकर कंगन पर लहराई थी। अब तो गला छूटने का एक ही उपाय

था और वह यह िक दिलाल छः सौ पर राज़ी न हो बोला, ‘वह साढ़े आठ से कौड़ी कम न लेगा।‘

जालपा—‘तो लौटा दिो।‘

रमानाथ—‘मुझिे तो लौटाते शमर्च आती है। अम्मां, ज़रा आप ही दिालान में चलकर कह दें, हमें सात सौ से

ज्यादिा नहीं देना है। देना होता तो दे दिो, नहीं चले जाओ।‘

जागश्वरी--’हां रे, क्यों नहीं, उस दिलाल से मैं बातें करने जाऊं! ‘

जालपा—‘तुम्हीं क्यों नहीं कह देते, इसमें तो कोई शमर्च की बात नहीं।‘

रमानाथ—‘मुझिसे साफ जवाब न देते बनेगा। दुर्िनया-भर की खुशामदि करेगा। चुनी चुना,आप बडे आदिमी

ह, रईस ह, राजा ह। आपके िलए डेढ़सौ क्या चीज़ है। मैं उसकी बातों में आ जाऊंगा। ‘

जालपा—‘अच्छा, चलो मैं ही कहे देती हूं।‘

रमानाथ—‘वाह, िफर तो सब काम ही बन गया।

रमा पीछे दुर्बक गया। जालपा दिालान में आकर बोली, ‘ज़रा यहां आना जी, ओ सराफ! लूटने आए हो, या

माल बेचने आए हो! ‘

चरनदिास बरामदे से उठकर द्वार पर आया और बोला, ‘क्या हुक्म है, सरकार।

जालपा—‘माल बेचने आते हो, या जटने आते हो? सात सौ रूपये कंगन के मांगते हो? ‘

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चरनदिास—‘सात सौ तो उसकी कारीगरी के दिाम ह, हूजूर! ‘

जालपा—‘अच्छा तो जो उस पर सात सौ िनछावर कर दे, उसके पास ले जाओ। िरग के डेढ़सौ कहते हो,

लूट है क्या? मैं तो दिोनों चीज़ों के सात सौ

से अिधक न दूंगी।

चरनदिास—‘बहूजी, आप तो अंधेर करती ह। कहां साढ़े आठ सौ और कहां सात सौ? ‘

जालपा—‘तुम्हारी खुशी, अपनी चीज़ ले जाओ।‘

चरनदिास—‘इतने बडे दिरबार में आकर चीज़ लौटा ले जाऊं?’ आप यों ही पहनें। दिस-पांच रूपये की बात

होती, तो आपकी ज़बान ने उधरता। आपसे झिूठ नहीं कहता बहूजी, इन चीज़ों पर पैसा रूपया नगदि है। उसी एक

पैसे में दुर्कान का भाडा, बका-खाता, दिस्तूरी, दिलाली सब समिझिए। एक बात ऐसी समझिकर किहए िक हमें भी

चार पैसे िमल जाएं ।सवेरे-सवेरे लौटना न पड़े।

जालपा—‘कह िदिए, वही सात सौ।‘

चरनदिास ने ऐसा मुंह बनाया, मानो वह िकसी धमर्च-संकट में पड़ गया है। िफर बोला—‘सरकार, है तो

घाटा ही, पर आपकी बात नहीं टालते बनती। रूपये कब िमलेंग?’

जालपा—‘जल्दिी ही िमल जायंग।’

जालपा अंदिर जाकर बोली—‘आिख़र िदिया िक नहीं सात सौ में- डेढ़सौ साफ उडाए िलए जाता था। मुझिे

पछतावा हो रहा है िक कुछ और कम क्यों न कहा। वे लोग इस तरह गाहकों को लूटते ह।’

रमा इतना भारी बोझि लेते घबरा रहा था, लेिकन पिरिस्थित ने कुछ ऐसा रंग पकडा िक बोझि उस पर लदि

ही गया। जालपा तो खुशी की उमंग में दिोनों चीजें िलये ऊपर चली गई, पर रमा िसर झिुकाए िचता में डूबा

खडाथा। जालपा ने उसकी दिशा जानकर भी इन चीज़ों को क्यों ठुकरा नहीं िदिया, क्यों ज़ोर देकर नहीं कहा—‘ मैं

न लूंगी, क्यों दुर्िवधो में पड़ी रही। साढ़े पांच सौ भी चुकाना मुिश्कल था, इतने और कहां से आएंग।‘

असल में ग़लती मेरी ही है। मुझिे दिलाल को दिरवाजे से ही दुर्त्कार देना चािहए था। लेिकन उसने मन को

समझिाया। यह अपने ही पापों का तो प्रायिश्चत है। िफर आदिमी इसीिलए तो कमाता है। रोिटयों के लाले थोड़े ही

थ? भोजन करके जब रमा ऊपर कपड़े पहनने गया, तो जालपा आईने के सामने खड़ी कानों में िरग पहन रही

थी। उसे देखते ही बोली —‘आज िकसी अच्छे का मुंह देखकर उठी थी। दिो चीज़ं मुफ्त हाथ आ गई।‘

रमा ने िवस्मय से पूछा , ‘मुफ्त क्यों? रूपये न देने पड़ंग? ‘

जालपा—‘रूपये तो अम्मांजी देंगी? ‘

रमानाथ—‘क्या कुछ कहती थीं? ‘

जालपा—‘उन्होंने मुझिे भेंट िदिए ह, तो रूपये कौन देगा? ‘

रमा ने उसके भोलेपन पर मुस्कराकर कहा, यही समझिकर तुमने यह चीज़ं ले लीं ? अम्मां को देना होता

तो उसी वक्त दे देतीं जब गहने चोरी गए थ।क्या उनके पास रूपये न थ?‘

जालपा असमंजस में पड़कर बोली, तो मुझिे क्या मालूम था। अब भी तो लौटा सकते हो कह देना, िजसके

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िलए िलया था, उसे पसंदि नहीं आया। यह कहकर उसने तुरंत कानों से िरग िनकाल िलए। कंगन भी उतार डाले

और दिोनों चीजें केस में रखकर उसकी तरफ इस तरह बढ़ाई, जैसे कोई िबल्ली चूहे से खेल रही हो वह चूहे को

अपनी पकड़ से बाहर नहीं होने देती। उसे छोड़कर भी नहीं छोड़ती। हाथों को फैलाने का साहस नहीं होता था।

क्या उसके ह्रदिय की भी यही दिशा न थी? उसके मुख पर हवाइयां उड़ रही थीं। क्यों वह रमा की ओर न देखकर

भूिम की ओर देख रही थी - क्यों िसर ऊपर न उठाती थी? िकसी संकट से बच जाने में जो हािदिक आनंदि होता

है, वह कहां था? उसकी दिशा ठीक उस माता की-सी थी, जो अपने बालक को िवदेश जाने की अनुमित दे रही हो

वही िववशता, वही कातरता, वही ममता इस समय जालपा के मुख पर उदिय हो रही थी। रमा उसके हाथ से

केसों को ले सके, इतना कडा संयम उसमें न था। उसे तकाज़े सहना, लिज्जत होना, मुंह िछपाए िफरना, िचता की

आग में जलना, सब कुछ सहना मंजूर था। ऐसा काम करना नामंजूर था िजससे जालपा का िदिल टूट जाए, वह

अपने को अभािगन समझिने लग। उसका सारा ज्ञान, सारी चेष्टा, सारा िववेक इस आघात का िवरोध करने लगा।

प्रेम और पिरिस्थितयों के संघषर्च में प्रेम ने िवजय पाई।

उसने मुस्कराकर कहा, ‘रहने दिो, अब ले िलया है, तो क्या लौटाएं। अम्मांजी भी हंसेंगी।

जालपा ने बनावटी कांपते हुए कंठ से कहा,अपनी चादिर देखकर ही पांव फैलाना चािहए। एक नई िवपित्ति

मोल लेने की क्या जरूरत है! रमा ने मानो जल में डूबते हुए कहा, ईश्वर मािलक है। और तुरंत नीचे चला गया।

हम क्षिणक मोह और संकोच में पड़कर अपने जीवन के सुख और शांित का कैसे होम कर देते ह! अगर जालपा

मोह के इस झिोंके में अपने को िस्थर रख सकती, अगर रमा संकोच के आग िसर न झिुका देता, दिोनों के ह्रदिय में

प्रेम का सच्चा प्रकाश होता, तो वे पथ-भ्रष्ट होकर सवर्चनाश की ओर न जाते। ग्यारह बज गए थ। दिफ्तर के िलए

देर हो रही थी, पर रमा इस तरह जा रहा था, जैसे कोई अपने िप्रय बंधु की दिाह-िकया करके लौट रहा हो।

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पन्द्रह

जालपा अब वह एकांतवािसनी रमणी न थी, जो िदिन-भर मुंह लपेट उदिास पड़ी रहती थी। उसे अब घर में

बैठना अच्छा नहीं लगता था। अब तक तो वह मजबूर थी, कहीं आ-जा न सकती थी। अब ईश्वर की दिया से उसके

पास भी गहने हो गए थ। िफर वह क्यों मन मारे घर में पड़ी रहती। वस्त्राभूषण कोई िमठाई तो नहीं िजसका

स्वादि एकांत में िलया जा सके। आभूषणों को संदूकची में बंदि करके रखने से क्या फायदिा। मुहल्ले या िबरादिरी में

कहीं से बुलावा आता, तो वह सास के साथ अवश्य जाती। कुछ िदिनों के बादि सास की जरूरत भी न रही। वह

अकेली आने-जाने लगी। िफर कायर्च-प्रयोजन की कैदि भी नहीं रही। उसके रूप-लावण्य, वस्त्र-आभूषण और शील-

िवनय ने मुहल्ले की िस्त्रयों में उसे जल्दिी ही सम्मान के पदि पर पहुंचा िदिया। उसके िबना मंडली सूनी रहती थी।

उसका कंठ-स्वर इतना कोमल था, भाषण इतना मधुर, छिव इतनी अनुपम िक वह मंडली की रानी मालूम होती

थी। उसके आने से मुहल्ले के नारी-जीवन में जान-सी पड़ गई। िनत्य ही कहीं-न-कहीं जमाव हो जाता। घंट-दिो

घंट गा- बजाकर या गपशप करके रमिणयां िदिल बहला िलया करतीं।कभी िकसी के घर, कभी िकसी के घर,

गागुन में पंद्रह िदिन बराबर गाना होता रहा। जालपा ने जैसा रूप पाया था, वैसा ही उदिार ह्रदिय भी पाया था।

पान-पत्तिों का ख़चर्च प्रायः उसी के मत्थ पड़ता। कभी-कभी गायनें बुलाई जातीं, उनकी सेवा-सत्कार का भार उसी

पर था। कभी-कभी वह िस्त्रयों के साथ गंगा-स्नान करने जाती, तांग का िकराया और गंगा-तट पर जलपान का

ख़चर्च भी उसके मत्थ जाता। इस तरह उसके दिो-तीन रूपये रोज़ उड़ जाते थ। रमा आदिशर्च पित था। जालपा अगर

मांगती तो प्राण तक उसके चरणों पर रख देता। रूपये की हैिसयत ही क्या थी? उसका मुंह जोहता रहता था।

जालपा उससे इन जमघटों की रोज़ चचा करती। उसका स्त्री-समाज में िकतना आदिर-सम्मान है, यह देखकर वह

फूला न समाता था।

एक िदिन इस मंडली को िसनेमा देखने की धुन सवार हुई। वहां की बहार देखकर सब-की-सब मुग्ध हो

गई। िफर तो आए िदिन िसनेमा की सैर होने लगी। रमा को अब तक िसनेमा का शौक न था। शौक होता भी तो

क्या करता। अब हाथ में पैसे आने लग थ, उस पर जालपा का आग्रह, िफर भला वह क्यों न जाता- िसनेमा-गृतह

में ऐसी िकतनी ही रमिणयां िमलतीं, जो मुंह खोले िनसंकोच हंसती-बोलती रहती थीं। उनकी आज़ादिी गुप्तरूप

से जालपा पर भी जादू डालती जाती थी। वह घर से बाहर िनकलते ही मुंह खोल लेती, मगर संकोचवश

परदेवाली िस्त्रयों के ही स्थान पर बैठती। उसकी िकतनी इच्छा होती िक रमा भी उसके साथ बैठता। आिख़र वह

उन फैशनेबुल औरतों से िकस बात में कम है? रूप-रंग में वह हेठी नहीं। सजधज में िकसी से कम नहीं। बातचीत

करने में कुशल। िफर वह क्यों परदेवािलयों के साथ बैठे। रमा बहुत िशिक्षत न होने पर भी देश और काल के

प्रभाव से उदिार था। पहले तो वह परदे का ऐसा अनन्य भक्त था, िक माता को कभी गंगा-स्नान कराने िलवा

जाता, तो पंडों तक से न बोलने देता। कभी माता की हंसी मदिाने में सुनाई देती, तो आकर िबगड़ता, तुमको ज़रा

भी शमर्च नहीं है अम्मां! बाहर लोग बैठे हुए ह, और तुम हंस रही हो, मां लिज्जत हो जाती थीं। िकतु अवस्था के

साथ रमा का यह िलहाज़ ग़ायब होता जाता था। उस पर जालपा की रूप-छटा उसके साहस को और भी

उभोिजत करती थी। जालपा रूपहीन, काली-कलूटी, फूहड़ होती तो वह ज़बरदिस्ती उसको परदे में बैठाता। उसके

साथ घूमने या बैठने में उसे शमर्च आती। जालपा-जैसी अनन्य सुंदिरी के साथ सैर करने में आनंदि के साथ गौरव भी

तो था। वहां के सभ्य समाज की कोई मिहला रूप, गठन और ऋंगारमें जालपा की बराबरी न कर सकती थी।

देहात की लडकी होने पर भी शहर के रंग में वह इस तरह रंग गई थी, मानो जन्म से शहर ही में रहती आई है।

थोड़ी-सी कमी अंग्रेज़ी िशक्षा की थी,उसे भी रमा पूरी िकए देता था। मगर परदे का यह बंधन टूट कैसे। भवन में

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रमा के िकतने ही िमत्र, िकतनी ही जान - पहचान के लोग बैठे नज़र आते थ। वे उसे जालपा के साथ बैठे देखकर

िकतना हंसेंग। आिख़र एक िदिन उसने समाज के सामने ताल ठोंककर खड़े हो जाने का िनश्चय कर ही िलया।

जालपा से बोला, ‘आज हम-तुम िसनेमाघर में साथ बैठंग।’

जालपा के ह्रदिय में गुदिगुदिी-सी होने लगी। हािदिक आनंदि की आभा चेहरे पर झिलक उठी। बोली, ‘सच!

