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Sunday, October 13, 2019

जीवन के सफ़र में राही, मिलते हैं बिछड़ जाने को - jise too kabool kar le vah ada kahaan se laoon --साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
जीवन के सफ़र में राही, मिलते हैं बिछड़ जाने को
और दे जाते हैं यादें, तनहाई में तड़पाने को
जीवन के सफ़र...

ये रूप की दौलत वाले, कब सुनते हैं दिल के नाले
तक़दीर न बस में डाले, इनके किसी दीवाने को
जीवन के सफ़र...

जो इनकी नज़र से खेले, दुख पाए मुसीबत झेले
फिरते हैं ये सब अलबेले, दिल लेके मुकर जाने को
जीवन के सफ़र...

दिल लेके दगा देते हैं, इक रोग लगा देते हैं
हँस हँस के जला देते हैं, ये हुस्न के परवाने को
जीवन के सफ़र...

अब साथ न गुज़रेंगे हम, लेकिन ये फ़िज़ा रातों की
दोहराया करेगी हरदम, इस प्यार के अफ़साने को
जीवन के सफ़र...


-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

जिसे तू कुबूल कर ले वह अदा कहाँ से लाऊँ - jise too kubool kar le vah ada kahaan se laoon --साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
जिसे तू कुबूल कर ले वह अदा कहाँ से लाऊँ

तेरे दिल को जो लुभाए वह सदा कहाँ से लाऊँ


मैं वो फूल हूँ कि जिसको गया हर कोई मसल के

मेरी उम्र बह गई है मेरे आँसुओं में ढल के

जो बहार बन के बरसे वह घटा कहाँ से लाऊँ


तुझे और की तमन्ना, मुझे तेरी आरजू है

तेरे दिल में ग़म ही ग़म है मेरे दिल में तू ही तू है

जो दिलों को चैन दे दे वह दवा कहाँ से लाऊँ


मेरी बेबसी है ज़ाहिर मेरी आहे बेअसर से

कभी मौत भी जो मांगी तो न पाई उसके दर से

जो मुराद ले के आए वह दुआ कहाँ से लाऊँ


जिसे तू कुबूल कर ले वह अदा कहाँ से लाऊँ


-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

ज़िन्दगी-भर नहीं भूलेगी वह बरसात की रात - zindagee-bhar nahin bhoolegee vah barasaat kee raat --साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगी वह बरसात की रात

एक अन्जान हसीना से मुलाक़ात की रात


हाय ! वह रेशमी जुल्फ़ों से बरसता पानी

फूल-से गालों पे रुकने को तरसता पानी

दिल में तूफ़ान उठाए हुए जज़्बात की रात

ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगी वह बरसात की रात


डर के बिजली से अचानक वह लिपटना उसका

और फिर शर्म से बल खाके सिमटना उसका

कभी देखी न सुनी ऎसी तिलिस्मात की रात

ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगी बरसात की रात


सुर्ख़ आँचल को दबा कर जो निचोड़ा उसने

दिल पर जलता हुआ एक तीर सा छोड़ा उसने

आग पानी में लगाते हुए हालात की रात

ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगी वह बरसात की रात


मेरे नग़मों में जो बसती है वो तस्वीर थी वो

नौजवानी के हसीं ख़्वाब की ताबीर थी वो

आसमानों से उतर आई थी जो रात की रात

ज़िन्दगी-भर नहीं भूलेगी वह बरसात की रात


-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात - zindagee bhar nahin bhoolegee vo barasaat kee raat - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात
एक अनजान हसीना से मुलाक़ात की रात
ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी ...

हाय वो रेशमी ज़ुल्फ़ों से बरसता पानी
फूल से गालों पे रुकने को तरसता पानी
दिल में तूफ़ान उठाते हुए
दिल में तूफ़ान उठाते हुए हालात की रात
ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी ...

डर के बिजली से अचानक वो लिपटना उसका
और फिर शर्म से बल खाके सिमटना उसका
कभी देखी न सुनी ऐसी हो
कभी देखी न सुनी ऐसी तिलिस्मात की रात
ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी ...

सुर्ख आँचल को दबाकर जो निचोड़ा उसने
दिल पे जलता हुआ एक तीर-सा छोड़ा उसने
आग पानी में लगाते हुए
आग पानी में लगाते हुए जज़बात की रात
ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी ...

मेरे नग़्मों में जो बसती है वो तस्वीर थी वो
नौजवानी के हसीं ख़्वाब की ताबीर थी वो
आसमानों से उतर आई थी जो रात की रात
ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी ...

[लता:]
ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात
एक अनजान मुसाफ़िर से मुलाक़ात की रात
ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी

हाय जिस रात मेरे दिल ने धड़कना सीखा
शोख़ जज़बात ने सीने में भड़कना सीखा
मेरी तक़दीर में निखरी हुई, हो
मेरी तक़दीर में निखरी हुई सरमात की रात
ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी

दिल ने जब प्यार के रंगीन फ़साने छेड़े
आँखों-आँखों ने वफ़ाओं के तराने छेड़े
सोज़ में डूब गई आज वही
सोज़ में डूब गई आज वही नग़्मात की रात
ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी

[रफ़ी]
रूठनेवाली !
रूठनेवाली मेरी बात पे मायूस ना हो
बहके-बहके ख़्यालात से मायूस ना हो
ख़त्म होगी ना कभी तेरे, हो
ख़त्म होगी ना कभी तेरे मेरे साथ की रात
ज़िंदगी भर नहीं ...

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

जाने वो कैसे लोग थे, जिनके प्यार को प्यार मिला - jaane vo kaise log the, jinake pyaar ko pyaar mila --साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
जाने वो कैसे लोग थे, जिनके प्यार को प्यार मिला ?

हमने तो जब कलियाँ मांगीं, काँटों का हार मिला ॥


खुशियों की मंज़िल ढूंढी तो ग़म की गर्द मिली

चाहत के नग़में चाहे तो आहें सर्द मिलीं

दिल के बोझ को दूना कर गया, जो ग़म्ख़्वार मिला


बिछड़ गया हर साथी दे कर, पल-दो-पल का साथ

किसको फ़ुरसत है जो थामे, दीवानों का हाथ

हम को अपना साया तक अक्सर बेज़ार मिला


इसको ही जीना कहते हैं तो यूँ ही जी लेंगे

उफ़ न करेंगे, लब सीलेंगे, आँसू पी लेंगे

ग़म से अब घबराना कैसा, ग़म सौ बार मिला


जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला ?

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

जाएँ तो जाएँ कहाँ- jaen to jaen kahaan - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
जाएँ तो जाएँ कहाँ

समझेगा कौन यहाँ दर्द भरे दिल की जुबाँ

जाएँ तो जाएँ कहाँ


मायूसियों का मजमा है जी में

क्या रह गया है इस ज़िन्दगी में

रुह में ग़म दिल में धुआँ

जाएँ तो जाएँ कहाँ


उनका भी ग़म है अपना भी ग़म है

अब दिल के बचने की उम्मीद कम है

एक किश्ती सौ तूफ़ाँ

जाएँ तो जाएँ कहाँ

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग - jab bhee jee chaahe naee duniya basa lete hain log- -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग

एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग


याद रहता है किसे गुज़रे ज़माने का चलन

सर्द पड़ जाती है चाहत हार जाती है लगन


अब मौहब्बत भी है क्या एक तिजारत के सिवा

हम ही नादान थे जो ओढ़ा बीती यादों का कफ़न

वरना जीने के लिए सब कुछ भुला लेते हैं लोग


जाने वो क्या लोग थे जिनको वफ़ा का पास था

दूसरे के दिल पे क्या गुज़रेगी यह अहसास था


अब हैं पत्थर केसनम जिनको एहसास न ग़म

वो ज़माना अब कहाँ जो अहले दिल को रास था

अब तो मतलब के लिए नाम-ए-वफ़ा लेते हैं लोग

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

छू लेने दो नाज़ुक होठों को - chhoo lene do naazuk hothon ko - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
छू लेने दो नाज़ुक होठों को
कुछ और नहीं हैं जाम हैं ये
क़ुदरत ने जो हमको बख़्शा है
वो सबसे हँसीं ईनाम हैं ये

शरमा के न यूँ ही खो देना
रंगीन जवानी की घड़ियाँ
बेताब धड़कते सीनों का
अरमान भरा पैगाम है ये, छू लेने दो ...