नहीं भाई, साथवािलयां जीने न देंगी।‘

रमानाथ—‘इस तरह डरने से तो िफर कभी कुछ न होगा। यह क्या स्वांग है िक िस्त्रयां मुंह िछपाए िचक

की आड़ में बैठी रहें।‘

इस तरह यह मामला भी तय हो गया। पहले िदिन दिोनों झिंपते रहे, लेिकन दूसरे िदिन से िहम्मत खुल गई।

कई िदिनों के बादि वह समय भी आया िक रमा और जालपा संध्या समय पाकर्क में साथ-साथ टहलते िदिखाई िदिए।

जालपा ने मुस्कराकर कहा,’कहीं बाबूजी देख लें तो?’

रमानाथ—‘तो क्या, कुछ नहीं।’

जालपा—‘मैं तो मारे शमर्च के गड़ जाऊं।’

रमानाथ-अभी तो मुझिे भी शमर्च आएगी, मगर बाबूजी खुदि ही इधर न आएंग।’

जालपा-‘और जो कहीं अम्मांजी देख लें!’

रमानाथ—‘अम्मां से कौन डरता है, दिो दिलीलों में ठीक कर दूंगा।’

दिस ही पांच िदिन में जालपा ने नए मिहला-समाज में अपना रंग जमा िलया। उसने इस समाज में इस तरह

प्रवेश िकया, जैसे कोई कुशल वक्ता पहली बार पिरषदि के मंच पर आता है। िवद्वान लोग उसकी उपेक्षा करने की

इच्छा होने पर भी उसकी प्रितभा के सामने िसर झिुका देते ह। जालपा भी ‘आई, देखा और िवजय कर िलया।’

उसके सौंदियर्च में वह गिरमा, वह कठोरता, वह शान, वह तेजिस्वता थी जो कुलीन मिहलाआं के लक्षण ह। पहले

ही िदिन एक मिहला ने जालपा को चाय का िनमांण दे िदिया और जालपा इच्छा न रहने पर भी उसे अस्वीकार न

कर सकी। जब दिोनों प्राणी वहां से लौट, तो रमा ने िचितत स्वर में कहा, ‘तो कल इसकी चाय-पाटी में जाना

पड़ेगा?’

जालपा—‘क्या करती- इंकार करते भी तो न बनता था! ’

रमानाथ—‘तो सबेरे तुम्हारे िलए एक अच्छी-सी साड़ी ला दूं? ’

जालपा—‘क्या मेरे पास साड़ी नहीं है, ज़रा देर के िलए पचास-साठ रूपये खचर्च करने से फायदिा! ’

रमानाथ—‘तुम्हारे पास अच्छी साड़ी कहां है। इसकी साड़ी तुमने देखी?ऐसी ही तुम्हारे िलए भी लाऊंगा।’

जालपा ने िववशता के भाव से कहा,मुझिे साफ कह देना चािहए था िक फुरसत नहीं है।’

रमानाथ—‘िफर इनकी दिावत भी तो करनी पडेगी।’

जालपा—‘यह तो बुरी िवपित्ति गले पड़ी।’

रमानाथ—‘िवपित्ति कुछ नहीं है, िसफर्क यही ख़याल है िक मेरा मकान इस काम के लायक नहीं। मेज़,

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कुिसयां, चाय के सेट रमेश के यहां से मांग लाऊंगा, लेिकन घर के िलए क्या करूं ! ’

जालपा—‘क्या यह ज़रूरी है िक हम लोग भी दिावत कर?’

रमा ने ऐसी बात का कुछ उत्तिर न िदिया। उसे जालपा के िलए एक जूते की जोड़ी और सुंदिर कलाई की

घड़ी की िफक पैदिा हो गई। उसके पास कौड़ी भी न थी। उसका ख़चर्च रोज़ बढ़ता जाता था। अभी तक गहने वालों

को एक पैसा भी देने की नौबत न आई थी। एक बार गंगू महाराज ने इशारे से तकाजा भी िकया था, लेिकन यह

भी तो नहीं हो सकता िक जालपा फट हालों चाय- पाटी में जाय। नहीं, जालपा पर वह इतना अन्याय नहीं कर

सकता इस अवसर पर जालपा की रूप-शोभा का िसक्का बैठ जायगा। सभी तो आज चमाचम सािडयां पहने हुए

थीं। जडाऊ कंगन और मोितयों के हारों की भी तो कमी न थी, पर जालपा अपने सादे आवरण में उनसे कोसों

आग थी। उसके सामने एक भी नहीं जंचती थी। यह मेरे पूवर्च कमो का फल है िक मुझिे ऐसी सुंदिरी िमली। आिख़र

यही तो खाने-पहनने और जीवन का आनंदि उठाने के िदिन ह। जब जवानी ही में सुख न उठाया, तो बुढ़ापे में क्या

कर लेंग! बुढ़ापे में मान िलया धन हुआ ही तो क्या यौवन बीत जाने पर िववाह िकस काम का- साड़ी और घड़ी

लाने की उसे धुन सवार हो गई। रातभर तो उसने सब्र िकया। दूसरे िदिन दिोनों चीजें लाकर ही दिम िलया। जालपा

ने झिुंझिलाकर कहा, ‘मैंने तो तुमसे कहा था िक इन चीज़ों का काम नहीं है। डेढ़ सौ से कम की न होंगी?

रमानाथ—‘डेढ़सौ! इतना फजूल-ख़चर्च मैं नहीं हूं।‘

जालपा—‘डेढ़सौ से कम की ये चीज़ं नहीं ह।‘

जालपा ने घड़ी कलाई में बांधा ली और साड़ी को खोलकर मंत्रमुग्ध नजरों से देखा।

रमानाथ—‘तुम्हारी कलाई पर यह घड़ी कैसी िखल रही है! मेरे रूपये वसूल हो गए।

जालपा—‘सच बताओ, िकतने रूपये ख़चर्च हुए?

रमानाथ—‘सच बता दूं- एक सौ पैंतीस रूपये। पचहत्तिर रूपये की साड़ी, दिस के जूते और पचास की घड़ी।‘

जालपा—‘यह डेढ़ सौ ही हुए। मैंने कुछ बढ़ाकर थोड़े कहा था, मगर यह सब रूपये अदिा कैसे होंग? उस

चुडैल ने व्यथर्च ही मुझिे िनमंत्रण दे िदिया। अब मैं बाहर जाना ही छोड़ दूंगी।‘

रमा भी इसी िचता में मग्न था, पर उसने अपने भाव को प्रकट करके जालपा के हषर्च में बाधा न डाली।

बोला, सब अदिा हो जायगा। जालपा ने ितरस्कार के भाव से कहां,कहां से अदिा हो जाएगा, ज़रा सुनूं। कौड़ी तो

बचती नहीं, अदिा कहां से हो जायगा? वह तो कहो बाबूजी घर का ख़चर्च संभाले हुए ह, नहीं तो मालूम होता।

क्या तुम समझिते हो िक मैं गहने और सािडयों पर मरती हूं? इन चीज़ों को लौटा आओ। रमा ने प्रेमपूणर्च नजरों से

कहा, ‘इन चीज़ों को रख लो। िफर तुमसे िबना पूछे कुछ न लाऊंगा।‘

संध्या समय जब जालपा ने नई साड़ी और नए जूते पहने, घड़ी कलाई पर बांधी और आईने में अपनी सूरत

देखी, तो मारे गवर्च और उल्लास के उसका मुखमंडल प्रज्विलत हो उठा। उसने उन चीज़ों के लौटाने के िलए सच्चे

िदिल से कहा हो, पर इस समय वह इतना त्याग करने को तैयार न थी। संध्या समय जालपा और रमा छावनी की

ओर चले। मिहला ने केवल बंगले का नंबर बतला िदिया था। बंगला आसानी से िमल गया। गाटक पर साइनबोडर्च

था,’इन्दुर्भूषण, ऐडवोकेट, हाईकोटर्च’ अब रमा को मालूम हुआ िक वह मिहला पं. इन्दुर्भूषण की पत्नी थी।

पंिडतजी काशी के नामी वकील थ। रमा ने उन्हें िकतनी ही बार देखा था, पर इतने बडे आदिमी से पिरचय का

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सौभाग्य उसे कैसे होता! छः महीने पहले वह कल्पना भी न कर सकता था, िक िकसी िदिन उसे उनके घर

िनमंित्रत होने का गौरव प्राप्त होगा, पर जालपा की बदिौलत आज वह अनहोनी बात हो गई। वह काशी के बडे

वकील का मेहमान था। रमा ने सोचा था िक बहुत से स्त्री-पुरूष िनमंित्रत होंग, पर यहां वकील साहब और

उनकी पत्नी रतन के िसवा और कोई न था। रतन इन दिोनों को देखते ही बरामदे में िनकल आई और उनसे हाथ

िमलाकर अंदिर ले गई और अपने पित से उनका पिरचय कराया। पंिडतजी ने आरामकुसी पर लेट-ही-लेट दिोनों

मेहमानों से हाथ िमलाया और मुस्कराकर कहा, ‘क्षमा कीिजएगा बाबू साहब, मेरा स्वास्थ्य अच्छा नहीं है। आप

यहां िकसी आिफस में ह?’

रमा ने झिंपते हुए कहा,’जी हां, म्युिनिसपल आिफस में हूं। अभी हाल ही में आया हूं। कानून की तरफ जाने

का इरादिा था, पर नए वकीलों की यहां जो हालत हो रही है, उसे देखकर िहम्मत न पड़ी। ’

रमा ने अपना महत्व बढ़ाने के िलए ज़रा-सा झिूठ बोलना अनुिचत न समझिा। इसका असर बहुत अच्छा

हुआ। अगर वह साफ कह देता, ‘मैं पच्चीस रूपये का क्लकर्क हूं, तो शायदि वकील साहब उससे बातें करने में अपना

अपमान समझिते। बोले, ‘आपने बहुत अच्छा िकया जो इधर नहीं आए। वहां दिो-चार साल के बादि अच्छी जगह

पर पहुंच जाएंग, यहां संभव है दिस साल तक आपको कोई मुकदिमा ही न िमलता।‘

जालपा को अभी तक संदेह हो रहा था िक रतन वकील साहब की बेटी है या पत्नी वकील साहब की उम

साठ से नीचे न थी। िचकनी चांदि आसपास के सफेदि बालों के बीच में वारिनश की हुई लकड़ी की भांित चमक

रही थी। मूंछें साफ थीं, पर माथ की िशकन और गालों की झिुिरयां बतला रही थीं िक यात्री संसार-यात्रा से थक

गया है। आरामकुसी पर लेट हुए वह ऐसे मालूम होते थ, जैसे बरसों के मरीज़ हों! हां, रंग गोरा था, जो साठ

साल की गमीसदिी खाने पर भी उड़ न सका था। ऊंची नाक थी, ऊंचा माथा और बडी-बडी आंखें, िजनमें

अिभमान भरा हुआ था! उनके मुख से ऐसा भािसत होता था िक उन्हें िकसी से बोलना या िकसी बात का जवाब

देना भी अच्छा नहीं लगता। इसके प्रितकूल रतन सांवली, सुगिठत युवती थी, बडी िमलनसार, िजसे गवर्च ने छुआ

तक न था। सौंदियर्च का उसके रूप में कोई लक्षण न था। नाक िचपटी थी, मुख गोल, आंखें छोटी, िफर भी वह

रानी-सी लगती थी। जालपा उसके सामने ऐसी लगती थी, जैसे सूयर्चमूखी के सामने जूही का फूल। चाय आई। मेवे,

फल, िमठाई, बगर्च की कुल्फी, सब मेज़ों पर सजा िदिए गए। रतन और जालपा एक मेज़ पर बैठीं। दूसरी मेज़ रमा

और वकील साहब की थी। रमा मेज़ के सामने जा बैठा, मगर वकील साहब अभी आरामकुसी पर लेट ही हुए थ।

रमा ने मुस्कराकर वकील साहब से कहा, ‘आप भी तो आएं। ‘

वकील साहब ने लेट-लेट मुस्कराकर कहा, ‘आप शुरू कीिजए, मैं भी आया जाता हूं।‘

लोगों ने चाय पी, फल खाए, पर वकील साहब के सामने हंसते-बोलते रमा और जालपा दिोनों ही िझिझिकते

थ। िजदिािदिल बूढ़ों के साथ तो सोहबत का आनंदि उठाया जा सकता है, लेिकन ऐसे रूखे, िनजीव मनुष्य जवान

भी हों, तो दूसरों को मुदिा बना देते ह। वकील साहब ने बहुत आग्रह करने पर दिो घूंट चाय पी। दूर से बैठे तमाशा

देखते रहे। इसिलए जब रतन ने जालपा से कहा,चलो, हम लोग ज़रा बाग़ीचे की सैर कर, इन दिोनों महाशयों को

समाज और नीित की िववेचना करने दें, तो मानो जालपा के गले का गंदिा छूट गया। रमा ने िपजड़े में बंदि पक्षी

की भांित उन दिोनों को कमरे से िनकलते देखा और एक लंबी सांस ली। वह जानता िक यहां यह िवपित्ति उसके

िसर पड़ जायगी, तो आने का नाम न लेता।

वकील साहब ने मुंह िसकोड़कर पहलू बदिला और बोले, ‘मालूम नहीं, पेट में क्या हो गया है, िक कोई चीज़

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हज़म ही नहीं होती। दूध भी नहीं हज़म होता। चाय को लोग न जाने क्यों इतने शौक से पीते ह, मुझिे तो इसकी

सूरत से भी डर लगता है। पीते ही बदिन में एंठन-सी होने लगती है और आंखों से िचनगािरयां-सी िनकलने लगती

ह।‘

रमा ने कहा, ‘आपने हाज़मे की कोई दिवा नहीं की? ‘

वकील साहब ने अरूिच के भाव से कहा, ‘दिवाआं पर मुझिे रत्तिी-भर भी िवश्वास नहीं। इन वैद्यप और

डाक्टरों से ज्यादिा बेसमझि आदिमी संसार में न िमलेंग। िकसी में िनदिान की शिक्त नहीं। दिो वैद्यपों, दिो डाक्टरों के

िनदिान कभी न िमलेंग। लक्षण वही है, पर एक वैद्यप रक्तदिोष बतलाता है, दूसरा िपत्तिदिोष, एक डाक्टर फेफड़े का

सूजन बतलाता है, दूसरा आमाशय का िवकार। बस, अनुमान से दिवा की जाती है और िनदिर्चयता से रोिगयों की

गदिर्चन पर छुरी ट्ठरी जाती है। इन डाक्टरों ने मुझिे तो अब तक जहन्नुम पहुंचा िदिया होता; पर मैं उनके पंजे से

िनकल भागा। योगाभ्यास की बडी प्रशंसा सुनता हूं पर कोई ऐसे महात्मा नहीं िमलते, िजनसे कुछ सीख सकूं।

िकताबों के आधार पर कोई िकया करने से लाभ के बदिले हािन होने का डर रहता है। यहां तो आरोग्य-शास्त्र का

खंडन हो रहा था, उधार दिोनों मिहलाआं में प्रगाढ़स्नेह की बातें हो रही थीं।

रतन ने मुस्कराकर कहा, ‘मेरे पितदेव को देखकर तुम्हें बडा आश्चयर्च हुआ होगा। ‘

जालपा को आश्चयर्च ही नहीं, भम भी हुआ था। बोली, ‘वकील साहब का दूसरा िववाह होगा।

रतन, ‘हां, अभी पांच ही बरस तो हुए ह। इनकी पहली स्त्री को मरे पैंतीस वषर्च हो गए। उस समय इनकी