अच्छों को बुरा साबित करना
दुनिया की पुरानी आदत है
इस मय को मुबारक चीज़ समझ
माना की बहुत बदनाम है ये, छू लेने दो ...

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

चांद मद्धम है आस्माँ चुप है- chaand maddham hai aasmaan chup hai- -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
चांद मद्धम है आस्माँ चुप है
नींद की गोद में जहाँ चुप है

दूर वादी में दूधिया बादल,झुक के परबत को प्यार करते हैं
दिल में नाकाम हसरतें लेकर,हम तेरा इंतज़ार करते हैं

इन बहारों के साए में आ जा,फिर मोहब्बत जवाँ रहे न रहे
ज़िन्दगी तेरे ना-मुरादों पर,कल तलक मेहरबाँ रहे न रहे

रोज़ की तरह आज भी तारे,सुबह की गर्द में न खो जाएँ
आ तेरे गम़ में जागती आँखें,कम से कम एक रात सो जाएँ

चाँद मद्धम है आस्माँ चुप है
नींद की गोद में जहाँ चुप है

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों - chalo ek baar phir se ajanabee ban jaen ham donon . - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों ।


न मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की,

न तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत अन्दाज़ नज़रों से ।

न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों से,

न ज़ाहिर हो तुम्हारी कशमकश का राज़ नज़रों से ॥


तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशक़दमी से,

मुझे भी लोग कहते हैं ये जलवे पराए हैं ।

मेरे हमराह भी रुसवाइयाँ हैं मेरे माज़ी की,

तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साए हैं ॥


तारुफ़ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर,

ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा ।

वो अफ़साना जिसे अन्जाम तक लाना न हो मुमकिन,

उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा ॥

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

ग़ैरों पे करम अपनों पे सितम, ऐ जान-ए-वफ़ा ये ज़ुल्म न कर - gairon pe karam apanon pe sitam, ai jaan-e-vafa ye zulm na kar - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
ग़ैरों पे करम अपनों पे सितम, ऐ जान-ए-वफ़ा ये ज़ुल्म न कर
रहने दे अभी थोड़ा सा धरम, ऐ जान-ए-वफ़ा ये ज़ुल्म न कर
ये ज़ुल्म न कर
ग़ैरों पे करम ...

ग़ैरों के थिरकते शानों पर, ये हाथ गँवारा कैसे करें
हर बात गंवारा है लेकिन, ये बात गंवारा कैसे करें
ये बात गंवारा कैसे करें
मर जाएंगे हम, मिट जाएंगे हम
ऐ जान-ए-वफ़ा ये ज़ुल्म न कर, ये ज़ुल्म न कर
ग़ैरों पे करम ...

हम भी थे तेरे मंज़ूर-ए-नज़र, दिल चाहा तो अब इक़रार न कर
सौ तीर चला सीने पे मगर, बेगानों से मिलकर वार न कर
बेगानों से मिलकर वार न कर
बेमौत कहीं मर जाएं न हम
ऐ जान-ए-वफ़ा ये ज़ुल्म न कर, ये ज़ुल्म न कर
ग़ैरों पे करम ...

हम चाहनेवाले हैं तेरे, यूँ हमको जलाना ठीक नहीं
मह्फ़िल में तमाशा बन जाएं, इस दर्जा सताना ठीक नहीं
इस दर्जा सताना ठीक नहीं
ऐ जान-ए-वफ़ा ये ज़ुल्म न कर, ये ज़ुल्म न कर
ग़ैरों पे करम ...

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

गंगा तेरा पानी अमृत झर-झर बहता जाए- ganga tera paanee amrt jhar-jhar bahata jae - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
गंगा तेरा पानी अमृत झर-झर बहता जाए
युग-युग से इस देश की धरती तुझसे जीवन पाए
गंगा तेरा पानी...

दूर हिमालय से तू आई गीत सुहाने गाती
बस्ती-बस्ती पर्वत-पर्वत सुख-संदेश सुनाती
तेरी चाँदी जैसी धारा मीलों तक लहराए
गंगा तेरा पानी...

कितने सूरज उभरे-डूबे गंगा तेरे द्वारे
युगों-युगों की कथा सुनाएँ तेरे बहते धारे
तुझको छोड़ के भारत का इतिहास लिखा न जाए
गंगा तेरा पानी...

इस धरती का दुख-सुख तूने अपने बीच समोया
जब-जब देश ग़ुलाम हुआ है तेरा पानी रोया
जब-जब हम आज़ाद हुए हैं तेरे तट मुस्काए
गंगा तेरा पानी...

खेतों-खेतों तुझसे जागी धरती पर हरियाली
फ़सलें तेरा राग अलापें झूमे बाली-बाली
तेरा पानी पी कर मिट्टी सोने में ढल जाए
गंगा तेरा पानी ...

तेरे दान की दौलत ऊँचे खलिहानों में ढलती
ख़ुशियों के मेले लगते मेहनत की डाली फलती
लहक-लहक कर धूम मचाते तेरी गोद में जाए
गंगा तेरा पानी ...

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

क्या मिलिए ऎसे लोगों से, जिनकी फितरत छुपी रहे- kya milie aise logon se, jinakee phitarat chhupee rahe - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
क्या मिलिए ऎसे लोगों से, जिनकी फितरत छुपी रहे
नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे।

खुद से भी जो खुद को छुपाए, क्या उनसे पहचान करें
क्या उनके दामन से लिपटें, क्या उनका अरमान करें
जिनकी आधी नीयत उभरे, आधी नीयत छुपी रहे
नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे।

दिलदारी का ढोंग रचाकर, जाल बिछाएं बातों का
जीते-जी का रिश्ता कहकर सुख ढूंढे कुछ रातों का
रूह की हसरत लब पर आए, जिस्म की हसरत छुपी रहे
नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे।

जिनके जुल्म से दुखी है जनता हर बस्ती हर गाँव में
दया धरम की बात करें वो, बैठ के सजी सभाओं में
दान का चर्चा घर-घर पहुंचे, लूट की दौलत छुपी रहे
नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे।

देखें इन नकली चेहरों की कब तक जय-जयकार चले
उजले कपड़ों की तह में, कब तक काला संसार चले
कब तक लोगों की नजरों से, छुपी हकीकत चुपी रहे
नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे।

क्या मिलिए ऎसे लोगों से, जिनकी फितरत छुपी रहे
नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे।

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

किसी पत्थर की मूरत से मुहब्बत का इरादा है - kisee patthar kee moorat se muhabbat ka iraada hai - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
किसी पत्थर की मूरत से मुहब्बत का इरादा है
परस्तिश की तमन्ना है, इबादत का इरादा है
किसी पत्थर की मूरत से ...

जो दिल की धड़कनें समझे न आँखों की ज़ुबाँ समझे
नज़र की गुफ़्तगू समझे न जज़बों का बयाँ समझे
उसी के सामने उसकी शिक़ायत का इरादा है
किसी पत्थर की मूरत से ...

मुहब्बत बेरुख़ी से और भड़केगी वो क्या जाने
तबीयत इस अदा पे और फड़केगी वो क्या जाने
वो क्या जाने कि अपना किस क़यामत का इरादा है
किसी पत्थर की मूरत से ...

सुना है हर जवाँ पत्थर के दिल में आग होती है
मगर जब तक न छेड़ो, शर्म के पर्दे में सोती है
ये सोचा है की दिल की बात उसके रूबरू कह दे
नतीजा कुच भी निकले आज अपनी आरज़ू कह दे
हर इक बेजाँ तक़ल्लुफ़ से बग़ावत का इरादा है
किसी पत्थर की मूरत से ...

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

किस का रस्ता देखे, ऐ दिल, ऐ सौदाई - kis ka rasta dekhe, ai dil, ai saudaee - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
किस का रस्ता देखे, ऐ दिल, ऐ सौदाई
मीलों है खामोशी, बरसों है तनहाई
भूली दुनिया, कभी की, तुझे भी मुझे भी
फिर क्यों आँख भर आई
ओ, किस का रस्ता देखे ...

कोई भी साया नहीं राहों में
कोई भी आएगा न बाहों में
तेरे लिए मेरे लिए कोई नहीं रोने वाला हो
झूटा भी नाता नहीं चाहों में
तू ही क्यों डूबा रहे आहों में
कोई किसी संग मरे, ऐसा नहीं होने वाला
कोई नहीं जो यूँ ही जहाँ में, बाँटे पीर पराई
हो, किस का रस्ता देखे ...

तुझे क्या बीती हुई रातों से
मुझे क्या खोई हुई बातों से
सेज नहीं, चितह सही, जो भी मिले सोना होगा, हो
गई जो डोरी छूट हाथों से, ओ
लेना क्या छूटे हुए साथों से
खुशी जहाँ माँगी तूने, वहीं मुझे रोना होगा
न कोई तेरा, न कोई मेरा, फिर किसकी याद आई
ओ, किस का रस्ता देखे ...

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उलफत ही सही - taaj tere lie ik mazahar-e-ulaphat hee sahee - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उलफत ही सही
तुम को इस वादी-ए-रँगीं से अक़ीदत ही सही
मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे

बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मानी
सब्त जिस राह पे हों सतवत-ए-शाही के निशाँ
उस पे उलफत भरी रूहों का सफर क्या मानी

मेरी महबूब पस-ए-पर्दा-ए-तशरीर-ए-वफ़ा
तूने सतवत के निशानों को तो देखा होता
मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली,
अपने तारीक़ मक़ानों को तो देखा होता

अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की है
कौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उनके
लेकिन उनके लिये तश्शीर का सामान नहीं
क्यूँकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे

ये इमारत-ओ-मक़ाबिर, ये फ़ासिले, ये हिसार
मुतल-क़ुलहुक्म शहँशाहों की अज़्मत के सुतून
दामन-ए-दहर पे उस रँग की गुलकारी है
जिसमें शामिल है तेरे और मेरे अजदाद का ख़ून

मेरी महबूब! उनहें भी तो मुहब्बत होगी
जिनकी सानाई ने बक़शी है इसे शक़्ल-ए-जमील
उनके प्यारों के मक़ाबिर रहे बेनाम-ओ-नमूद
आज तक उन पे जलाई न किसी ने क़ँदील

ये चमनज़ार ये जमुना का किनारा, ये महल
ये मुनक़्कश दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़
इक शहँशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़
मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

कह दूँ तुम्हें या चुप रहूँ- kah doon tumhen ya chup rahoon- -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
कह दूँ तुम्हें
या चुप रहूँ
दिल में मेरे आज क्या है
कह दूँ तुम्हें या चुप रहूँ
दिल में मेरे आज क्या है
जो बोलो तो जानूँ गुरू तुमको मानूँ
चलो ये भी वादा है
कह दूँ तुम्हें...

सोचा है तुमने कि चलते ही जाएँ
तारों से आगे कोई दुनिया बसाएँ
तो तुम बताओ
सोचा ये है कि तुम्हें रस्ता भुलाएँ
सूनी जगह पे कहीं छेड़ें सताएँ
हाय रे ना ना
ये ना करना
अरे नहीं रे नहीं रे नहीं रे नहीं रे नहीं नहीं
कह दूँ तुम्हें...

सोचा है तुमने कि कुछ गुनगुनाएँ
मस्ती में झूमें ज़रा धूमें मचाएँ
तो तुम बताओ ना
सोचा ये है कि तुम्हें नज़दीक लाएँ
फूलों से होंठों की लाली चुराएँ
हाय रे ना ना
ये ना करना
अरे नहीं रे नहीं रे नहीं रे नहीं रे नहीं नहीं
कह दूँ तुम्हें...

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

कभी ख़ुद पे, कभी हालात पे रोना आया - kabhee khud pe, kabhee haalaat pe rona aaya - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
कभी ख़ुद पे, कभी हालात पे रोना आया ।

बात निकली तो हर एक बात पे रोना आया ॥


हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को ।

क्या हुआ आज, यह किस बात पे रोना आया ?


किस लिए जीते हैं हम, किसके लिए जीते हैं ?

बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया ॥


कौन रोता है किसी और की ख़ातिर, ऐ दोस्त !

सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया ॥

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है- kabhee kabhee mere dil mein, khayaal aata hai- -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है
के जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिये
तू अबसे पहले सितारों में बस रही थी कहीं
तुझे ज़मीं पे बुलाया गया है मेरे लिये
कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है

कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है
के ये बदन ये निगाहें मेरी अमानत हैं
ये गेसुओं की घनी छाँव हैं मेरी ख़ातिर
ये होंठ और ये बाहें मेरी अमानत हैं
कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है

कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है
के जैसे तू मुझे चाहेगी उम्र भर यूँही
उठेगी मेरी तरफ़ प्यार की नज़र यूँही
मैं जानता हूँ के तू ग़ैर है मगर यूँही
कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है

कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है
के जैसे बजती हैं शहनाइयां सी राहों में
सुहाग रात है घूँघट उठा रहा हूँ मैं
सुहाग रात है घूँघट उठा रहा हूँ मैं
सिमट रही है तू शरमा के मेरी बाहों में
कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है- kabhee kabhee mere dil mein khayaal aata hai - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी

अजब न था के मैं बेगाना-ए-अलम रह कर
तेरे जमाल की रानाईयों में खो रहता
तेरा गुदाज़ बदन तेरी नीमबाज़ आँखें
इन्हीं हसीन फ़सानों में महव हो रहता

पुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने की
तेरे लबों से हलावट के घूँट पी लेता
हयात चीखती फिरती बरहना-सर, और मैं
घनेरी ज़ुल्फ़ों के साये में छुप के जी लेता

मगर ये हो न सका और अब ये आलम है
के तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू भी नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िन्दगी जैसे
इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं

ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले
गुज़र रहा हूँ कुछ अनजानी रह्गुज़ारों से
महीब साये मेरी सम्त बढ़ते आते हैं
हयात-ओ-मौत के पुरहौल ख़ारज़ारों से

न कोई जादह-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़
भटक रही है ख़लाओं में ज़िन्दगी मेरी
इन्हीं ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खोकर
मैं जानता हूँ मेरी हमनफ़स मगर फिर भी

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

इस रेशमी पाज़ेब की झंकार के सदके - is reshamee paazeb kee jhankaar ke sadake - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
इस रेशमी पाज़ेब की झंकार के सदके
जिस ने ये पहनाई है उस दिलदार के सदके

उस ज़ुल्फ़ के क़ुरबान लब-ओ-रुक़सार के सदके
हर जलवा था इक शोला हुस्न-ए-यार के सदके

जवानी माँगती ये हसीं झंकार बरसों से
तमन्ना बुन रही थी धड़कनों के तार बरसों से
छुप-छुप के आने वाले तेरे प्यार के सदके
इस रेशमी पाज़ेब की ...

जवानी सो रही थी हुस्न की रंगीं पनाहों में
चुरा लाये हम उन के नाज़नीं जलवे निगाहों में
क़िस्मत से जो हुआ है उस दीदार के सदके
उस ज़ुल्फ़ के क़ुरबान ...

नज़र लहरा रही थी ज़ीस्त पे मस्ती सी छाई है
दुबारा देखने की शौक़ ने हल्चल मचाई है
दिल को जो लग गया है उस अज़ार के सदके
इस रेशमी पाज़ेब की ...