अवस्था कुल पच्चीस साल की थी। लोगों ने समझिाया, दूसरा िववाह कर लो, पर इनके एक लड़का हो चुका था,

िववाह करने से इंकार कर िदिया और तीस साल तक अकेले रहे, मगर आज पांच वषर्च हुए, जवान बेट का देहांत

हो गया, तब िववाह करना आवश्यक हो गया। मेरे मां-बाप न थ। मामाजी ने मेरा पालन िकया था। कह नहीं

सकती, इनसे कुछ ले िलया या इनकी सज्जनता पर मुग्ध हो गए। मैं तो समझिती हूं, ईश्वर की यही इच्छा थी,

लेिकन मैं जब से आई हूं, मोटी होती चली जाती हूं। डाक्टरों का कहना है िक तुम्हें संतान नहीं हो सकती। बहन,

मुझिे तो संतान की लालसा नहीं है, लेिकन मेरे पित मेरी दिशा देखकर बहुत दुर्खी रहते ह। मैं ही इनके सब रोगों

की जड़ हूं। आज ईश्वर मुझिे एक संतान दे दे, तो इनके सारे रोग भाग जाएंग। िकतना चाहती हूं िक दुर्बली हो

जाऊं, गरम पानी से टब-स्नान करती हूं, रोज़ पैदिल घूमने जाती हूं, घी-दूध कम खाती हूं, भोजन आधा कर िदिया

है, िजतना पिरश्रम करते बनता है, करती हूं, िफर भी िदिन-िदिन मोटी ही होती जाती हूं। कुछ समझि में नहीं

आता, क्या करूं।

जालपा—‘वकील साहब तुमसे िचढ़ते होंग? ‘

रतन, ‘नहीं बहन, िबलकुल नहीं, भूलकर भी कभी मुझिसे इसकी चचा नहीं की। उनके मुंह से कभी एक

शब्दि भी ऐसा नहीं िनकला, िजससे उनकी मनोव्यथा प्रकट होती, पर मैं जानती हूं, यह िचता उन्हें मारे डालती

है। अपना कोई बस नहीं है। क्या करूं। मैं िजतना चाहूं, ख़चर्च करूं, जैसे चाहूं रहूं, कभी नहीं बोलते। जो कुछ पाते

ह, लाकर मेरे हाथ पर रख देते ह। समझिाती हूं, अब तुम्हें वकालत करने की क्या जरूरत है, आराम क्यों नहीं

करते, पर इनसे घर पर बैठे रहा नहीं जाता। केवल दिो चपाितयों से नाता है। बहुत िज़दि की तो दिो चार दिाने

अंगूर खा िलए। मुझिे तो उन पर दिया आती है, अपने से जहां तक हो सकता है, उनकी सेवा करती हूं। आिख़र वह

मेरे ही िलए तो अपनी जान खपा रहे ह।‘

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जालपा—‘ऐसे पुरूष को देवता समझिना चािहए। यहां तो एक स्त्री मरी नहीं िक दूसरा ब्याह रच गया।

तीस साल अकेले रहना सबका काम नहीं है।‘

रतन—‘हां बहन, ह तो देवता ही। अब भी कभी उस स्त्री की चचा आ जाती है, तो रोने लगते ह। तुम्हें उनकी

तस्वीर िदिखाऊंगी। देखने में िजतने कठोर मालूम होते ह, भीतर से इनका ह्रदिय उतना ही नरम है। िकतने ही

अनाथों, िवधवाआं और ग़रीबों के महीने बांधा रक्खे ह। तुम्हारा वह कंगन तो बडा सुंदिर है! ‘

जालपा—‘हां, बडे अच्छे कारीगर का बनाया हुआ है।‘

रतन—‘मैं तो यहां िकसी को जानती ही नहीं। वकील साहब को गहनों के िलए कष्ट देने की इच्छा नहीं

होती। मामूली सुनारों से बनवाते डर लगता है, न जाने क्या िमला दें। मेरी सपत्नीजी के सब गहने रक्खे हुए ह,

लेिकन वह मुझिे अच्छे नहीं लगते। तुम बाबू रमानाथ से मेरे िलए ऐसा ही एक जोडाकंगन बनवा दिो।‘

जालपा—‘देिखए, पूछती हूं।‘

रतन—‘—‘आज तुम्हारे आने से जी बहुत खुश हुआ। िदिनभर अकेली पड़ी रहती हूं। जी घबडाया करता है।

िकसके पास जाऊं?’ िकसी से पिरचय नहीं और न मेरा मन ही चाहता है िक उनसे मौी करूं। दिो-एक मिहलाआं

को बुलाया, उनके घर गई, चाहा िक उनसे बहनापा जोड़ लूं, लेिकन उनके आचार-िवचार देखकर उनसे दूर

रहना ही अच्छा मालूम हुआ। दिोनों ही मुझिे उल्लू बनाकर जटना चाहती थीं। मुझिसे रूपये उधार ले गई और आज

तक दे रही ह। ऋंगार की चीज़ों पर मैंने उनका इतना प्रेम देखा, िक कहते लज्जा आती है। तुम घड़ी-आधा घड़ी

के िलए रोज़ चली आया करो बहन।‘

जालपा—‘वाह इससे अच्छा और क्या होगा.‘

रतन—‘मैं मोटर भेज िदिया करूंगी।‘

जालपा—‘क्या जरूरत है। तांग तो िमलते ही ह।‘

रतन—‘न-जाने क्यों तुम्हें छोड़ने को जी नहीं चाहता। तुम्हें पाकर रमानाथजी अपना भाग्य सराहते होंग।‘

जालपा ने मुस्कराकर कहा, ‘भाग्य-वाग्य तो कहीं नहीं सराहते, घुड़िकयां जमाया करते ह।‘

रतन—‘सच! मुझिे तो िवश्वास नहीं आता। लो, वह भी तो आ गए। पूछना,ऐसा दूसरा कंगन बनवा देंग।‘

जालपा—‘(रमा से) क्यों चरनदिास से कहा जाए तो ऐसा कंगन िकतने िदिन में बना देगा! रतन ऐसा ही

कंगन बनवाना चाहती ह।‘

रमा ने तत्परता से कहा—‘हां, बना क्यों नहीं सकता इससे बहुत अच्छे बना सकता है।—‘

रतन—‘इस जोड़े के क्या िलए थ? ‘

जालपा—‘आठ सौ के थ।‘

रतन—‘कोई हरज़ नहीं, मगर िबलकुल ऐसा ही हो, इसी नमूने का।‘

रमा—‘हां-हां, बनवा दूंगा। ‘

रतन— ‘मगर भाई, अभी मेरे पास रूपये नहीं ह।

रूपये के मामले में पुरूष मिहलाआं के सामने कुछ नहीं कह सकता क्या वह कह सकता है, इस वक्त मेरे

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पास रूपये नहीं ह। वह मर जाएगा, पर यह उज्र न करेगा। वह कज़र्च लेगा, दूसरों की खुशामदि करेगा, पर स्त्री के

सामने अपनी मजबूरी न िदिखाएगा। रूपये की चचा को ही वह तुच्छ समझिता है। जालपा पित की आिथक दिशा

अच्छी तरह जानती थी। पर यिदि रमा ने इस समय कोई बहाना कर िदिया होता, तो उसे बहुत बुरा मालूम होता।

वह मन में डर रही थी िक कहीं यह महाशय यह न कह बैठं, सराफ से पूछकर कहूंगा। उसका िदिल धड़क रहा था,

जब रमा ने वीरता के साथ कहा, —‘हां-हां, रूपये की कोई बात नहीं, जब चाहे दे दिीिजएगा, तो वह खुश हो

गई।

रतन—‘तो कब तक आशा करूं? ‘

रमानाथ—‘मैं आज ही सराफ से कह दूंगा, तब भी पंद्रह िदिन तो लग हीजाएंग।‘

जालपा—‘अब की रिववार को मेरे ही घर चाय पीिजएगा। ‘

रतन ने िनमंत्रण सहषर्च स्वीकार िकया और दिोनों आदिमी िवदिा हुए। घर पहुंचे, तो शाम हो गई थी। रमेश

बाबू बैठे हुए थ। जालपा तो तांग से उतरकर अंदिर चली गई, रमा रमेश बाबू के पास जाकर बोला—‘क्या

आपको आए देर हुई?

रमेश—‘नहीं, अभी तो चला आ रहा हूं। क्या वकील साहब के यहां गए थ?‘

रमा—‘जी हां, तीन रूपये की चपत पड़ गई।‘

रमेश—‘कोई हरज़ नहीं, यह रूपये वसूल हो जाएंग। बडे आदििमयों से राहरस्म हो जाय तो बुरा नहीं है,

बड़े-बडे काम िनकलते ह। एक िदिन उन लोगों को भी तो बुलाओ।‘

रमा—‘अबकी इतवार को चाय की दिावत दे आया हूं।‘

रमेश—‘कहो तो मैं भी आ जाऊं। जानते हो न वकील साहब के एक भाई इंजीिनयर ह। मेरे एक साले बहुत िदिनों

से बेकार बैठे ह। अगर वकील साहब उसकी िसफािरश कर दें, तो ग़रीब को जगह िमल जाय। तुम ज़रा मेरा

इंट्रोडक्शन करा देना, बाकी और सब मैं कर लूंगा। पाटी का इंतजाम ईश्वर ने चाहा, तो ऐसा होगा िक मेमसाहब

खुश हो जाएंगी। चाय के सेट, शीश के रंगीन गुलदिानऔर फानूस मैं ला दूंगा। कुिसयां, मेज़ं, फशर्च सब मेरे ऊपर

छोड़ दिो। न कुली की जरूरत, न मजूर की। उन्हीं मूसलचंदि को रगदूंगा।‘

रमानाथ—‘तब तो बडा मज़ा रहेगा। मैं तो बडी िचता में पडा हुआ था।‘

रमेश—‘िचता की कोई बात नहीं, उसी लौंडे को जोत दूंगा। कहूंगा, जगह चाहते हो तो कारगुजारी

िदिखाओ। िफर देखना, कैसी दिौड़-धूप करता है।‘

रमानाथ—‘अभी दिो-तीन महीने हुए आप अपने साले को कहीं नौकर रखा चुके ह न?’

रमेश—‘अजी, अभी छः और बाकी ह। पूरे सात जीव ह। ज़रा बैठ जाओ, ज़रूरी चीज़ों की सूची बना ली

जाए। आज ही से दिौड़-धूप होगी, तब सब चीजें जुटा सकूंगा। और िकतने मेहमान होंग? ’

रमानाथ—‘मेम साहब होंगी, और शायदि वकील साहब भी आएं।’

रमेश—‘यह बहुत अच्छा िकया। बहुत-से आदिमी हो जाते, तो भभ्भड़ हो जाता। हमें तो मेम साहब से काम

है। ठलुआं की खुशामदि करने से क्या फायदिा? ’

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दिोनों आदििमयों ने सूची तैयार की। रमेश बाबू ने दूसरे ही िदिन से सामान जमा करना शुरू िकया। उनकी

पहुंच अच्छे-अच्छे घरों में थी। सजावट की अच्छी-अच्छी चीज़ं बटोर लाए, सारा घर जगमगा उठा। दियानाथ भी

इन तैयािरयों में शरीक थ। चीज़ों को करीने से सजाना उनका काम था। कौन गमला कहां रक्खा जाय, कौन

तस्वीर कहां लटकाई जाय, कौन? सा गलीचा कहां िबछाया जाय, इन प्रश्नों पर तीनों मनुष्यों में घंटों वादि-

िववादि होता था। दिफ्तर जाने के पहले और दिफ्तर से आने के बादि तीनों इन्हीं कामों में जुट जाते थ। एक िदिन इस

बात पर बहस िछड़ गई िक कमरे में आईना कहां रखा जाय। दियानाथ कहते थ, इस कमरे में आईने की जरूरत

नहीं। आईना पीछे वाले कमरे में रखना चािहए। रमेश इसका िवरोध कर रहे थ। रमा दुर्िवधो में चुपचाप खडा

था। न इनकी-सी कह सकता था, न उनकी-सी।

दियानाथ—‘मैंने सैकड़ों अंगरेज़ों के ड्राइंग-ईम देखे ह, कहीं आईना नहीं देखा। आईना श्रंगार के कमरे में

रहना चािहए। यहां आईना रखना बेतुकी-सी बात है।‘

रमेश—‘मुझिे सैकड़ों अंगरेज़ों के कमरों को देखने का अवसर तो नहीं िमला है, लेिकन दिो-चार जरूर देखे ह

और उनमें आईना लगा हुआ देखा। िफर क्या यह जरूरी बात है िक इन ज़रा-ज़रा-सी बातों में भी हम अंगरेज़ों

की नकल कर- हम अंगरेज़ नहीं, िहन्दुर्स्तानी ह। िहन्दुर्स्तानी रईसों के कमरे में बड़े-बड़े आदिमकदि आईने रक्खे

जाते ह। यह तो आपने हमारे िबगड़े हुए बाबुआं कीसी बात कही, जो पहनावे में, कमरे की सजावट में, बोली में,

चाय और शराब में, चीनी की प्यािलयों में, ग़रज़ िदिखावे की सभी बातों में तो अंगरेज़ों का मुंह िचढ़ाते ह, लेिकन

िजन बातों ने अंगरेज़ों को अंगरेज़ बना िदिया है, और िजनकी बदिौलत वे दुर्िनया पर राज़ करते ह, उनकी हवा

तक नहीं छू जाती। क्या आपको भी बुढ़ापे में, अंगरेज़ बनने का शौक चराया है?‘

दियानाथ अंगरेजों की नकल को बहुत बुरा समझिते थ। यह चाय-पाटी भी उन्हें बुरी मालूम हो रही थी।

अगर कुछ संतोष था, तो यही िक दिो-चार बडे आदििमयों से पिरचय हो जायगा। उन्होंने अपनी िजदिगी में कभी

कोट नहीं पहना था। चाय पीते थ, मगर चीनी के सेट की कैदि न थी। कटोरा-कटोरी, िगलास, लोटा-तसला िकसी

से भी उन्हें आपित्ति न थी, लेिकन इस वक्त उन्हें अपना पक्ष िनभाने की पड़ी थी। बोले, ‘िहन्दुर्स्तानी रईसों के

कमरे में मेज़ं-कुिसयां नहीं होतीं, फशर्च होता है। आपने कुसी-मेज़ लगाकर इसे अंगरेज़ी ढंग पर तो बना िदिया, अब

आईने के िलए िहन्दुर्स्तािनयों की िमसाल दे रहे ह। या तो िहन्दुर्स्तानी रिखए या अंगरेज़ीब यह क्या िक आधा

तीतर आधा बटरब कोटपतलून पर चौगोिशया टोपी तो नहीं अच्छी मालूम होती! रमेश बाबू ने समझिा था िक

दियानाथ की ज़बान बंदि हो जायगी, लेिकन यह जवाब सुना तो चकराए। मैदिान हाथ से जाता हुआ िदिखाई िदिया।

बोले, ‘तो आपने िकसी अंगरेज़ के कमरे में आईना नहीं देखा- भला ऐसे दिस-पांच अंगरेजों के नाम तो बताइए?