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

इश्क़ की गर्मी-ए-जज़्बात किसे पेश करूँ - ishq kee garmee-e-jazbaat kise pesh karoon- -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
इश्क़ की गर्मी-ए-जज़्बात किसे पेश करूँ
ये सुलग़ते हुए दिन-रात किसे पेश करूँ

हुस्न और हुस्न का हर नाज़ है पर्दे में अभी
अपनी नज़रों की शिकायात किसे पेश करूँ

तेरी आवाज़ के जादू ने जगाया है जिन्हें
वो तस्सव्वुर, वो ख़यालात किसे पेश करूँ

ऐ मेरी जान-ए-ग़ज़ल, ऐ मेरी ईमान-ए-ग़ज़ल
अब सिवा तेरे ये नग़मात किसे पेश करूँ

कोई हमराज़ तो पाऊँ कोई हमदम तो मिले
दिल की धड़कन के इशारात किसे पेश करूँ

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

इतनी हसीन इतनी जवाँ रात, क्या करें - itanee haseen itanee javaan raat, kya karen - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
इतनी हसीन इतनी जवाँ रात, क्या करें

जागे हैं कुछ अजीब से जज़्बात, क्या करें ?


पेड़ों के बाजुओं में महकती है चांदनी

बेचैन हो रहे हैं ख़्यालात, क्या करें ?


साँसों में घुल रही है किसी साँस की महक

दामन को छू रहा है कोई हाथ, क्या करें ?


शायद तुम्हारे आने से यह भेद खुल सके

हैराँ हैं कि आज नई बात क्या करें ?

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए नाशाद आया - aap aae to khayaal-e-dil-e naashaad aaya - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए नाशाद आया

कितने भूले हुए ज़ख़्मों का पता याद आया


आप के लब पे कभी अपना भी नाम आया था

शोख नज़रों से मुहब्बत का सलाम आया था

उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था

आपको देख के वह अहद-ए-वफ़ा याद आया


रुह में जल उठे बजती हुई यादों के दिए

कैसे दीवाने थे हम आपको पाने के लिए

यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने एहसान किए

पर जो माँगे से न पाया वो सिला याद आया


आज वह बात नहीं फिर भी कोई बात तो है

मेरे हिस्से में यह हल्की-सी मुलाक़ात तो है

ग़ैर का हो के भी यह हुस्न मेरे साथ तो है

हाय ! किस वक़्त मुझे कब का गिला याद आया

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

अभी न जाओ छोड़ कर के दिल अभी भरा नहीं - abhee na jao chhod kar ke dil abhee bhara nahin - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
अभी न जाओ छोड़ कर के दिल अभी भरा नहीं
अभी अभी तो आई हो अभी अभी तो
अभी अभी तो आई हो, बहार बनके छाई हो
हवा ज़रा महक तो ले, नज़र ज़रा बहक तो ले
ये शाम ढल तो ले ज़रा ये दिल सम्भल तो ले ज़रा
मैं थोड़ी देर जी तो लूँ, नशे के घूँट पी तो लूँ
नशे के घूँट पी तो लूँ
अभी तो कुछ कहाँअहीं, अभी तो कुछ सुना नहीं
अभी न जाओ छोड़कर के दिल अभी भरा नहीं

सितारे झिलमिला उठे, सितारे झिलमिला उठे, चराग़ जगमगा उठे
बस अब न मुझको टोकना
बस अब न मुझको टोकना, न बढ़के राह रोकना
अगर मैं रुक गई अभी तो जा न पाऊँगी कभी
यही कहोगे तुम सदा के दिल अभी नहीं भरा
जो खत्म हो किसी जगह ये ऐसा सिलसिला नहीं
अभी नहीं अभी नहीं
नहीं नहीं नहीं नहीं
अभी न जाओ छोड़कर के दिल अभी भरा नहीं

अधूरी आस, अधूरी आस छोड़के, अधूरी प्यास छोड़के
जो रोज़ यूँही जाओगी तो किस तरह निभाओगी
कि ज़िंदगी की राह में, जवाँ दिलों की चाह में
कई मुक़ाम आएंगे जो हम को आज़माएंगे
बुरा न मानो बात का ये प्यार है गिला नहीं
हाँ, यही कहोगे तुम सदा के दिल अभी नहीं भरा
हाँ, दिल अभी भरा नहीं
नहीं नहीं नहीं नहीं

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

अब कोई गुलशन ना उजड़े अब वतन आज़ाद है - ab koee gulashan na ujade ab vatan aazaad hai - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
अब कोई गुलशन ना उजड़े अब वतन आज़ाद है
रूह गंगा की हिमालय का बदन आज़ाद है

खेतियाँ सोना उगाएँ, वादियाँ मोती लुटाएँ
आज गौतम की ज़मीं, तुलसी का बन आज़ाद है

मंदिरों में शंख बाजे, मस्जिदों में हो अज़ाँ
शेख का धर्म और दीन-ए-बरहमन आज़ाद है

लूट कैसी भी हो अब इस देश में रहने न पाए
आज सबके वास्ते धरती का धन आज़ाद है

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

अब अगर हमसे ख़ुदाई भी खफ़ा हो जाए - ab agar hamase khudaee bhee khafa ho jae - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
अब अगर हमसे ख़ुदाई भी खफ़ा हो जाए
गैर-मुमकिन है कि दिल दिल से जुदा हो जाए
जिस्म मिट जाए कि अब जान फ़ना हो जाए
गैर-मुमकिन है...

जिस घड़ी मुझको पुकारेंगी तुम्हारी बाँहें
रोक पाएँगी न सहरा की सुलगती राहें
चाहे हर साँस झुलसने की सज़ा हो जाए
गैर-मुमकिन है...

लाख ज़ंजीरों में जकड़ें ये ज़माने वाले
तोड़ कर बन्द निकल आएँगे आने वाले
शर्त इतनी है कि तू जलवा-नुमाँ हो जाए
गैर-मुमकिन है...

ज़लज़ले आएँ गरज़दार घटाएँ घेरें
खंदकें राह में हों तेज़ हवाएँ घेरें
चाहे दुनिया में क़यामत ही बपा हो जाए
गैर-मुमकिन है...

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

अगर मुझे न मिली तुम तो मैं ये समझूँगा - agar mujhe na milee tum to main ye samajhoonga- -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
अगर मुझे न मिली तुम तो मैं ये समझूँगा
कि दिल की राह से होकर ख़ुशी नहीं गुज़री

अगर मुझे न मिले तुम तो मैं ये समझूँगी
कि सिर्फ़ उम्र कटी ज़िंदगी नहीं गुज़री

फ़िज़ा में रंग नज़ारों में जान है तुमसे
मेरे लिए ये ज़मीं आसमान है तुमसे
ख़याल-ओ-ख़्वाब की दुनिया जवान है तुमसे,
अगर मुझे न मिले तुम तो मैं ये समझूँगी
कि ख़्वाब ख़्वाब रहे बेकसी नहीं गुज़री
अगर मुझे न मिली तुम तो मैं ये समझूँगा
कि दिल की राह से होकर ख़ुशी नहीं गुज़री

बड़े यक़ीन से मैंने ये हाथ माँगा है
मेरी वफ़ा ने हमेशा का साथ माँगा है
दिलों की प्यास ने आब-ए-हयात माँगा है
दिलों की प्यास ने आब-ए-हयात माँगा है

अगर मुझे न मिले तुम तो मैं ये समझूँगी
कि इंतज़ार की मुद्दत अभी नहीं गुज़री

अगर मुझे न मिले तुम तो मैं ये समझूँगी
कि सिर्फ़ उम्र कटी ज़िंदगी नहीं गुज़री

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं - log aurat ko faqat jism samajh lete hain - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं
रुह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं

रुह क्या होती है इससे उन्हें मतलब ही नहीं
वो तो बस तन के तक़ाज़ों का कहा मानते हैं

रुह मर जाती है तो ये जिस्म है चलती हुई लाश
इस हक़ीक़त को न समझते हैं न पहचानते हैं

कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है
कितनी सदियों से है क़ाएम ये गुनाहों का रिवाज

लोग औरत की हर इक चीख़ को नग़्मा समझे
वो क़बीलों का ज़माना हो कि शहरों का रिवाज

जब्र से नस्ल बढ़े ज़ुल्म से तन मेल करें
ये अमल हम में है बे-इल्म परिन्दों में नहीं