एक आपका वही िकरंटा हेड क्लकर्क है, उसके िसवा और िकसी अंगरेज़ के कमरे में तो शायदि आपने कदिम भी न

रक्खा हो उसी िकरंट को आपने अंगरेज़ी रूिच का आदिशर्च समझि िलया है खूब! मानता हूं।‘

दियानाथ—‘यह तो आपकी ज़बान है, उसे िकरंटा, चमरेिशयन, िपलिपली जो चाहे कहें, लेिकन रंग को

छोड़कर वह िकसी बात में अंगरेज़ों से कम नहीं। और उसके पहले तो योरोिपयन था।

रमेश इसका कोई जवाब सोच ही रहे थ िक एक मोटरकार द्वार पर आकर रूकी, और रतनबाई उतरकर

बरामदे में आई। तीनों आदिमी चटपट बाहर िनकल आए। रमा को इस वक्त रतन का आना बुरा मालूम हुआ। डर

रहा था िक कहीं कमरे में भी न चली आए, नहीं तो सारी कलई खुल जाए। आग बढ़कर हाथ िमलाता हुआ

बोला, ‘आइए, यह मेरे िपता ह, और यह मेरे दिोस्त रमेश बाबू ह, लेिकन उन दिोनों सज्जनों ने न हाथ बढ़ाया

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और न जगह से िहले। सकपकाए- से खड़े रहे। रतन ने भी उनसे हाथ िमलाने की जरूरत न समझिी। दूर ही से

उनको नमस्कार करके रमा से बोली, ‘नहीं, बैठूंगी नहीं। इस वक्त फुरसत नहीं है। आपसे कुछ कहना था।‘ यह

कहते हुए वह रमा के साथ मोटर तक आई और आिहस्ता से बोली, ‘आपने सराफ से कह तो िदिया होगा? ‘

रमा ने िनःसंकोच होकर कहा, ‘जी हां, बना रहा है।‘

रतन—‘उस िदिन मैंने कहा था, अभी रूपये न दे सकूंगी, पर मैंने समझिा शायदि आपको कष्ट हो, इसिलए

रूपये मंगवा िलए। आठ सौ चािहए न?‘

जालपा ने कंगन के दिाम आठ सौ बताए थ। रमा चाहता तो इतने रूपये ले सकता था। पर रतन की

सरलता और िवश्वास ने उसके हाथ पकड़ िलए। ऐसी उदिार, िनष्कपट रमणी के साथ वह िवश्वासघात न कर

सका। वह व्यापािरयों से दिो-दिो, चार-चार आने लेते ज़रा भी न िझिझिकता था। वह जानता था िक वे सब भी

ग्राहकों को उल्ट छुरे से मूंड़ते ह। ऐसों के साथ ऐसा व्यवहार करते हुए उसकी आत्मा को लेशमात्र भी संकोच न

होता था, लेिकन इस देवी के साथ यह कपट व्यवहार करने के िलए िकसी पुराने पापी की जरूरत थी। कुछ

सकुचाता हुआ बोला,क्या जालपा ने कंगन के दिाम आठ सौ बतलाए थ? उसे शायदि यादि न रही होगी। उसके

कंगन छः सौ के ह। आप चाहें तो आठ सौ का बनवा दूं! रतन—‘नहीं, मुझिे तो वही पसंदि है। आप छः सौ का ही

बनवाइए।‘

उसने मोटर पर से अपनी थैली उठाकर सौ-सौ रूपये के छः नोट िनकाले।

रमा ने कहा, ‘ऐसी जल्दिी क्या थी, चीज़ तैयार हो जाती, तब िहसाब हो जाता।‘

रतन—‘मेरे पास रूपये खचर्च हो जाते। इसिलए मैंने सोचा, आपके िसर पर लादि आऊं। मेरी आदित है िक जो

काम करती हूं, जल्दि-से-जल्दि कर डालती हूं। िवलंब से मुझिे उलझिन होती है।‘

यह कहकर वह मोटर पर बैठ गई, मोटर हवा हो गई। रमा संदूक में रूपये रखने के िलए अंदिर चला गया,

तो दिोनों वृतद्धि'जनों में बातें होने लगीं।

रमेश—‘देखा?‘

दियानाथ—‘जी हां, आंखें खुली हुई थीं। अब मेरे घर में भी वही हवा आ रही है। ईश्वर ही बचावे।‘

रमेश—‘बात तो ऐसी ही है, पर आजकल ऐसी ही औरतों का काम है। जरूरत पड़े, तो कुछ मदिदि तो कर

सकती ह। बीमार पड़ जाओ तो डाक्टर को तो बुला ला सकती ह। यहां तो चाहे हम मर जाएं, तब भी क्या

मजाल िक स्त्री घर से बाहर पांव िनकाले।‘

दियानाथ—‘हमसे तो भाई, यह अंगरेिज़यत नहीं देखी जाती। क्या कर। संतान की ममता है, नहीं तो यही

जी चाहता है िक रमा से साफ कह दूं, भैया अपना घर अलग लेकर रहो आंख फटी, पीर गई। मुझिे तो उन मदिो

पर कोध आता है, जो िस्त्रयों को यों िसर चढ़ाते ह। देख लेना, एक िदिन यह औरत वकील साहब को दिगा देगी।‘

रमेश—‘महाशय, इस बात में मैं तुमसे सहमत नहीं हूं। यह क्यों मान लेते हो िक जो औरत बाहर आती-

जाती है, वह जरूर ही िबगड़ी हुई है? मगर रमा को मानती बहुत है। रूपये न जाने िकसिलए िदिए? ‘

दियानाथ—‘मुझिे तो इसमें कुछ गोलमाल मालूम होता है। रमा कहीं उससे कोई चाल न चल रहा हो? ‘

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इसी समय रमा भीतर से िनकला आ रहा था। अंितम वाक्य उसके कान में पड़ गया। भौंहें चढ़ाकर बोला,

‘जी हां, जरूर चाल चल रहा हूं। उसे धोखा देकर रूपये एंठ रहा हूं। यही तो मेरा पेशा है! ‘

दियानाथ ने झिंपते हुए कहा,तो इतना िबगड़ते क्यों हो, ‘मैंने तो कोई ऐसी बात नहीं कही।‘

रमानाथ—‘पक्का जािलया बना िदिया और क्या कहते?आपके िदिल में ऐसा शुबहा क्यों आया- आपने मुझिमें

ऐसी कौन?सी बात देखी, िजससे आपको यह ख़याल पैदिा हुआ- मैं ज़रा साफ-सुथरे कपड़े पहनता हूं, ज़रा नई

प्रथा के अनुसार चलता हूं, इसके िसवा आपने मुझिमें कौन?सी बुराई देखी- मैं जो कुछ ख़चर्च करता हूं, ईमान से

कमाकर ख़चर्च करता हूं। िजस िदिन धोखे और फरेब की नौबत आएगी, ज़हर खाकर प्राण दे दूंगा। हां, यह बात है

िक िकसी को ख़चर्च करने की तमीज़ होती है, िकसी को नहीं होती। वह अपनी सुबुिद्धि है, अगर इसे आप धोखेबाज़ी

समझिं, तो आपको अिख्तयार है। जब आपकी तरफ से मेरे िवषय में ऐसे संशय होने लग, तो मेरे िलए यही अच्छा

है िक मुंह में कािलख लगाकर कहीं िनकल जाऊं। रमेश बाबू यहां मौजूदि ह। आप इनसे मेरे िवषय में जो कुछ

चाहें, पूछ सकते ह। यह मेरे खाितर झिूठ न बोलेंग।‘

सत्य के रंग में रंगी हुई इन बातों ने दियानाथ को आश्वस्त कर िदिया। बोले, ‘िजस िदिन मुझिे मालूम हो

जायगा िक तुमने यह ढंग अिख्तयार िकया है, उसके पहले मैं मुंह में कािलख लगाकर िनकल जाऊंगा। तुम्हारा

बढ़ता हुआ ख़चर्च देखकर मेरे मन में संदेह हुआ था, मैं इसे िछपाता नहीं हूं, लेिकन जब तुम कह रहे हो तुम्हारी

नीयत साफ है, तो मैं संतुष्ट हूं। मैं केवल इतना ही चाहता हूं िक मेरा लड़का चाहे ग़रीब रहे, पर नीयत न

िबगाड़े। मेरी ईश्वर से यही प्राथर्चना है िक वह तुम्हें सत्पथ पर रक्खे।‘

रमेश ने मुस्कराकर कहा, ‘अच्छा, यह िकस्सा तो हो चुका, अब यह बताओ, उसने तुम्हें रूपये िकसिलए

िदिए! मैं िगन रहा था, छः नोट थ, शायदि सौ-सौ के थ।‘

रमानाथ—‘ठग लाया हूं।‘

रमेश—‘मुझिसे शरारत करोग तो मार बैठूंगा। अगर जट ही लाए हो, तो भी मैं तुम्हारी पीठ ठोकूंगा, जीते

रहो खूब जटो, लेिकन आबरू पर आंच न आने पाए । िकसी को कानोंकान ख़बर न हो ईश्वर से तो मैं डरता नहीं।

वह जो कुछ पूछेगा, उसका जवाब मैं दे लूंगा, मगर आदिमी से डरता हूं। सच बताओ, िकसिलए रूपये िदिए - कुछ

दिलाली िमलने वाली हो तो मुझिे भी शरीक कर लेना।‘

रमानाथ—‘जडाऊ कंगन बनवाने को कह गई ह।‘

रमेश—‘तो चलो, मैं एक अच्छे सराफ से बनवा दूं। यह झिंझिट तुमने बुरा मोल ले िलया। औरत का स्वभाव

जानते नहीं। िकसी पर िवश्वास तो इन्हें आता ही नहीं। तुम चाहे दिो-चार रूपये अपने पास ही से खचर्च कर दिो, पर

वह यही समझिंगी िक मुझिे लूट िलया। नेकनामी तो शायदि ही िमले, हां, बदिनामी तैयार खड़ी है।‘

रमानाथ—‘आप मूखर्च िस्त्रयों की बातें कर रहे ह। िशिक्षत िस्त्रयां ऐसी नहीं होतीं।‘

ज़रा देर बादि रमा अंदिर जाकर जालपा से बोला, ‘अभी तुम्हारी सहेली रतन आई थीं।‘

जालपा—‘सच! तब तो बडा गड़बड़ हुआ होगा। यहां कुछ तैयारी तो थी ही नहीं।‘

रमानाथ—‘कुशल यही हुई िक कमरे में नहीं आई। कंगन के रूपये देने आई थीं। तुमने उनसे शायदि आठ सौ

रूपये बताए थ। मैंने छः सौ ले िलए। ‘

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जालपा ने झिंपते हुए कहा,मैंने तो िदिल्लगी की थी। जालपा ने इस तरह अपनी सफाई तो दे दिी, लेिकन बहुत देर

तक उसकेमन में उथल-पुथल होती रही। रमा ने अगर आठ सौ रूपये ले िलए होते, तो शायदि उथल-पुथल न

होती। वह अपनी सफलता पर खुश होती, पर रमा के िववेक ने उसकी धमर्च-बुिद्धि को जगा िदिया था। वह पछता

रही थी िक मैं व्यथर्च झिूठ बोली। यह मुझिे अपने मन में िकतनी नीच समझि रहे होंग। रतन भी मुझिे िकतनी बेईमान

समझि रही होगी।

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सोलह

चाय-पाटी में कोई िवशष बात नहीं हुई। रतन के साथ उसकी एक नाते की बहन और थी। वकील साहब न

आए थ। दियानाथ ने उतनी देर के िलए घर से टल जाना ही उिचत समझिाब हां, रमेश बाबू बरामदे में बराबर

खड़े रहे। रमा ने कई बार चाहा िक उन्हें भी पाटी में शरीक कर लें, पर रमेश में इतना साहस न था। जालपा ने

दिोनों मेहमानों को अपनी सास से िमलाया। ये युवितयां उन्हें कुछ ओछी जान पड़ीं। उनका सारे घर में दिौड़ना,

धम-धम करके कोठे पर जाना, छत पर इधर-उधर उचकना, िखलिखलाकर हंसना, उन्हें हुड़दिंगपन मालूम होता

था। उनकी नीित में बहू-बेिटयों को भारी और लज्जाशील होना चािहए था। आश्चयर्च यह था िक आज जालपा भी

उन्हीं में िमल गई थी। रतन ने आज कंगन की चचा तक न की।

अभी तक रमा को पाटी की तैयािरयों से इतनी फुसर्चत नहीं िमली थी िक गंगू की दुर्कान तक जाता। उसने

समझिा था, गंगू को छः सौ रूपये दे दूंगा तो िपछले िहसाब में जमा हो जाएंग। केवल ढाई सौ रूपये और रह

जाएंग। इस नये िहसाब में छः सौ और िमलाकर िफर आठ सौ रह जाएंग। इस तरह उसे अपनी साख जमाने का

सुअवसर िमल जायगा। दूसरे िदिन रमा खुश होता हुआ गंगू की दुर्कान पर पहुंचा और रोब से बोला, ‘क्या रंगढंग है महाराज, कोई नई चीज़ बनवाई है इधर?’

रमा के टालमटोल से गंगू इतना िवरक्त हो रहा था िक आज कुछ रूपये िमलने की आशा भी उसे प्रसन्न न

कर सकी। िशकायत के ढंग से बोला, ‘बाबू साहब, चीज़ं िकतनी बनीं और िकतनी िबकीं, आपने तो दुर्कान पर

आना ही छोड़ िदिया। इस तरह की दुर्कानदिारी हम लोग नहीं करते। आठ महीने हुए, आपके यहां से एक पैसा भी

नहीं िमला।

रमानाथ—‘भाई, ख़ाली हाथ दुर्कान पर आते शमर्च आती है। हम उन लोगों में नहीं ह, िजनसे तकाज़ा करना

पड़े। आज यह छः सौ रूपये जमा कर लो, और एक अच्छा-सा कंगन तैयार कर दिो।’

गंगू ने रूपये लेकर संदूक में रखे और बोला,’बन जाएंग। बाकी रूपये कब तक िमलेंग?’

रमानाथ—‘बहुत जल्दि।’

गंगू—‘हां बाबूजी, अब िपछला साफ कर दिीिजए।’

गंगू ने बहुत जल्दि कंगन बनवाने का वचन िदिया, लेिकन एक बार सौदिा करके उसे मालूम हो गया था िक

यहां से जल्दि रूपये वसूल होने वाले नहीं। नतीजा यह हुआ िक रमा रोज़ तकाज़ा करता और गंगू रोज़ हीले करके

टालता। कभी कारीगर बीमार पड़ जाता, कभी अपनी स्त्री की दिवा कराने ससुराल चला जाता, कभी उसके लङके

बीमार हो जाते। एक महीना गुज़र गया और कंगन न बने। रतन के तकाज़ों के डर से रमा ने पाकर्क जाना छोड़

िदिया, मगर उसने घर तो देख ही रक्खा था। इस एक महीने में कई बार तकाज़ा करने आई। आिख़र जब सावन

का महीना आ गया तो उसने एक िदिन रमा से कहा, ‘वह सुअर नहीं बनाकर देता, तो तुम िकसी और कारीगर

को क्यों नहीं देते?’