हम जो इनसानों की तहज़ीब लिए फिरते हैं
हमसा वहशी कोई जंगल के दरिन्दों में नहीं

इक बुझी रुह लुटे जिस्म के ढाँचे में लिए
सोचती हूँ मैं कहाँ जा के मुक़द्दर फोड़ूँ

मैं न ज़िन्दा हूँ कि मरने का सहारा ढूँढ़ूँ
और न मुर्दा हूँ कि जीने के ग़मों से छूटूँ

कौन बतलाएगा मुझ को किसे जा कर पूछूँ
ज़िन्दगी क़हर के साँचों में ढलेगी कब तक

कब तलक आँख न खोलेगा ज़माने का ज़मीर
ज़ुल्म और जब्र की ये रीत चलेगी कब तक।

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

तेरे होंठों पे तबस्सुम की वो हलकी-सी लकीर -tere honthon pe tabassum kee vo halakee-see lakeer --साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
तेरे होंठों पे तबस्सुम[1] की वो हलकी-सी लकीर
मेरे तख़ईल में [2] रह-रह के झलक उठती है
यूं अचानक तिरे आरिज़ का[3] ख़याल आता है
जैसे ज़ुल्मत में[4] कोई शम्अ भड़क उठती है

तेरे पैराहने-रंगीं की[5] ज़ुनुंखेज़[6] महक
ख़्वाब बन-बन के मिरे ज़ेहन में[7] लहराती है
रात की सर्द ख़ामोशी में हर इक झोकें से
तेरे अनफ़ास[8], तिरे जिस्म की आंच आती है

मैं सुलगते हुए राज़ों को अयां[9] तो कर दूं
लेकिन इन राज़ों की तश्हीर[10] से जी डरता है
रात के ख्वाब उजाले में बयां तो कर दूं
इन हसीं ख़्वाबों की ताबीर से[11] जी डरता है

तेरी साँसों की थकन, तेरी निगाहों का सुकूत[12]
दर- हक़ीकत[13] कोई रंगीन शरारत ही न हो
मैं जिसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठा हूँ
वो तबस्सुम, वो तकल्लुम[14] तिरी आदत ही न हो

सोचता हूँ कि तुझे मिलके मैं जिस सोच में हूँ
पहले उस सोच का मकसूम[15] समझ लूं तो कहूं
मैं तिरे शहर में अनजान हूँ, परदेसी हूँ
तिरे अल्ताफ़ का[16] मफ़हूम[17] समझ लूं तो कहूं
   
कहीं ऐसा न हो, पांओं मिरे थर्रा जाए
और तिरी मरमरी[18] बाँहों का सहारा न मिले
अश्क बहते रहें खामोश सियह[19] रातों में
और तिरे रेशमी आंचल का किनारा न मिले

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

हवस-नसीब नज़र को कहीं क़रार नहीं - havas-naseeb nazar ko kaheen qaraar nahin - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
हवस-नसीब नज़र को कहीं क़रार नहीं
मैं मुन्तिज़र हूं मगर तेरा इन्तज़ार नहीं
हमीं से रंग-ए-गुलिस्तां हमीं से रंग-ए-बहार
हमीं को नज्म्-ए-गुलिस्तां पे इख्तयार नहीं

अभी न छेड़ मोहब्बत के गीत अए मुतिरब
अभी हयात का माहौल ख़ुशगवार नहीं

तुम्हारे अह्द-ए-वफ़ा को अहद मैं क्या समझूं
मुझे ख़ुद अपनी मोहब्बत का ऐतबार नहीं

न जाने कितने गिले इस में मुज्तिरब हैं नदीम
वो एक दिल जो किसी का गिलागुसार नहीं

गुरेज़ का नहीं क़ायल हयात से लेकिन
जो सोज़ कहूं तो मुझे मौत नागवार नहीं

ये किस मक़ाम पे पहुंचा दिया ज़माने ने
कि अब हयात पे तेरा भी इख्तयार नहीं

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

हर चीज़ ज़माने की जहाँ पर थी वहीं है, - har cheez zamaane kee jahaan par thee vaheen hai - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
हर चीज़ ज़माने की जहाँ पर थी वहीं है,
एक तू ही नहीं है

नज़रें भी वही और नज़ारे भी वही हैं
ख़ामोश फ़ज़ाओं के इशारे भी वही हैं
कहने को तो सब कुछ है, मगर कुछ भी नहीं है

हर अश्क में खोई हुई ख़ुशियों की झलक है
हर साँस में बीती हुई घड़ियों की कसक है
तू चाहे कहीं भी हो, तेरा दर्द यहीं है

हसरत नहीं, अरमान नहीं, आस नहीं है
यादों के सिवा कुछ भी मेरे पास नहीं है
यादें भी रहें या न रहें किसको यक़ीं है

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

सोचता हूँ कि मुहब्बत से किनारा कर लूँ - sochata hoon ki muhabbat se kinaara kar loon - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
सोचता हूँ कि मुहब्बत से किनारा कर लूँ
दिल को बेगाना-ए-तरग़ीब-ओ-तमन्ना कर लूँ

सोचता हूँ कि मुहब्बत है जुनून-ए-रसवा
चंद बेकार-से बेहूदा ख़यालों का हुजूम
एक आज़ाद को पाबंद बनाने की हवस
एक बेगाने को अपनाने की सइ-ए-मौहूम
सोचता हूँ कि मुहब्बत है सुरूर-ए-मस्ती
इसकी तन्वीर में रौशन है फ़ज़ा-ए-हस्ती

सोचता हूँ कि मुहब्बत है बशर की फ़ितरत
इसका मिट जाना, मिटा देना बहुत मुश्किल है
सोचता हूँ कि मुहब्बत से है ताबिंदा हयात
आप ये शमा बुझा देना बहुत मुश्किल है

सोचता हूँ कि मुहब्बत पे कड़ी शर्त हैं
इक तमद्दुन में मसर्रत पे बड़ी शर्त हैं

सोचता हूँ कि मुहब्बत है इक अफ़सुर्दा सी लाश
चादर-ए-इज़्ज़त-ओ-नामूस में कफ़नाई हुई
दौर-ए-सर्माया की रौंदी हुई रुसवा हस्ती
दरगह-ए-मज़हब-ओ-इख़्लाक़ से ठुकराई हुई

सोचता हूँ कि बशर और मुहब्बत का जुनूँ
ऐसी बोसीदा तमद्दुन से है इक कार-ए-ज़बूँ

सोचता हूँ कि मुहब्बत न बचेगी ज़िंदा
पेश-अज़-वक़्त की सड़ जाये ये गलती हुई लाश
यही बेहतर है कि बेगाना-ए-उल्फ़त होकर
अपने सीने में करूँ जज़्ब-ए-नफ़रत की तलाश

और सौदा-ए-मुहब्बत से किनारा कर लूँ
दिल को बेगाना-ए-तरग़ीब-ओ-तमन्ना कर लूँ

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

फूट पड़ी मशरिक से किरने - phoot padee masharik se kirane- -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
फूट पड़ी मशरिक से किरने
हाल बना माज़ी[2] का फ़साना, गूंजा मुस्तकबिल[3] का तराना
भेजे हैं एहबाब[4] ने तोहफ़े, अटे पड़े हैं मेज़ के कोने
दुल्हन बनी हुई हैं राहें
जश्न मनाओ साल-ए-नौ के[5]
निकली है बंगले के दर से
इक मुफ़लिस दहकान[6] की बेटी, अफ़सुर्दा, मुरझाई हुई-सी
जिस्म के दुखते जोड़ दबाती, आँचल से सीने को छुपाती
मुट्ठी में इक नोट दबाये
जश्न मनाओ साल-ए-नौ के
भूके, ज़र्द, गदागर[7] बच्चे
कार के पीछे भाग रहे हैं, वक़्त से पहले जाग उठे हैं
पीप भरी आँखें सहलाते, सर के फोड़ों को खुजलाते
वो देखो कुछ और भी निकले
जश्न मनाओ साल-ए-नौ के


-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

सांझ की लाली सुलग-सुलग कर बन गई काली धूल - saanjh kee laalee sulag-sulag kar ban gaee kaalee dhool- -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
सांझ की लाली सुलग-सुलग कर बन गई काली धूल

आए न बालम बेदर्दी मैं चुनती रह गई फूल


रैन भई, बोझल अंखियन में चुभने लागे तारे

देस में मैं परदेसन हो गई जब से पिया सिधारे


पिछले पहर जब ओस पड़ी और ठन्डी पवन चली

हर करवट अंगारे बिछ गए सूनी सेज जली


दीप बुझे सन्नाटा टूटा बाजा भंवर का शंख

बैरन पवन उड़ा कर ले गई परवानों के पंख


-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

ये कूचे ये नीलाम घर दिलकशी के - ye kooche ye neelaam ghar dilakashee ke - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
ये कूचे ये नीलाम घर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां जिन्दगी के
कहाँ हैं, कहाँ हैं, मुहाफ़िज़ ख़ुदी के?