रमानाथ—‘उस पाजी ने ऐसा धोखा िदिया िक कुछ न पूछो, बस रोज़ आजकल िकया करता है। मैंने बडी

भूल की जो उसे पेशगी रूपये दे िदिये। अब उससे रूपये िनकलना मुिश्कल है।‘

रतन—‘आप मुझिे उसकी दुर्कान िदिखा दिीिजए, मैं उसके बाप से वसूल कर लूंगी। तावान अलग। ऐसे

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बेईमान आदिमी को पुिलस में देना चािहए।‘

जालपा ने कहा, ‘हां और क्या सभी सुनार देर करते ह, मगर ऐसा नहीं, रूपये डकार जायं और चीज़ के

िलए महीनों दिौडाएं।

रमा ने िसर खुजलाते हुए कहा, ‘आप दिस िदिन और सब्र कर, मैं आज ही उससे रूपये लेकर िकसी दूसरे

सराफ को दे दूंगा।‘

रतन—‘आप मुझिे उस बदिमाश की दुर्कान क्यों नहीं िदिखा देते। मैं हंटर से बात करूं।‘

रमानाथ—‘कहता तो हूं। दिस िदिन के अंदिर आपको कंगन िमल जाएंग।‘

रतन—‘आप खुदि ही ढील डाले हुए ह। आप उसकी लल्लो-चप्पो की बातों में आ जाते होंग। एक बार कड़े

पड़ जाते, तो मजाल थी िक यों हीलेहवाले करता! ‘

आिख़र रतन बडी मुिश्कल से िवदिा हुई। उसी िदिन शाम को गंगू ने साफ जवाब दे िदिया,िबना आधे रूपये

िलये कंगन न बन सकेंग। िपछला िहसाब भी बेबाक हो जाना चािहए।‘

रमा को मानो गोली लग गई। बोला, ‘महाराज, यह तो भलमनसी नहीं है। एक मिहला की चीज़ है,

उन्होंने पेशगी रूपये िदिए थ। सोचो, मैं उन्हें क्या मुंह िदिखाऊंगा। मुझिसे अपने रूपयों के िलए पुरनोट िलखा लो,

स्टांप िलखा लो और क्या करोग? ‘

गंगू—‘पुरनोट को शहदि लगाकर चाटूंगा क्या? आठ-आठ महीने का उधार नहीं होता। महीना, दिो महीना

बहुत है। आप तो बडे आदिमी ह, आपके िलए पांच-छः सौ रूपये कौन बडी बात है। कंगन तैयार ह।‘

रमा ने दिांत पीसकर कहा, ‘अगर यही बात थी तो तुमने एक महीना पहले क्यों न कह दिी? अब तक मैंने

रूपये की कोई िफक की होती न!‘

गंगू—‘मैं क्या जानता था, आप इतना भी नहीं समझि रहे ह।‘

रमा िनराश होकर घर लौट आया। अगर इस समय भी उसने जालपा से सारा वृतत्तिांत साफ-साफ कह िदिया

होता तो उसे चाहे िकतना ही दुर्ःख होता, पर वह कंगन उतारकर दे देती, लेिकन रमा में इतना साहस न था। वह

अपनी आिथक किठनाइयों की दिशा कहकर उसके कोमल ह्रदिय पर आघात न कर सकता था। इसमें संदेह नहीं िक

रमा को सौ रूपये के करीब ऊपर से िमल जाते थ, और वह िकफायत करना जानता तो इन आठ महीनों में दिोनों

सराफों के कमसे- कम आधे रूपये अवश्य दे देता, लेिकन ऊपर की आमदिनी थी तो ऊपर का ख़चर्च भी था। जो कुछ

िमलता था, सैर - सपाट में ख़चर्च हो जाता और सराफों का देना िकसी एकमुश्त रकम की आशा में रूका हुआ था।

कौिडयों से रूपये बनाना विणकों का ही काम है। बाबू लोग तो रूपये की कौिडयां ही बनाते ह। कुछ रात जाने

पर रमा ने एक बार िफर सराफे का चक्कर लगाया। बहुत चाहा, िकसी सराफ को झिांसा दूं, पर कहीं दिाल न

गली। बाज़ार में बेतार की ख़बर चला करती ह।

रमा को रातभर नींदि न आई। यिदि आज उसे एक हज़ार का रूक्का िलखकर कोई पांच सौ रूपये भी दे देता

तो वह िनहाल हो जाता, पर अपनी जान?पहचान वालों में उसे ऐसा कोई नजर न आता था। अपने िमलने वालों

में उसने सभी से अपनी हवा बांधा रक्खी थी। िखलाने-िपलाने में खुले हाथों रूपया ख़चर्च करता था। अब िकस मुंह

से अपनी िवपित्ति कहे - वह पछता रहा था िक नाहक गंगू को रूपये िदिए। गंगू नािलश करने तो जाता न था। इस

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समय यिदि रमा को कोई भयंकर रोग हो जाता तो वह उसका स्वागत करता। कम-से-कम दिस-पांच िदिन की

मुहलत तो िमल जाती, मगर बुलाने से तो मौत भी नहीं आती! वह तो उसी समय आती है, जब हम उसके िलए

िबलकुल तैयार नहीं होते। ईश्वर कहीं से कोई तार ही िभजवा दे, कोई ऐसा िमत्र भी नज़र नहीं आता था, जो

उसके नाम फजी तार भेज देता। वह इन्हीं िचताआं में करवटं बदिल रहा था िक जालपा की आंख खुल गई। रमा ने

तुरंत चादिर से मुंह िछपा िलया, मानो बेखबर सो रहा है। जालपा ने धीरे से चादिर हटाकर उसका मुंह देखा और

उसे सोता पाकर ध्यान से उसका मुंह देखने लगी। जागरण और िनद्रा का अंतर उससे िछपा न रहा। उसे धीरे से

िहलाकर बोली, ‘क्या अभी तक जाग रहे हो?‘

रमानाथ—‘क्या जाने, क्यों नींदि नहीं आ रही है। पड़े-पड़े सोचता था, कुछ िदिनों के िलए कहीं बाहर चला

जाऊं। कुछ रूपये कमा लाऊं।‘

जालपा—‘मुझिे भी लेते चलोग न?‘

रमानाथ—‘तुम्हें परदेश में कहां िलये-िलये िफरूंगा? ‘

जालपा—‘तो मैं यहां अकेली रह चुकी। एक िमनट तो रहूंगी नहीं। मगर जाओग कहां? ‘

रमानाथ—‘अभी कुछ िनश्चय नहीं कर सका हूं।‘

जालपा—‘तो क्या सचमुच तुम मुझिे छोड़कर चले जाओग? मुझिसे तो एक िदिन भी न रहा जाय। मैं समझि

गई, तुम मुझिसे मुहब्बत नहीं करते। केवल मुंह देखे की प्रीित करते हो।‘

रमानाथ—‘तुम्हारे प्रेम-पाश ही ने मुझिे यहां बांधा रक्खा है। नहीं तो अब तक कभी चला गया होता।‘

जालपा—‘बातें बना रहे हो अगर तुम्हें मुझिसे सच्चा प्रेम होता, तो तुम कोई परदिा न रखते। तुम्हारे मन में

जरूर कोई ऐसी बात है, जो तुम मुझिसे िछपा रहे हो कई िदिनों से देख रही हूं, तुम िचता में डूबे रहते हो, मुझिसे

क्यों नहीं कहते। जहां िवश्वास नहीं है, वहां प्रेम कैसे रह सकता है? ‘

रमानाथ—‘यह तुम्हारा भ्रम है, जालपा! मैंने तो तुमसे कभी परदिा नहीं रखा।‘

जालपा—‘तो तुम मुझिे सचमुच िदिल से चाहते हो? ‘

रमानाथ—‘यह क्या मुंह से कहूंगा जभी! ‘

जालपा—‘अच्छा, अब मैं एक प्रश्न करती हूं। संभले रहना। तुम मुझिसे क्यों प्रेम करते हो! तुम्हें मेरी कसम

है, सच बताना।‘

रमानाथ—‘यह तो तुमने बेढब प्रश्न िकया। अगर मैं तुमसे यही प्रश्न पूछूं तो तुम मुझिे क्या जवाब दिोगी? ‘

जालपा—‘मैं तो जानती हूं।‘

रमानाथ—‘बताओ।‘

जालपा—‘तुम बतला दिो, मैं भी बतला दूं।‘

रमानाथ—‘मैं तो जानता ही नहीं। केवल इतना ही जानता हूं िक तुम मेरे रोम-रोम में रम रही हो।‘

जालपा—‘सोचकर बतलाओ। मैं आदिशर्च-पत्नी नहीं हूं, इसे मैं खूब जानती हूं। पित-सेवा अब तक मैंने नाम

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को भी नहीं की। ईश्वर की दिया से तुम्हारे िलए अब तक कष्ट सहने की जरूरत ही नहीं पड़ी। घर-गृतहस्थी का कोई

काम मुझिे नहीं आता। जो कुछ सीखा, यहीं सीखाब िफर तुम्हें मुझिसे क्यों प्रेम है? बातचीत में िनपुण नहीं। रूपरंग भी ऐसा आकषर्चक नहीं। जानते हो, मैं तुमसे क्यों प्रश्न कर रही हूं?‘

रमानाथ—‘क्या जाने भाई, मेरी समझि में तो कुछ नहीं आ रहा है।‘

जालपा—‘मैं इसिलए पूछ रही हूं िक तुम्हारे प्रेम को स्थायी बना सकूं।‘

रमानाथ—‘मैं कुछ नहीं जानता जालपा, ईमान से कहता हूं। तुममें कोई कमी है, कोई दिोष है, यह बात

आज तक मेरे ध्यान में नहीं आई, लेिकन तुमने मुझिमें कौन?सी बात देखी- न मेरे पास धन है, न रूप है। बताओ?‘

जालपा—‘बता दूं? मैं तुम्हारी सज्जनता पर मोिहत हूं। अब तुमसे क्या िछपाऊं, जब मैं यहां आई तो

यद्यपिप तुम्हें अपना पित समझिती थी, लेिकन कोई बात कहते या करते समय मुझिे िचता होती थी िक तुम उसे

पसंदि करोग या नहीं। यिदि तुम्हारे बदिले मेरा िववाह िकसी दूसरे पुरूष से हुआ होता तो उसके साथ भी मेरा यही

व्यवहार होता। यह पत्नी और पुरूष का िरवाजी नाता है, पर अब मैं तुम्हें गोिपयों के कृतष्ण से भी न बदिलूंगी।

लेिकन तुम्हारे िदिल में अब भी चोर है। तुम अब भी मुझिसे िकसी-िकसी बात में परदिा रखते हो!‘

रमानाथ—‘यह तुम्हारी केवल शंका है, जालपा! मैं दिोस्तों से भी कोई दुर्राव नहीं करता। िफर तुम तो मेरी

ह्रदियेश्वरी हो।‘

जालपा—‘मेरी तरफ देखकर बोलो, आंखें नीची करना मदिो का काम नहीं है!‘

रमा के जी में एक बार िफर आया िक अपनी किठनाइयों की कथा कह सुनाऊं, लेिकन िमथ्या गौरव ने िफर

उसकी ज़बान बंदि कर दिी। जालपा जब उससे पूछती, सराफों को रूपये देते जाते हो या नहीं, तो वह बराबर

कहता, ‘हां कुछ-न?कुछ हर महीने देता जाता हूं, पर आज रमा की दुर्बर्चलता ने जालपा के मन में एक संदेह पैदिा

कर िदिया था। वह उसी संदेह को िमटाना चाहती थी। ज़रा देर बादि उसने पूछा, ‘सराफ के तो अभी सब रूपये

अदिा न हुए होंग? ‘

रमानाथ—‘अब थोड़े ही बाकी ह।‘

जालपा—‘िकतने बाकी होंग, कुछ िहसाब-िकताब िलखते हो? ‘

रमानाथ—‘हां, िलखता क्यों नहीं। सात सौ से कुछ कम ही होंग।‘

जालपा—‘तब तो पूरी गठरी है, तुमने कहीं रतन के रूपये तो नहीं दे िदिए? ‘

रमा िदिल में कांप रहा था, कहीं जालपा यह प्रश्न न कर बैठे। आिख़र उसने यह प्रश्न पूछ ही िलया। उस

वक्त भी यिदि रमा ने साहस करके सच्ची बात स्वीकार कर ली होती तो शायदि उसके संकटों का अंत हो जाता।

जालपा एक िमनट तक अवश्य सन्नाट में आ जाती। संभव है, कोध और िनराशा के आवेश में दिो-चार कटु शब्दि

मुंह से िनकालती, लेिकन िफर शांत हो जाती। दिोनों िमलकर कोई-न? कोई युिक्त सोच िनकालते। जालपा यिदि

रतन से यह रहस्य कह सुनाती, तो रतन अवश्य मान जाती, पर हाय रे आत्मगौरव, रमा ने यह बात सुनकर ऐसा

मुंह बना िलया मानो जालपा ने उस पर कोई िनष्ठुर प्रहार िकया हो बोला, ‘रतन के रूपये क्यों देता। आज चाहूं,

तो दिो-चार हज़ार का माल ला सकता हूं। कारीगरों की आदित देर करने की होती ही है। सुनार की खटाई मशहूर

है। बस और कोई बात नहीं। दिस िदिन में या तो चीज़ ही लाऊंगा या रूपये वापस कर दूंगा, मगर यह शंका तुम्हें

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क्यों हुई? पराई रकम भला मैं अपने ख़चर्च में कैसे लाता।’

जालपा—‘कुछ नहीं, मैंने यों ही पूछा था।’

जालपा को थोड़ी देर में नींदि आ गई, पर रमा िफर उसी उधेड़बुन में पड़ा। कहां से रूपये लाए। अगर वह

रमेश बाबू से साफ-साफ कह दे तो वह िकसी महाजन से रूपये िदिला देंग, लेिकन नहीं, वह उनसे िकसी तरह न

कह सकेगा। उसमें इतना साहस न था। उसने प्रातःकाल नाश्ता करके दिफ्तर की राह ली। शायदि वहां कुछ प्रबंध

हो जाए! कौन प्रबंध करेगा, इसका उसे ध्यान न था। जैसे रोगी वैद्यप के पास जाकर संतुष्ट हो जाता है पर यह

नहीं जानता, मैं अच्छा हूंगा या नहीं। यही दिशा इस समय रमा की थी। दिफ्तर में चपरासी के िसवा और कोई न

था। रमा रिजस्टर खोलकर अंकों की जांच करने लगा। कई िदिनों से मीज़ान नहीं िदिया गया था, पर बडे बाबू के

हस्ताक्षर मौजूदि थ। अब मीज़ान िदिया, तो ढाई हजार िनकले। एकाएक उसे एक बात सूझिी। क्यों न ढाई हजार

की जगह मीज़ान दिो हजार िलख दूं। रसीदि बही की जांच कौन करता है। अगर चोरी पकड़ी भी गई तो कह दूंगा,

मीजान लगाने में गलती हो गई। मगर इस िवचार को उसने मन में िटकने न िदिया। इस भय से, कहीं िचत्ति चंचल

न हो जाए, उसने पेंिसल के अंकों पर रोशनाई उधर दिी, और रिजस्टर को दिराज में बंदि करके इधर-उधर घूमने

लगा। इक्की-दुर्क्की गािडयां आने लगीं। गाड़ीवानों ने देखा, बाबू साहब आज यहीं ह, तो सोचा जल्दिी से चुंगी

देकर छुकी पर जायं। रमा ने इस कृतपा के िलए दिस्तूरी की दूनी रकम वसूल की, और गाड़ीवानों ने शौक से दिी

क्योंिक यही मंडी का समय था और बारह-एक बजे तक चुंगीघर से फुरसत पाने की दिशा में चौबीस घंट का हजर्च

होता था, मंडी दिस-ग्यारह बजे के बादि बंदि हो जाती थी, दूसरे िदिन का इंतज़ार करना पड़ता था। अगर भाव

रूपये में आधा पाव भी िफर गया, तो सैकड़ों के मत्थ गई। दिस-पांच रूपये का बल खा जाने में उन्हें क्या आपित्ति

हो सकती थी। रमा को आज यह नई बात मालूम हुई। सोचा, आिख़र सुबह को मैं घर ही पर बैठा रहता हूं। अगर

यहां आकर बैठ जाऊं तो रोज़ दिसपांच रूपये हाथ आ जायं। िफर तो छः महीने में यह सारा झिगडासाफ हो जाय।

मान लो रोज़ यह चांदिी न होगी, पंद्रह न सही, दिस िमलेंग, पांच िमलेंग। अगर सुबह को रोज़ पांच रूपये िमल

जायं और इतने ही िदिनभर में और िमल जायं, तो पांच-छः महीने में मैंर् ऋण से मुक्त हो जाऊं। उसने दिराज़

खोलकर िफर रिजस्टर िनकाला। यह िहसाब लगा लेने के बादि अब रिजस्टर में हेर-उधर कर देना उसे इतना

भंयकर न जान पड़ा। नया रंगरूट जो पहले बंदूक की आवाज़ से चौंक पड़ता है, आग चलकर गोिलयों की वषा में

भी नहीं घबडाता। रमा दिफ्तर बंदि करके भोजन करने घर जाने ही वाला था िक एक िबसाती का ठेला आ पहुंचा।

रमा ने कहा, लौटकर चुंगी लूंगा। िबसाती ने िमकैत करनी शुरू की। उसे कोई बडा ज़रूरी काम था। आिख़र दिस

रूपये पर मामला ठीक हुआ। रमा ने चुंगी ली, रूपये जेब में रक्खे और घर चला। पच्चीस रूपये केवल दिो-ढाई

घंटों में आ गए। अगर एक महीने भी यह औसत रहे तो पल्ला पार है। उसे इतनी खुशी हुई िक वह भोजन करने

घर न गया। बाज़ार से भी कुछ नहीं मंगवाया। रूपये भुनाते हुए उसे एक रूपया कम हो जाने का ख़याल हुआ।

वह शाम तक बैठा काम करता रहा। चार रूपये और वसूल हुए। िचराग़ जले वह घर चला, तो उसके मन पर से

िचता और िनराशा का बहुत कुछ बोझि उतर चुका था। अगर दिस िदिन यही तेज़ी रही, तो रतन से मुंह चुराने की

नौबत न आएगी।

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सतरह

नौ िदिन गुजर गए। रमा रोज़ प्रातः दिफ्तर जाता और िचराग जले लौटता। वह रोज़ यही आशा लेकर जाता

िक आज कोई बडा िशकार फंस जाएगा। पर वह आशा न पूरी होती। इतना ही नहीं। पहले िदिन की तरह िफर

कभी भाग्य का सूयर्च न चमका। िफर भी उसके िलए कुछ कम श्रेय की बात नहीं थी िक नौ िदिनों में ही उसने सौ

रूपये जमा कर िलए थ। उसने एक पैसे का पान भी न खाया था। जालपा ने कई बार कहा, चलो कहीं घूम आव,

तो उसे भी उसने बातों में ही टाला। बस, कल का िदिन और था। कल आकर रतन कंगन मांगगी तो उसे वह क्या

जवाब देगा। दिफ्तर से आकर वह इसी सोच में बैठा हुआ था। क्या वह एक महीना-भर के िलए और न मान

जायगी। इतने िदिन वह और न बोलती तो शायदि वह उससे उऋण हो जाता। उसे िवश्वास था िक मैं उससे

िचकनी-चुपड़ी बातें करके राज़ी कर लूंगा। अगर उसने िज़दि की तो मैं उससे कह दूंगा, सराफ रूपये नहीं लौटाता।

सावन के िदिन थ, अंधेरा हो चला था, रमा सोच रहा था, रमेश बाबू के पास चलकर दिो-चार बािज़यां खेल आऊं,

मगर बादिलों को देख-देख रूक जाता था। इतने में रतन आ पहुंची। वह प्रसन्न न थी। उसकी मुद्रा कठोर हो रही

थी। आज वह लड़ने के िलए घर से तैयार होकर आई है और मुरव्वत और मुलाहजे की कल्पना को भी कोसों दूर

रखना चाहती है।

जालपा ने कहा, ‘ तुम खूब आई। आज मैं भी ज़रा तुम्हारे साथ घूम आऊंगी। इन्हें काम के बोझि से आजकल

िसर उठाने की भी फुसर्चत नहीं है।’

रतन ने िनष्ठुरता से कहा, ‘मुझिे आज तो बहुत जल्दि घर लौट जाना है। बाबूजी को कल की यादि िदिलाने

आई हूं।’

रमा उसका लटका हुआ मुंह देखकर ही मन में सहम रहा था। िकसी तरह उसे प्रसन्न करना चाहता था।

बडी तत्परता से बोला, ‘जी हां, खूब यादि है, अभी सराफ की दुर्कान से चला आ रहा हूं। रोज़ सुबह-शाम घंट-भर

हािज़री देता हूं, मगर इन चीज़ों में समय बहुत लगता है। दिाम तो कारीगरी के ह। मािलयत देिखए तो कुछ नहीं।

दिो आदिमी लग हुए ह, पर शायदि अभी एक हीने से कम में चीज़ तैयार न हो, पर होगी लाजवाबब जी खुश हो

जायगा।’

पर रतन ज़रा भी न िपघली। ितनककर बोली, ‘अच्छा! अभी महीना-भर और लगगा। ऐसी कारीगरी है

िक तीन महीने में पूरी न हुई! आप उससे कह दिीिजएगा मेरे रूपये वापस कर दे। आशा के कंगन देिवयां पहनती

होंगी, मेरे िलए जरूरत नहीं!’

रमानाथ—‘एक महीना न लगगा, मैं जल्दिी ही बनवा दूंगा। एक महीना तो मैंने अंदिाजन कह िदिया था।

अब थोड़ी ही कसर रह गई है। कई िदिन तो नगीने तलाश करने में लग गए।’

रतन—‘मुझिे कंगन पहनना ही नहीं है, भाई! आप मेरे रूपये लौटा दिीिजए, बस, सुनार मैंने भी बहुत देखे

ह। आपकी दिया से इस वक्त भी तीन जोड़े कंगन मेरे पास होंग, पर ऐसी धांधली कहीं नहीं देखी। ’

धांधली के शब्दि पर रमा ितलिमला उठा, ‘धांधली नहीं, मेरी िहमाकत किहए। मुझिे क्या जरूरत थी िक

अपनी जान संकट में डालता। मैंने तो पेशगी रूपये इसिलए दे िदिए िक सुनार खुश होकर जल्दिी से बना देगा। अब

आप रूपये मांग रही ह, सराफ रूपये नहीं लौटा सकता।’

रतन ने तीव्र नजरों से देखकर कहा,क्यों, रूपये क्यों न लौटाएगा? ’

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रमानाथ—‘इसिलए िक जो चीज़ आपके िलए बनाई है, उसे वह कहां बेचता िफरेगा। संभव है, साल-छः

महीने में िबक सके। सबकी पसंदि एक-सी तो नहीं होती।’

रतन ने त्योिरयां चढ़ाकर कहा,’मैं कुछ नहीं जानती, उसने देर की है, उसका दिंड भोग। मुझिे कल या तो

कंगन ला दिीिजए या रूपये। आपसे यिदि सराफ से दिोस्ती है, आप मुलािहजे और मुरव्वत के सबब से कुछ न कह

सकते हों, तो मुझिे उसकी दुर्कान िदिखा दिीिजए।नहीं आपको शमर्च आती हो तो उसका नाम बता दिीिजए, मैं पता

लगा लूंगी। वाह, अच्छी िदिल्लगी! दुर्कान नीलाम करा दूंगी। जेल िभजवा दूंगी। इन बदिमाशों से लडाई के बगैर

काम नहीं चलता।’ रमा अप्रितभ होकर ज़मीन की ओर ताकने लगा। वह िकतनी मनहूस घड़ी थी, जब उसने

रतन से रूपये िलए! बैठे-िबठाए िवपित्ति मोल ली।

जालपा ने कहा, ‘सच तो है, इन्हें क्यों नहीं सराफ की दुर्कान पर ले जाते, चीज़ आंखों से देखकर इन्हें

संतोष हो जायगा।’

रतन—‘मैं अब चीज़ लेना ही नहीं चाहती।’

रमा ने कांपते हुए कहा,’अच्छी बात है, आपको रूपये कल िमल जायंग।’

रतन—‘कल िकस वक्त?’

रमानाथ—‘दिफ्तर से लौटते वक्त लेता आऊंगा।’

रतन—‘पूरे रूपये लूंगी। ऐसा न हो िक सौ-दिो सौ रूपये देकर टाल दे।’

रमानाथ—‘कल आप अपने सब रूपये ले जाइएगा।’

यह कहता हुआ रमा मरदिाने कमरे में आया, और रमेश बाबू के नाम एक रूक्का िलखकर गोपी से

बोला,इसे रमेश बाबू के पास ले जाओ। जवाब िलखाते आना। िफर उसने एक दूसरा रूक्का िलखकर

िवश्वम्भरदिास को िदिया िक मािणकदिास को िदिखाकर जवाब लाए। िवश्वम्भर ने कहा,’पानी आ रहा है।’

रमानाथ—‘तो क्या सारी दुर्िनया बह जाएगी! दिौड़ते हुए जाओ।’

िवश्वम्भर—‘और वह जो घर पर न िमलें?’

रमानाथ—‘िमलेंग। वह इस वक्त क़हीं नहीं जाते।’

आज जीवन में पहला अवसर था िक रमा ने दिोस्तों से रूपये उधार मांग। आग्रह और िवनय के िजतने शब्दि

उसे यादि आये, उनका उपयोग िकया। उसके िलए यह िबलकुल नया अनुभव था। जैसे पत्र आज उसने िलखे, वैसे

ही पत्र उसके पास िकतनी ही बार आ चुके थ। उन पत्रों को पढ़कर उसका ह्रदिय िकतना द्रिवत हो जाता था, पर

िववश होकर उसे बहाने करने पड़ते थ। क्या रमेश बाबू भी बहाना कर जायंग- उनकी आमदिनी ज्यादिा है, ख़चर्च

कम, वह चाहें तो रूपये का इंतजाम कर सकते ह। क्या मेरे साथ इतना सुलूक भी न करग? अब तक दिोनों लङके

लौटकर नहीं आए। वह द्वार पर टहलने लगा। रतन की मोटर अभी तक खड़ी थी। इतने में रतन बाहर आई और

उसे टहलते देखकर भी कुछ बोली नहीं। मोटर पर बैठी और चल दिी। दिोनों कहां रह गए अब तक! कहीं खेलने

लग होंग। शैतान तो ह ही। जो कहीं रमेश रूपये दे दें, तो चांदिी है। मैंने दिो सौ नाहक मांग, शायदि इतने रूपये

उनके पास न हों। ससुराल वालों की नोच-खसोट से कुछ रहने भी तो नहीं पाता। मािणक चाहे तो हज़ार-पांच

सौ दे सकता है, लेिकन देखा चािहए, आज परीक्षा हो जायगी। आज अगर इन लोगों ने रूपये न िदिए, तो िफर

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बात भी न पूछूंगा। िकसी का नौकर नहीं हूं िक जब वह शतरंज खेलने को बुलायें तो दिौडाचला जाऊं। रमा िकसी

की आहट पाता, तो उसका िदिल ज़ोर से धड़कने लगता था। आिखर िवश्वम्भर लौटा, मािणक ने िलखा

था,आजकल बहुत तंग हूं। मैं तो तुम्हीं से मांगने वाला था। रमा ने पुज़ा फाड़कर फेंक िदिया। मतलबी कहीं का!

अगर सब-इंस्पेक्टर ने मांगा होता तो पुज़ा देखते ही रूपये लेकर दिौड़े जाते। ख़ैर, देखा जायगा। चुंगी के िलए

माल तो आयगा ही। इसकी कसर तब िनकल जायगी। इतने में गोपी भी लौटा। रमेश ने िलखा था,मैंने अपने

जीवन में दिोचार िनयम बना िलए ह। और बडी कठोरता से उनका पालन करता हूं। उनमें से एक िनयम यह भी

है िक िमत्रों से लेन-देन का व्यवहार न करूंगा। अभी तुम्हें अनुभव नहीं हुआ है, लेिकन कुछ िदिनों में हो जाएगा

िक जहां िमत्रों से लेन-देन शुरू हुआ, वहां मनमुटाव होते देर नहीं लगती। तुम मेरे प्यारे दिोस्त हो, मैं तुमसे

दुर्श्मनी नहीं करना चाहता। इसिलए मुझिे क्षमा करो। रमा ने इस पत्र को भी फाड़कर फेंक िदिया और कुसी पर

बैठकर दिीपक की ओर टकटकी बांधकर देखने लगा। दिीपक उसे िदिखाई देता था, इसमें संदेह है। इतनी ही

एकाग्रता से वह कदिािचत आकाश की काली, अभेध मेघ-रािश की ओर ताकता! मन की एक दिशा वह भी होती

है, जब आंखें खुली होती ह और कुछ नहीं सूझिता, कान खुले रहते ह और कुछ नहीं सुनाई देता।

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अठारह

संध्या हो गई थी, म्युिनिसपैिलटी के अहाते में सन्नाटा छा गया था। कमर्चचारी एक-एक करके जा रहे थ।

मेहतर कमरों में झिाडू लगा रहा था। चपरािसयों ने भी जूते पहनना शुरू कर िदिया था। खोंचेवाले िदिनभर की

िबकी के पैसे िगन रहे थ। पर रमानाथ अपनी कुसी पर बैठा रिजस्टर िलख रहा था। आज भी वह प्रातःकाल

आया था, पर आज भी कोई बडा िशकार न फंसा, वही दिस रूपये िमलकर रह गए। अब अपनी आबरू बचाने का

उसके पास और क्या उपाय था! रमा ने रतन को झिांसा देने की ठान ली। वह खूब जानता था िक रतन की यह

अधीरता केवल इसिलए है िक शायदि उसके रूपये मैंने ख़चर्च कर िदिए। अगर उसे मालूम हो जाए िक उसके रूपये

तत्काल िमल सकते ह, तो वह शांत हो जाएगी। रमा उसे रूपये से भरी हुई थैली िदिखाकर उसका संदेह िमटा

देना चाहता था। वह खजांची साहब के चले जाने की राह देख रहा था। उसने आज जान-बूझिकर देर की थी।

आज की आमदिनी के आठ सौ रूपये उसके पास थ। इसे वह अपने घर ले जाना चाहता था। खजांची ठीक चार

बजे उठा। उसे क्या ग़रज़ थी िक रमा से आज की आमदिनी मांगता। रूपये िगनने से ही छुट्टी िमली। िदिनभर वही

िलखते-िलखते और रूपये िगनते-िगनते बेचारे की कमर दुर्ख रही थी। रमा को जब मालूम हो गया िक खजांची

साहब दूर िनकल गए होंग, तो उसने रिजस्टर बंदि कर िदिया और चपरासी से बोला, ‘थैली उठाओ। चलकर जमा

कर आएं।’

चपरासी ने कहा, ‘खजांची बाबू तो चले गए!’