सनाख़्वान-ए-तकदीस-ए-मशरिक कहाँ हैं?

ये पुरपेंच गलियाँ, ये बेख़ाब बाज़ार
ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झंकार
ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पे तकरार

सनाख़्वान-ए-तकदीस-ए-मशरिक कहाँ हैं?

तअफ्फ़ुन से पुर नीमरोशन ये गलियाँ
ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियाँ
ये बिकती हुई खोखली रंगरलियाँ

सनाख़्वान-ए-तकदीस-ए-मशरिक कहाँ हैं?

वो उजले दरीचों में पायल की छन-छन
तनफ़्फ़ुस की उलझन पे तबले की धन-धन
ये बेरूह कमरों में खांसी की ठन-ठन

सनाख़्वान-ए-तकदीस-ए-मशरिक कहाँ हैं?

ये गूंजे हुए क़हक़हे रास्तों पर
ये चारों तरफ़ भीड़-सी खिड़िकयों पर
ये आवाज़ें खींचते हुए आंचलों पर

सनाख़्वान-ए-तकदीस-ए-मशरिक कहाँ हैं?

ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे
ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख़ फ़िक़रे
ये ढलके बदन और ये मदक़ूक़ चेहरे

सनाख़्वान-ए-तकदीस-ए-मशरिक कहाँ हैं?

ये भूखी निगाहें हसीनों की जानिब
ये बढ़ते हुए हाथ सीनों की जानिब
लपकते हुए पांव ज़ीनों की जानिब

सनाख़्वान-ए-तकदीस-ए-मशरिक कहाँ हैं?

यहां पीर भी आ चुके हैं जवाँ भी
तनूमन्द बेटे भी, अब्बा मियां भी
ये बीवी भी है और बहन भी है, माँ भी

सनाख़्वान-ए-तकदीस-ए-मशरिक कहाँ हैं?

मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी
यशोदा की हमजिन्स राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत ज़ुलैख़ा की बेटी

सनाख़्वान-ए-तकदीस-ए-मशरिक कहाँ हैं?

ज़रा मुल्क के राहबरों को बुलाओ
ये कूचे ये गलियां ये मन्ज़र दिखाओ
सनाख़्वान-ए-तकदीस-ए-मशरिक को लाओ

सनाख़्वान-ए-तकदीस-ए-मशरिक कहाँ हैं?


-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

सदियों से इन्सान यह सुनता आया है - sadiyon se insaan yah sunata aaya hai --साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
सदियों से इन्सान यह सुनता आया है
दुख की धूप के आगे सुख का साया है

हम को इन सस्ती ख़ुशियों का लोभ न दो
हम ने सोच समझ कर ग़म अपनाया है

झूठ तो कातिल ठहरा उसका क्या रोना
सच ने भी इन्सां का ख़ून बहाया है

पैदाइश के दिन से मौत की ज़द में हैं
इस मक़तल में कौन हमें ले आया है

अव्वल-अव्वल जिस दिल ने बरबाद किया
आख़िर-आख़िर वो दिल ही काम आया है

उतने दिन अहसान किया दीवानों पर
जितने दिन लोगों ने साथ निभाया है

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

सज़ा का हाल सुनाये जज़ा की बात करें - saza ka haal sunaaye jaza kee baat karen - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
सज़ा का हाल सुनाये जज़ा की बात करें
ख़ुदा मिला हो जिन्हें वो ख़ुदा की बात करें

उन्हें पता भी चले और वो ख़फ़ा भी न हो
इस एहतियात से क्या मज़ा की बात करें

हमारे अहद की तहज़ीब में क़बा ही नहीं
अगर क़बा हो तो बन्द-ए-क़बा की बात करें

हर एक दौर का मज़हब नया ख़ुदा लाता
करें तो हम भी मगर किस ख़ुदा की बात करें

वफ़ाशियार कई हैं कोई हसीं भी तो हो
चलो फिर आज उसी बेवफ़ा की बात करें


-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

अपने सीने से लगाये हुये उम्मीद की लाश - apane seene se lagaaye huye ummeed kee laash - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
अपने सीने से लगाये हुये उम्मीद की लाश

मुद्दतों ज़ीस्त1 को नाशाद2 किया है मैनें

तूने तो एक ही सदमे से किया था दो चार

दिल को हर तरह से बर्बाद किया है मैनें

जब भी राहों में नज़र आये हरीरी मलबूस3

सर्द आहों से तुझे याद किया है मैनें



और अब जब कि मेरी रूह की पहनाई में

एक सुनसान सी मग़्मूम घटा छाई है

तू दमकते हुए आरिज़4 की शुआयेँ5 लेकर

गुलशुदा6 शम्मएँ7 जलाने को चली आई है



मेरी महबूब ये हन्गामा-ए-तजदीद8-ए-वफ़ा

मेरी अफ़सुर्दा9 जवानी के लिये रास नहीं

मैं ने जो फूल चुने थे तेरे क़दमों के लिये

उन का धुंधला-सा तसव्वुर10 भी मेरे पास नहीं



एक यख़बस्ता11 उदासी है दिल-ओ-जाँ पे मुहीत12

अब मेरी रूह में बाक़ी है न उम्मीद न जोश

रह गया दब के गिराँबार13 सलासिल14 के तले

मेरी दरमान्दा15 जवानी की उमन्गों का ख़रोश


-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

मुसव्विर मैं तेरा शाहकार वापस करने आया हूं - musavvir main tera shaahakaar vaapas karane aaya hoon - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
मुसव्विर मैं तेरा शाहकार वापस करने आया हूं
अब इन रंगीन रुख़सारों में थोड़ी ज़िदर्यां भर दे
हिजाब आलूद नज़रों में ज़रा बेबाकियां भर दे
लबों की भीगी भीगी सिलवटों को मुज़महिल कर दे
नुमाया रग-ए-पेशानी पे अक्स-ए-सोज़-ए-दिल कर दे
तबस्सुम आफ़रीं चेहरे में कुछ संजीदापन कर दे
जवां सीने के मखरुती उठाने सरिनगूं कर दे
घने बालों को कम कर दे, मगर रख्शांदगी दे दे
नज़र से तम्कनत ले कर मिज़ाज-ए-आजिजी दे दे
मगर हां बेंच के बदले इसे सोफ़े पे बिठला दे
यहां मेरे बजाए इक चमकती कार दिखला दे

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

लब पे पाबन्दी नहीं एहसास पे पहरा तो है - lab pe paabandee nahin ehasaas pe pahara to hai-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
लब पे पाबन्दी नहीं एहसास पे पहरा तो है
फिर भी अहल-ए-दिल को अहवाल-ए-बशर कहना तो है


अपनी ग़ैरत बेच डालें अपना मसलक़ छोड़ दें
रहनुमाओ में भी कुछ लोगों को ये मन्शा तो है


है जिन्हें सब से ज्यादा दावा-ए-हुब्ब-ए-वतन
आज उन की वजह से हुब्ब-ए-वतन रुस्वा तो है