रमा ने आखें गाड़कर कहा, ‘खजांची बाबू चले गए! तुमने मुझिसे कहा क्यों नहीं- अभी िकतनी दूर गए

होंग?’

चपरासी—‘सड़क के नुक्कड़ तक पहुंचे होंग।’

रमानाथ—‘यह आमदिनी कैसे जमा होगी?’

चपरासी—‘हुकुम हो तो बुला लाऊं?’

रमानाथ—‘अजी, जाओ भी, अब तक तो कहा नहीं, अब उन्हें आधे रास्ते से बुलाने जाओग। हो तुम भी

िनरे बिछया के ताऊब आज ज्यादिा छान गए थ क्या? ख़ैर, रूपये इसी दिराज़ में रखे रहेंग। तुम्हारी िज़म्मेदिारी

रहेगी।’

चपरासी—‘नहीं बाबू साहब, मैं यहां रूपया नहीं रखने दूंगा। सब घड़ी बराबर नहीं जाती। कहीं रूपये उठ

जायं, तो मैं बेगुनाह मारा जाऊं। सुभीते का ताला भी तो नहीं है यहां।’

रमानाथ—‘तो िफर ये रूपये कहां रक्खूं?’

चपरासी—‘हुजूर, अपने साथ लेते जाएं।’

रमा तो यह चाहता ही था। एक इक्का मंगवाया, उस पर रूपयों की थैली रक्खी और घर चला। सोचता

जाता था िक अगर रतन भभकी में आ गई, तो क्या पूछना! कह दूंगा, दिो-ही-चार िदिन की कसर है। रूपये सामने

देखकर उसे तसल्ली हो जाएगी।

जालपा ने थैली देखकर पूछा,क्या कंगन न िमला?’

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रमानाथ—‘अभी तैयार नहीं था, मैंने समझिा रूपये लेता चलूं िजसमें उन्हें तस्कीन हो जाय।

जालपा—‘क्या कहा सराफ ने?’

रमानाथ—‘कहा क्या, आज-कल करता है। अभी रतन देवी आइ नहीं?’

जालपा—‘आती ही होगी, उसे चैन कहां?’

जब िचराग जले तक रतन न आई, तो रमा ने समझिा अब न आएगी। रूपये आल्मारी में रख िदिए और

घूमने चल िदिया। अभी उसे गए दिस िमनट भी न हुए होंग िक रतन आ पहुंची और आते-ही-आते बोली,कंगन तो

आ गए होंग?’

जालपा—‘हां आ गए ह, पहन लो! बेचारे कई दिफा सराफ के पास गए। अभागा देता ही नहीं, हीले-हवाले

करता है।’

रतन—‘कैसा सराफ है िक इतने िदिन से हीले-हवाले कर रहा है। मैं जानती िक रूपये झिमेले में पड़ जाएंग,

तो देती ही क्यों। न रूपये िमलते ह, न कंगन िमलता है!’

रतन ने यह बात कुछ ऐसे अिवश्वास के भाव से कही िक जालपा जल उठी। गवर्च से बोली,आपके रूपये रखे

हुए ह, जब चािहए ले जाइए। अपने बस की बात तो है नहीं। आिखर जब सराफ देगा, तभी तो लाएंग?’

रतन—‘कुछ वादिा करता है, कब तक देगा?’

जालपा—‘उसके वादिों का क्या ठीक, सैकड़ों वादे तो कर चुका है।’

रतन—‘तो इसके मानी यह ह िक अब वह चीज़ न बनाएगा?’

जालपा—‘जो चाहे समझि लो!’

रतन—‘तो मेरे रूपये ही दे दिो, बाज आई ऐसे कंगन से।’

जालपा झिमककर उठी, आल्मारी से थैली िनकाली और रतन के सामने पटककर बोली, ‘ये आपके रूपये

रखे ह, ले जाइए।’

वास्तव में रतन की अधीरता का कारण वही था, जो रमा ने समझिा था। उसे भ्रम हो रहा था िक इन

लोगों ने मेरे रूपये ख़चर्च कर डाले। इसीिलए वह बार-बार कंगन का तकाजा करती थी। रूपये देखकर उसका भ्रम

शांत हो गया। कुछ लिज्जत होकर बोली, ‘अगर दिो-चार िदिन में देने का वादिा करता हो तो रूपये रहने दिो।’

जालपा—‘मुझिे तो आशा नहीं है िक इतनी जल्दि दे दे। जब चीज़ तैयार हो जायगी तो रूपये मांग िलए

जाएंग।’

रतन—‘क्या जाने उस वक्त मेरे पास रूपये रहें या न रहें। रूपये आते तो िदिखाई देते ह, जाते नहीं िदिखाई

देते। न जाने िकस तरह उड़ जाते ह। अपने ही पास रख लो तो क्या बुरा?’

जालपा—‘तो यहां भी तो वही हाल है। िफर पराई रकम घर में रखना जोिखम की बात भी तो है। कोई

गोलमाल हो जाए, तो व्यथर्च का दिंड देना पड़े। मेरे ब्याह के चौथ ही िदिन मेरे सारे गहने चोरी चले गए। हम लोग

जागते ही रहे, पर न जाने कब आंख लग गई, और चोरों ने अपना काम कर िलया। दिस हज़ार की चपत पड़ गई।

कहीं वही दुर्घर्चटना िफर हो जाय तो कहीं के न रहें।’

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रतन—‘अच्छी बात है, मैं रूपये िलये जाती हूं; मगर देखना िनिश्चन्त न हो जाना। बाबूजी से कह देना

सराफ का िपड न छोड़ं।’

रतन चली गई। जालपा खुश थी िक िसर से बोझि टला। बहुधा हमारे जीवन पर उन्हीं के हाथों कठोरतम

आघात होता है, जो हमारे सच्चे िहतैषी होते ह। रमा कोई नौ बजे घूमकर लौटा, जालपा रसोई बना रही थी।

उसे देखते ही बोली, ‘रतन आई थी, मैंने उसके सब रूपये दे िदिए।’

रमा के पैरों के नीचे से िमट्टी िखसक गई। आंखें फैलकर माथ पर जा पहुंचीं। घबराकर बोला, ‘क्या कहा,

रतन को रूपये दे िदिए? तुमसे िकसने कहा था िक उसे रूपये दे देना?’

जालपा—‘उसी के रूपये तो तुमने लाकर रक्खे थ। तुम खुदि उसका इंतजार करते रहे। तुम्हारे जाते ही वह

आई और कंगन मांगने लगी। मैंने झिल्लाकर उसके रूपये फेंक िदिए।

रमा ने सावधन होकर कहा, ‘उसने रूपये मांग तो न थ?’

जालपा—‘मांग क्यों नहीं। हां, जब मैंने दे िदिए तो अलबत्तिा कहने लगी, इसे क्यों लौटाती हो, अपने पास

ही पडारहने दिो। मैंने कह िदिया, ऐसे शक्की िमज़ाज वालों का रूपया मैं नहीं रखती।’

रमानाथ—‘ईश्वर के िलए तुम मुझिसे िबना पूछे ऐसे काम मत िकया करो।’

जालपा—‘तो अभी क्या हुआ, उसके पास जाकर रूपये मांग लाओ, मगर अभी से रूपये घर में लाकर अपने

जी का जंजाल क्यों मोल लोग।’

रमा इतना िनस्तेज हो गया िक जालपा पर िबगड़ने की भी शिक्त उसमें न रही। रूआंसा होकर नीचे चला

गया और िस्थित पर िवचार करने लगा। जालपा पर िबगड़ना अन्याय था। जब रमा ने साफ कह िदिया िक ये

रूपये रतन के ह, और इसका संकेत तक न िकया िक मुझिसे पूछे बगैर रतन को रूपये मत देना, तो जालपा का

कोई अपराध नहीं। उसने सोचा,इस समय झिल्लाने और िबगड़ने से समस्या हल न होगी। शांत िचत्ति होकर

िवचार करने की आवश्यकता थी। रतन से रूपये वापस लेना अिनवायर्च था। िजस समय वह यहां आई है, अगर मैं

खुदि मौजूदि होता तो िकतनी खूबसूरती से सारी मुिश्कल आसान हो जाती। मुझिको क्या शामत सवार थी िक

घूमने िनकला! एक िदिन न घूमने जाता, तो कौन मरा जाता था! कोई गुप्त शिक्त मेरा अिनष्ट करने पर उताई हो

गई है। दिस िमनट की अनुपिस्थित ने सारा खेल िबगाड़ िदिया। वह कह रही थी िक रूपये रख लीिजए। जालपा ने

ज़रा समझि से काम िलया होता तो यह नौबत काहे को आती। लेिकन िफर मैं बीती हुई बातें सोचने लगा। समस्या

है, रतन से रूपये वापस कैसे िलए जाएं ।क्यों न चलकर कहूं, रूपये लौटाने से आप नाराज हो गई ह। असल में मैं

आपके िलए रूपये न लाया था। सराफ से इसिलए मांग लाया था, िजसमें वह चीज़ बनाकर दे दे। संभव है, वह

खुदि ही लिज्जत होकर क्षमा मांग और रूपये दे दे। बस इस वक्त वहां जाना चािहए।

यह िनश्चय करके उसने घड़ी पर नज़र डाली। साढ़े आठ बजे थ। अंधकार छाया हुआ था। ऐसे समय रतन

घर से बाहर नहीं जा सकती। रमा ने साइिकल उठाई और रतन से िमलने चला।

रतन के बंगले पर आज बडी बहार थी। यहां िनत्य ही कोई-न-कोई उत्सव, दिावत, पाटी होती रहती थी।

रतन का एकांत नीरस जीवन इन िवषयों की ओर उसी भांित लपकता था, जैसे प्यासा पानी की ओर लपकता है।

इस वक्त वहां बच्चों का जमघट था। एक आम के वृतक्ष में झिूला पडा था, िबजली की बित्तियां जल रही थीं, बच्चे

झिूला झिूल रहे थ और रतन खड़ी झिुला रही थी। हू-हा मचा हुआ था। वकील साहब इस मौसम में भी ऊनी

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ओवरकोट पहने बरामदे में बैठे िसगार पी रहे थ। रमा की इच्छा हुई, िक झिूले के पास जाकर रतन से बातें करे,

पर वकील साहब को खड़े देखकर वह संकोच के मारे उधर न जा सका। वकील साहब ने उसे देखते ही हाथ बढ़ा

िदिया और बोले, ‘आओ रमा बाबू, कहो, तुम्हारे म्युिनिसपल बोडर्च की क्या खबर ह?’

रमा ने कुसी पर बैठते हुए कहा, ‘कोई नई बात तो नहीं हुई।‘

वकील,--‘आपके बोडर्च में लड़िकयों की अिनवायर्च िशक्षा का प्रस्ताव कब पास होगा? और कई बोडोऊ ने तो

पास कर िदिया। जब तक िस्त्रयों की िशक्षा का काफी प्रचार न होगा, हमारा कभी उद्धिार न होगा। आप तो योरप

न गए होंग? ओह! क्या आज़ादिी है, क्या दिौलत है, क्या जीवन है, क्या उत्साह है! बस मालूम होता है, यही स्वगर्च

है। और िस्त्रयां भी सचमुच देिवयां ह। इतनी

हंसमुख, इतनी स्वच्छंदि, यह सब स्त्री-िशक्षा का प्रसादि है! ‘

रमा ने समाचार-पत्रों में इन देशों का जो थोडा-बहुत हाल पढ़ा था, उसके आधार पर बोला,वहां िस्त्रयों

का आचरण तो बहुत अच्छा नहीं है।‘

वकील--‘नान्सेसं ! अपने-अपने देश की प्रथा है। आप एक युवती को िकसी युवक के साथ एकांत में िवचरते

देखकर दिांतों तले उंगली दिबाते ह। आपका अंप्तःकरण इतना मिलन हो गया है िक स्त्री-पुरूष को एक जगह

देखकर आप संदेह िकए िबना रह ही नहीं सकते, पर जहां लङके और लड़िकयां एक साथ िशक्षा पाते ह, वहां यह

जाित-भेदि बहुत महत्व की वस्तु नहीं रह जाती,आपस में स्नेह और सहानुभूित की इतनी बातें पैदिा हो जाती ह िक

कामुकता का अंश बहुत थोडारह जाता है। यह समझि लीिजए िक िजस देश में िस्त्रयों की िजतनी अिधक

स्वाधीनता है, वह देश उतना ही सभ्य है। िस्त्रयों को कैदि में, परदे में, या पुरूषों से कोसों दूर रखने का तात्पयर्च

यही िनकलता है िक आपके यहां जनता इतनी आचार-भ्रष्ट है िक िस्त्रयों का अपमान करने में ज़रा भी संकोच

नहीं करती। युवकों के िलए राजनीित, धमर्च, लिलत-कला, सािहत्य, दिशर्चन, इितहास, िवज्ञान और हज़ारों ही ऐसे

िवषय ह, िजनके आधार पर वे युवितयों से गहरी दिोस्ती पैदिा कर सकते ह। कामिलप्सा उन देशों के िलए आकषर्चण

का प्रधान िवषय है, जहां लोगों की मनोवृतित्तियां संकुिचत रहती ह। मैं सालभर योरप और अमरीका में रह चुका

हूं। िकतनी ही सुंदििरयों के साथ मेरी दिोस्ती थी। उनके साथ खेला हूं, नाचा भी हूं, पर कभी मुंह से ऐसा शब्दि न

िनकलता था, िजसे सुनकर िकसी युवती को लज्जा से िसर झिुकाना पड़े, और िफर अच्छे और बुरे कहां नहीं ह?’

रमा को इस समय इन बातों में कोई आनंदि न आया, वह तो इस समय दूसरी ही िचता में मग्न था। वकील साहब

ने िफर कहा,जब तक हम स्त्री-पुरूषों को अबाध रूप से अपना-अपना मानिसक िवकास न करने देंग, हम अवनित

की ओर िखसकते चले जाएंग। बंधनों से समाज का पैर न बांिधए, उसके गले में कैदिी की जंजीर न डािलए।

िवधवा-िववाह का प्रचार कीिजए, खूब ज़ोरों से कीिजए, लेिकन यह बात मेरी समझि में नहीं आती िक जब कोई

अधेड़ आदिमी िकसी युवती से ब्याह कर लेता है तो क्यों अख़बारों में इतना कुहराम मच जाता है। युरोप में अस्सी

बरस के बूढ़े युवितयों से ब्याह करते ह, सत्तिर वषर्च की वृतद्धिाएं युवकों से िववाह करती ह, कोई कुछ नहीं कहता।

िकसी को कानोंकान ख़बर भी नहीं होती। हम बूढ़ों को मरने के पहले ही मार डालना चाहते ह। हालांिक मनुष्य

को कभी िकसी सहगािमनी की जरूरत होती है तो वह बुढ़ापे में, जब उसे हरदिम िकसी अवलंब की इच्छा होती

है, जब वह परमुखापेक्षी हो जाता है। रमा का ध्यान झिूले की ओर था। िकसी तरह रतन से दिो-दिो बातें करने का

अवसर िमले। इस समय उसकी सबसे बडी यही कामना थी। उसका वहां जाना िशष्टाचार के िवरूद्धि था। आिख़र

उसने एक क्षण के बादि झिूले की ओर देखकर कहा, ‘ये इतने लङके िकधर से आ गए?’

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वकील—‘रतन बाई को बाल-समाज से बडा स्नेह है। न जाने कहां?कहां से इतने लङके जमा हो जाते ह।

अगर आपको बच्चों से प्यार हो, तो जाइए! रमा तो यह चाहता ही था, चट झिूले के पास जा पहुंचा। रतन उसे

देखकर मुस्कराई और बोली, ‘इन शैतानों ने मेरी नाक में दिम कर रक्खा है। झिूले से इन सबों का पेट ही नहीं

भरता। आइए, ज़रा आप भी बेगार कीिजए, मैं तो थक गई। यह कहकर वह पक्के चबूतरे पर बैठ गई। रमा झिोंके

देने लगा। बच्चों ने नया आदिमी देखा, तो सब-के-सब अपनी बारी के िलए उतावले होने लग। रतन के हाथों दिो

बािरयां आ चुकी थीं? पर यह कैसे हो सकता था िक कुछ लङके तो तीसरी बार झिूलें, और बाकी बैठे मुंह ताकें!

दिो उतरते तो चार झिूले पर बैठ जाते। रमा को बच्चों से नाममात्र को भी प्रेम न था पर इस वक्त फंस गया था,

क्या करता! आिख़र आधा घंट की बेगार के बादि उसका जी ऊब गया। घड़ी में साढ़े नौ बज रहे थ। मतलब की

बात कैसे छेड़े। रतन तो झिूले में इतनी मग्न थी, मानो उसे रूपयों की सुध ही नहीं है। सहसा रतन ने झिूले के पास

जाकर कहा, ‘बाबूजी, मैं बैठती हूं, मुझिे झिुलाइए, मगर नीचे से नहीं, झिूले पर खड़े होकर पेंग मािरए।’

रमा बचपन ही से झिूले पर बैठते डरता था। एक बार िमत्रों ने जबरदिस्ती झिूले पर बैठा िदिया, तो उसे

चक्कर आने लगा, पर इस अनुरोध ने उसे झिूले पर आने के िलए मजबूर कर िदिया। अपनी अयोग्यता कैसे प्रकट

करे। रतन दिो बच्चों को लेकर बैठ गई, और यह गीत गाने लगी,

कदिम की डिरया झिूला पड़ गयो री, राधा रानी झिूलन आई।

रमा झिूले पर खडा होकर पेंग मारने लगा, लेिकन उसके पांव कांप रहे थ, और िदिल बैठा जाता था। जब

झिूला ऊपर से िफरता था, तो उसे ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई तरल वस्तु उसके वक्ष में चुभती चली जा रही

है,और रतन लड़िकयों के साथ गा रही थी,

कदिम की डिरया झिूला पड़ गयो री, राधा रानी झिूलन आई।

एक क्षण के बादि रतन ने कहा, ‘ज़रा और बढ़ाइए साहब, आपसे तो झिूला बढ़ता ही नहीं।’

रमा ने लिज्जत होकर और ज़ोर लगाया पर झिूला न बढ़ा, रमा के िसर में चक्कर आने लगा।

रतन—‘आपको पेंग मारना नहीं आता, कभी झिूला नहीं झिूले?’

रमा ने िझिझिकते हुए कहा, ‘हां, इधर तो वषो से नहीं बैठा।’

रतन—‘तो आप इन बच्चों को संभालकर बैिठए, मैं आपको झिुलाऊंगी।’

अगर उस डाल से न छू ले तो किहएगा! रमा के प्राण सूख गए। बोला,आजतो बहुत देर हो गई है, िफर

कभी आऊंगा। ’

रतन—‘अजी अभी क्या देर हो गई है, दिस भी नहीं बजे, घबडाइए नहीं, अभी बहुत रात पड़ी है। खूब

झिूलकर जाइएगा। कल जालपा को लाइएगा, हम दिोनों झिूलेंग।’

रमा झिूले पर से उतर आया तो उसका चेहरा सहमा हुआ था। मालूम होता था, अब िगरा, अब िगरा। वह

लड़खडाता हुआ साइिकल की ओर चला और उस पर बैठकर तुरंत घर भागा। कुछ दूर तक उसे कुछ होश न रहा।

पांव आप ही आप पैडल घुमाते जाते थ, आधी दूर जाने के बादि उसे होश आया। उसने साइिकल घुमा दिी, कुछ दूर

चला, िफर उतरकर सोचने लगा,आज संकोच में पड़कर कैसी बाज़ी हाथ से खोई, वहां से चुपचाप अपना-सा मुंह

िलये लौट आया। क्यों उसके मुंह से आवाज़ नहीं िनकली। रतन कुछ हौवा तो थी नहीं, जो उसे खा जाती। सहसा

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उसे यादि आया, थैली में आठ सौ रूपये थ, जालपा ने झिुंझिलाकर थैली की थैली उसके हवाले कर दिी। शायदि, उसने

भी िगना नहीं, नहीं जरूर कहती। कहीं ऐसा न हो, थैली िकसी को दे दे, या और रूपयों में िमला दे, तो गजब ही

हो जाए। कहीं का न रहूं। क्यों न इसी वक्त चलकर बेशी रूपये मांग लाऊं, लेिकन देर बहुत हो गई है, सबेरे िफर

आना पड़ेगा। मगर यह दिो सौ रूपये िमल भी गए, तब भी तो पांच सौ रूपयों की कमी रहेगी। उसका क्या प्रबंध

होगा? ईश्वर ही बेडा पार लगाएं तो लग सकता है।

सबेरे कुछ प्रबंध न हुआ, तो क्या होगा! यह सोचकर वह कांप उठा। जीवन में ऐसे अवसर भी आते ह, जब

िनराशा में भी हमें आशा होती है। रमा ने सोचा, एक बार िफर गंगू के पास चलूं, शायदि दुर्कान पर िमल जाय,

उसके हाथ-पांव जोडूं। संभव है, कुछ दिया आ जाय। वह सराफे जा पहुंचा मगर गंगू की दुर्कान बंदि थी। वह लौटा

ही था िक चरनदिास आता हुआ िदिखाई िदिया।

रमा को देखते ही बोला,बाबूजी, आपने तो इधर का रास्ता ही छोड़ िदिया। किहए रूपये कब तक िमलेंग?’

रमा ने िवनम भाव से कहा, ‘अब बहुत जल्दि िमलेंग भाई, देर नहीं है। देखो गंगू के रूपये चुकाए ह, अब

की तुम्हारी बारी है।’

चरनदिास, ‘वह सब िकस्सा मालूम है, गंगू ने होिशयारी से अपने रूपये न ले िलये होते, तो हमारी तरह

टापा करते। साल-भर हो रहा है। रूपये सैकड़े का सूदि भी रिखए तो चौरासी रूपये होते ह। कल आकर िहसाब

कर जाइए, सब नहीं तो आधा-ितहाई कुछ दे दिीिजए।लेते-देते रहने से मािलक को ढाढ़स रहता है। कान में तेल

डालकर बैठे रहने से तो उसे शंका होने लगती है िक इनकी नीयत ख़राब है। तो कल कब आइएगा?’

रमानाथ—‘भई, कल मैं रूपये लेकर तो न आ सकूंगा, यों जब कहो तब चला आऊं। क्यों, इस वक्त अपने

सेठजी से चार-पांच सौ रूपयों का बंदिोबस्त न करा दिोग?’तुम्हारी मुट्ठी भी गमर्च कर दूंगा। ’

चरनदिास—‘कहां की बात िलये िफरते हो बाबूजी, सेठजी एक कौड़ी तो देंग नहीं। उन्होंने यही बहुत सलूक

िकया िक नािलश नहीं कर दिी। आपके पीछे मुझिे बातें सुननी पड़ती ह। क्या बडे मुंशीजी से कहना पड़ेगा?’

रमा ने झिल्लाकर कहा, ‘तुम्हारा देनदिार मैं हूं, बडे मुंशी नहीं ह। मैं मर नहीं गया हूं, घर छोड़कर भागा

नहीं जाता हूं। इतने अधीर क्यों हुए जाते हो? ’

चरनदिास—‘साल-भर हुआ, एक कौड़ी नहीं िमली, अधीर न हों तो क्या हों। कल कम-से-कम दिो सौ की

िगकर कर रिखएगा।’

रमानाथ—‘मैंने कह िदिया, मेरे पास अभी रूपये नहीं ह।’

चरनदिास—‘रोज़ गठरी काट-काटकर रखते हो, उस पर कहते हो, रूपये नहीं ह। कल रूपये जुटा रखना।

कल आदिमी जाएगा जरूर।’

रमा ने उसका कोई जवाब न िदिया, आग बढ़ा। इधर आया था िक कुछ काम िनकलेगा, उल्ट तकाज़ा सहना

पड़ा। कहीं दुर्ष्ट सचमुच बाबूजी के पास तकाज़ा न भेज दे। आग ही हो जायंग। जालपा भी समझिेगी, कैसा

लबािडया आदिमी है। इस समय रमा की आंखों से आंसू तो न िनकलते थ, पर उसका एक- एक रोआं रो रहा था।

जालपा से अपनी असली हालत िछपाकर उसने िकतनी भारी भूल की! वह समझिदिार औरत है, अगर उसे मालूम

हो जाता िक मेरे घर में भूंजी भांग भी नहीं है, तो वह मुझिे कभी उधार गहने न लेने देती। उसने तो कभी अपने

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मुंह से कुछ नहीं कहा। मैं ही अपनी शान जमाने के िलए मरा जा रहा था। इतना बडा बोझि िसर पर लेकर भी

मैंने क्यों िकफायत से काम नहीं िलया? मुझिे एक-एक पैसा दिांतों से पकड़ना चािहए था। साल-भर में मेरी

आमदिनी सब िमलाकर एक हज़ार से कम न हुई होगी। अगर िकफायत से चलता, तो इन दिोनों महाजनों के आधे-

आधे रूपये जरूर अदिा हो जाते, मगर यहां तो िसर पर शामत सवार थी। इसकी क्या जरूरत थी िक जालपा

मुहल्ले भर की औरतों को जमा करके रोज सैर करने जाती- सैकड़ों रूपये तो तांग वाला ले गया होगा, मगर यहां

तो उस पर रोब जमाने की पड़ी हुई थी। सारा बाज़ार जान जाय िक लाला िनरे लफंग ह, पर अपनी स्त्री न

जानने पाए! वाह री बुिद्धि, दिरवाज़े के िलए परदिों की क्या जरूरत थी! दिो लैंप क्यों लाया, नई िनवाड़ लेकर

चारपाइयां क्यों िबनवाई, उसने रास्ते ही में उन ख़चो का िहसाब तैयार कर िलया, िजन्हें उसकी हैिसयत के

आदिमी को टालना चािहए था। आदिमी जब तक स्वस्थ रहता है, उसे इसकी िचता नहीं रहती िक वह क्या खाता

है, िकतना खाता है, कब खाता है, लेिकन जब कोई िवकार उत्पन्न हो जाता है, तो उसे यादि आती है िक कल मैंने

पकौिडयां खाई थीं। िवजय बिहमुर्चखी होती है, पराजय अन्तमुर्चखी। जालपा ने पूछा, ‘कहां चले गए थ, बडी देर

लगा दिी।’

रमानाथ—‘तुम्हारे कारण रतन के बंगले पर जाना पड़ा। तुमने सब रूपये उठाकर दे िदिए, उसमें दिो सौ

रूपये मेरे भी थ। ’

जालपा—‘तो मुझिे क्या मालूम था, तुमने कहा भी तो न था, मगर उनके पास से रूपये कहीं जा नहीं

सकते, वह आप ही भेज देंगी।’

रमानाथ—‘माना, पर सरकारी रकम तो कल दिािख़ल करनी पड़ेगी।’

जालपा—‘कल मुझिसे दिो सौ रूपये ले लेना, मेरे पास ह।’

रमा को िवश्वास न आया। बोला—‘कहीं हों न तुम्हारे पास! इतने रूपये कहां से आए? ’

जालपा—‘तुम्हें इससे क्या मतलब, मैं तो दिो सौ रूपये देने को कहती हूं।’

रमा का चेहरा िखल उठा। कुछ-कुछ आशा बंधी। दिो-सौ रूपये यह देदे, दिो सौ रूपये रतन से ले लूं, सौ

रूपये मेरे पास ह ही, तो कुल तीन सौ की कमी रह जाएगी, मगर यही तीन सौ रूपये कहां से आएंग? ऐसा कोई

नज़र न आता था, िजससे इतने रूपये िमलने की आशा की जा सके। हां, अगर रतन सब रूपये दे दे तो िबगड़ी

बात बन जाय। आशा का यही एक आधार रह गया था।

जब वह खाना खाकर लेटा, तो जालपा ने कहा, ‘आज िकस सोच में पड़े हो?’

रमानाथ—‘सोच िकस बात का- क्या मैं उदिास हूं?’

जालपा—‘हां, िकसी िचता में पड़े हुए हो, मगर मुझिसे बताते नहीं हो!’

रमानाथ—‘ऐसी कोई बात होती तो तुमसे िछपाता?’

जालपा—‘वाह, तुम अपने िदिल की बात मुझिसे क्यों कहोग? ऋिषयों की आज्ञा नहीं है।’