बुझ रहे हैं एक एक कर के अक़ीदों के दिये
इस अन्धेरे का भी लेकिन सामना करना तो है


झूठ क्यूं बोलें फ़रोग़-ए-मस्लहत के नाम पर
जि़न्दगी प्यारी सही लेकिन हमें मरना तो है

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

चंद कलियां निशात की चुनकर - chand kaliyaan nishaat kee chunakar- -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
चंद कलियां निशात की चुनकर

मुद्दतों महवे यास रहता हूं

तेरा मिलना खुशी की बात सही

तुझ से मिलकर उदास रहता हूं

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

ये हुस्न तेरा ये इश्क़ मेरा - ye husn tera ye ishq mera - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
ये हुस्न तेरा ये इश्क़ मेरा
रंगीन तो है बदनाम सही
मुझ पर तो कई इल्ज़ाम लगे
तुझ पर भी कोई इल्ज़ाम सही

इस रात की निखरी रंगत को
कुछ और निखर जाने दे ज़रा
नज़रों को बहक जाने दे ज़रा
ज़ुल्फ़ों को बिखर जाने दे ज़रा
कुछ देर की ही तस्कीन सही
कुछ देर का ही आराम सही

जज़्बात की कलियाँ चुनना है
और प्यार का तोहफ़ा देना है
लोगों की निगाहें कुछ भी कहें
लोगों से हमें क्या लेना है
ये ख़ास त'अल्लुक़ आपस का
दुनिया की नज़र में आम सही

रुसवाई के डर से घबरा कर
हम तर्क-ए-वफ़ा कब करते हैं
जिस दिल को बसा लें पहलू में
उस दिल को जुदा कब करते हैं
जो हश्र हुआ है लाखों का
अपना भी वही अंजाम सही

ये हुस्न तेरा ये इश्क़ मेरा
रंगीन तो है बदनाम सही
मुझ पर तो कई इल्ज़ाम लगे
तुझ पर भी कोई इल्ज़ाम सही

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैं - mohabbat tark kee mainne garebaan see liya main --साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैं
ज़माने अब तो ख़ुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैं ने

अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ख़ल्वत में
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैं ने

उन्हें अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है
कि कुछ मुद्दत हसीं ख़्वाबों में खो कर जी लिया मैंने

बस अब तो दामन-ए-दिल छोड़ दो बेकार उम्मीदो
बहुत दुख सह लिये मैंने बहुत दिन जी लिया मैंने

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

जो तेरी ज़ात से मनसूब थे उन गीतों को - jo teree zaat se manasoob the un geeton ko --साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
मैंने जो गीत तेरे प्यार की ख़ातिर लिक्खे
आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूँ
आज दुकान पे नीलाम उठेगा उन का
तूने जिन गीतों पे रक्खी थी मुहब्बत की असास
आज चाँदी की तराज़ू में तुलेगी हर चीज़
मेरे अफ़कार मेरी शायरी मेरा एहसास
[असास=नींव; अफ़कार=लेख]
जो तेरी ज़ात से मनसूब थे उन गीतों को
मुफ़्लिसी जिन्स बनाने पे उतर आई है
भूक तेरे रुख़-ए-रन्गीं के फ़सानों के इवज़
चंद आशिया-ए-ज़रूरत की तमन्नाई है
[मनसूब= जुडे हुए; मुफ़्लिसी= गरीबी]
[जिन्स= वस्तु; इवज़= बदले में]
देख इस अर्सागह-ए-मेहनत-ओ-सर्माया में
मेरे नग़्में भी मेरे पास नहीं रह सकते
तेरे ज़लवे किसी ज़रदार की मीरास सही
तेरे ख़ाके भी मेरे पास नहीं रह सकते
[अर्सागह-ए-मेहनत-ओ-सर्माया= पैसे और मजदूरी की लडाई में]
[ज़रदार=अमीर; मीरास=जायदाद; ख़ाके= रूप]
आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूँ
मैंने जो गीत तेरे प्यार की ख़ातिर लिक्खे

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

मैं ज़िन्दा हूँ ये मुश्तहर कीजिए - main zinda hoon ye mushtahar keejie - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
मैं ज़िन्दा हूँ ये मुश्तहर कीजिए
मिरे क़ातिलों को ख़बर कीजिए
  
ज़मीं सख़्त है आसमाँ दूर है
बसर हो सके तो बसर कीजिए

सितम के बहुत से हैं रद्द-ए-अमल
ज़रूरी नहीं चश्म तर कीजिए

वही ज़ुल्म बार-ए-दिगर है तो फिर
वही जुर्म बार-ए-दिगर कीजिए

क़फ़स तोड़ना बाद की बात है
अभी ख़्वाहिश-ए-बाल-ओ-पर कीजिए

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

मेरे सरकश तराने सुन के दुनिया ये समझती है - mere sarakash taraane sun ke duniya ye samajhatee hai - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
मेरे सरकश तराने सुन के दुनिया ये समझती है

कि शायद मेरे दिल को इश्क़ के नग़्मों से नफ़रत है



मुझे हंगामा-ए-जंग-ओ-जदल में कैफ़ मिलता है

मेरी फ़ितरत को ख़ूँरेज़ी के अफ़सानों से रग़्बत है



मेरी दुनिया में कुछ वक़’अत नहीं है रक़्स-ओ-नग़्में की

मेरा महबूब नग़्मा शोर-ए-आहंग-ए-बग़ावत है



मगर ऐ काश! देखें वो मेरी पुरसोज़ रातों को

मैं जब तारों पे नज़रें गाड़कर आसूँ बहाता हूँ



तसव्वुर बनके भूली वारदातें याद आती हैं

तो सोज़-ओ-दर्द की शिद्दत से पहरों तिलमिलाता हूँ



कोई ख़्वाबों में ख़्वाबीदा उमंगों को जगाती है

तो अपनी ज़िन्दगी को मौत के पहलू में पाता हूँ



मैं शायर हूँ मुझे फ़ितरत के नज़्ज़ारों से उल्फ़त है

मेरा दिल दुश्मन-ए-नग़्मा-सराई हो नहीं सकता



मुझे इन्सानियत का दर्द भी बख़्शा है क़ुदरत ने

मेरा मक़सद फ़क़त शोला नवाई हो नहीं सकता



जवाँ हूँ मैं जवानी लग़्ज़िशों का एक तूफ़ाँ है

मेरी बातों में रंगे-ए-पारसाई हो नहीं सकता



मेरे सरकश तरानों की हक़ीक़त है तो इतनी है

कि जब मैं देखता हूँ भूक के मारे किसानों को



ग़रीबों को, मुफ़्लिसों को, बेकसों को, बेसहारों को

सिसकती नाज़नीनों को, तड़पते नौजवानों को

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

अब तक मेरे गीतों में उम्मीद भी थी पसपाई भी - ab tak mere geeton mein ummeed bhee thee pasapaee bhee - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
अब तक मेरे गीतों में उम्मीद भी थी पसपाई भी
मौत के क़दमों की आहट भी, जीवन की अंगड़ाई भी
मुस्तकबिल की किरणें भी थीं, हाल की बोझल ज़ुल्मत भी
तूफानों का शोर भी था और ख्वाबों की शहनाई भी

आज से मैं अपने गीतों में आतश–पारे भर दूंगा
मद्धम लचकीली तानों में जीवन–धारे भर दूंगा
जीवन के अंधियारे पथ पर मशअल लेकर निकलूंगा
धरती के फैले आँचल में सुर्ख सितारे भर दूंगा
आज से ऐ मज़दूर-किसानों ! मेरे राग तुम्हारे हैं
फ़ाकाकश इंसानों ! मेरे जोग बिहाग तुम्हारे हैं
जब तक तुम भूके-नंगे हो, ये शोले खामोश न होंगे
जब तक बे-आराम हो तुम, ये नगमें राहत कोश न होंगे

मुझको इसका रंज नहीं है लोग मुझे फ़नकार न मानें
फ़िक्रों-सुखन के ताजिर मेरे शे’रों को अशआर न मानें
मेरा फ़न, मेरी उम्मीदें, आज से तुमको अर्पन हैं
आज से मेरे गीत तुम्हारे दुःख और सुख का दर्पन हैं

तुम से कुव्वत लेकर अब मैं तुमको राह दिखाऊँगा
तुम परचम लहराना साथी, मैं बरबत पर गाऊंगा
आज से मेरे फ़न का मकसद जंजीरें पिघलाना है
आज से मैं शबनम के बदले अंगारे बरसाऊंगा

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

मेरे सरकश तराने सुन के दुनिया ये समझती है - mere sarakash taraane sun ke duniya ye samajhatee hai --साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
मेरे सरकश तराने सुन के दुनिया ये समझती है
कि शायद मेरे दिल को इश्क़ के नग़्मों से नफ़रत है


मुझे हंगामा-ए-जंग-ओ-जदल में कैफ़ मिलता है
मेरी फ़ितरत को ख़ूँरेज़ी के अफ़सानों से रग़्बत है
मेरी दुनिया में कुछ वक्त नहीं है रक़्स-ओ-नग़्में की
मेरा महबूब नग़्मा शोर-ए-आहंग-ए-बग़ावत है

मगर ऐ काश! देखें वो मेरी पुरसोज़ रातों को
मैं जब तारों पे नज़रें गाड़कर आसूँ बहाता हूँ
तसव्वुर बनके भूली वारदातें याद आती हैं
तो सोज़-ओ-दर्द की शिद्दत से पहरों तिल्मिलाता हूँ
कोई ख़्वाबों में ख़्वाबीदा उमंगों को जगाती है
तो अपनी ज़िन्दगी को मौत के पहलू में पाता हूँ

मैं शायर हूँ मुझे फ़ितरत के नज़ारों से उल्फ़त है
मेरा दिल दुश्मन-ए-नग़्मा-सराई हो नहीं सकता
मुझे इन्सानियत का दर्द भी बख़्शा है क़ुदरत ने
मेरा मक़सद फ़क़त शोला नवाई हो नहीं सकता
जवाँ हूँ मैं जवानी लग़्ज़िशों का एक तूफ़ाँ है
मेरी बातों में रन्ग-ए-पारसाई हो नहीं सकता

मेरे सरकश तरानों की हक़ीक़त है तो इतनी है
कि जब मैं देखता हूँ भूक के मारे किसानों को
ग़रीबों को, मुफ़लिसों को, बेकसों को, बेसहारों को
सिसकती नाज़नीनों को, तड़पते नौजवानों को
हुकूमत के तशद्दुद को, अमारत के तकब्बुर को
किसी के चिथड़ों को और शहन्शाही ख़ज़ानों को

तो दिल ताब-ए-निशात-ए-बज़्म-ए-इश्रत ला नहीं सकता
मैं चाहूँ भी तो ख़्वाब-आवार तराने गा नहीं सकता

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

मेरे ख्वाबों के झरोकों को सजाने वाली- mere khvaabon ke jharokon ko sajaane vaalee--साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
मेरे ख्वाबों के झरोकों को सजाने वाली

तेरे ख्वाबों में कहीं मेरा गुज़र है कि नहीं

पूछकर अपनी निगाहों से बतादे मुझको

मेरी रातों की मुक़द्दर में सहर है कि नहीं


चार दिन की ये रफ़ाक़त जो रफ़ाक़त भी नहीं

उमर् भर के लिए आज़ार हुई जाती है

जिन्दगी यूं तो हमेशा से परेशान सी थी

अब तो हर सांस गिरांबार हुई जाती है



मेरी उजड़ी हुई नींदों के शबिस्तानों में

तू किसी ख्वाब के पैकर की तरह आई है

कभी अपनी सी कभी ग़ैर नज़र आती है

कभी इख़लास की मूरत कभी हरजाई है


प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी

तू बता दे कि तुझे प्यार करूं या न करूं

तूने ख़ुद अपने तबस्सुम से जगाया है जिन्हें

उन तमन्नाओ का इज़हार करूं या न करूं



तू किसी और के दामन की कली है लेकिन

मेरी रातें तेरी ख़ुश्बू से बसी रहती हैं

तू कहीं भी हो तेरे फूल से आरिज़ की क़सम

तेरी पलकें मेरी आंखों पे झुकी रहती हैं


तेरे हाथों की हरारत तेरे सांसों की महक

तैरती रहती है एहसास की पहनाई में

ढूंढती रहती हैं तख़ईल की बाहें तुझको

सर्द रातों की सुलगती हुई तनहाई में


तेरा अल्ताफ़-ओ-करम एक हक़ीक़त है मगर

ये हक़ीक़त भी हक़ीक़त में फ़साना ही न हो

तेरी मानूस निगाहों का ये मोहतात पयाम

दिल के ख़ूं का एक और बहाना ही न हो


कौन जाने मेरी इम्रोज़ का फ़र्दा क्या है

क़ुबर्तें बढ़ के पशेमान भी हो जाती है

दिल के दामन से लिपटती हुई रंगीं नज़रें

देखते देखते अंजान भी हो जाती है


मेरी दरमांदा जवानी की तमाओं के

मुज्महिल ख्वाब की ताबीर बता दे मुझको

तेरे दामन में गुलिस्ता भी है, वीराने भी

मेरा हासिल मेरी तक़दीर बता दे मुझको

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

मायूस तो हूं वायदे से तेरे, कुछ आस नहीं कुछ आस भी है - maayoos to hoon vaayade se tere, kuchh aas nahin kuchh aas bhee hai --साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
मायूस तो हूं वायदे से तेरे, कुछ आस नहीं कुछ आस भी है.
मैं अपने ख्यालों के सदके, तू पास नहीं और पास भी है.

दिल ने तो खुशी माँगी थी मगर, जो तूने दिया अच्छा ही दिया.
जिस गम को तअल्लुक हो तुझसे, वह रास नहीं और रास भी है.

पलकों पे लरजते अश्कों में तसवीर झलकती है तेरी.
दीदार की प्यासी आँखों को, अब प्यास नहीं और प्यास भी है.

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

आप बेवजह परेशान-सी क्यों हैं मादाम - aap bevajah pareshaan-see kyon hain maadaam - -साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

October 13, 2019 0 Comments
आप बेवजह परेशान-सी क्यों हैं मादाम?
लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होँगे
मेरे अहबाब ने तहज़ीब न सीखी होगी
मेरे माहौल में इन्सान न रहते होँगे

नूर-ए-सरमाया से है रू-ए-तमद्दुन की जिला[1]
हम जहाँ हैं वहाँ तहज़ीब नहीं पल सकती
मुफ़लिसी हिस्स-ए-लताफ़त[2] को मिटा देती है
भूख आदाब के साँचे में नहीं ढल सकती

लोग कहते हैं तो, लोगों पे ताज्जुब कैसा
सच तो कहते हैं कि, नादारों की इज़्ज़त कैसी
लोग कहते हैं - मगर आप अभी तक चुप हैं
आप भी कहिए ग़रीबो में शराफ़त कैसी

नेक मादाम ! बहुत जल्द वो दौर आयेगा
जब हमें ज़ीस्त[3] के अदवार परखने होंगे
अपनी ज़िल्लत की क़सम, आपकी अज़मत की क़सम
हमको ताज़ीम[4] के मे'आर[5] परखने होंगे

हम ने हर दौर में तज़लील[6] सही है लेकिन
हम ने हर दौर के चेहरे को ज़िआ[7] बक़्शी है
हम ने हर दौर में मेहनत के सितम झेले हैं
हम ने हर दौर के हाथों को हिना बक़्शी है

लेकिन इन तल्ख मुबाहिस[8] से भला क्या हासिल?
लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होँगे
मेरे एहबाब ने तहज़ीब न सीखी होगी
मेरे माहौल में इन्सान न रहते होँगे

वजह बेरंगी-ए-गुलज़ार कहूँ या न कहूँ
कौन है कितना गुनहगार कहूँ या न कहूँ

-साहिर लुधियानवी - saahir ludhiyaanavee

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